महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1844, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमिलकर अत्यन्त उग्र प्रतीत हो रहे थे ॥ १०७ ॥ गाण्डीवघोषः स्तनयित्नुकल्पो जगाम पार्थस्य नभो दिशश्च । जग्मुश्च बाणा विमलाः प्रसन्नाः सर्वा दिशः पाण्डवचापमुक्ताः ॥ १०८ ॥ अर्जुनके गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष मेघकी गर्जनाके समान आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल गया तथा उनके धनुषके छूटे हुए निर्मल एवं स्वच्छ बाण सम्पूर्ण दिशाओंमें बरसने लगे ॥ १०८ ॥ तं कौरवाणामधिपो जवेन भीष्मेण भूरिश्रवसा च सार्धम् । अभ्युद्ययावुद्यतबाणपाणिः कक्षं दिधक्षन्निव धूमकेतुः ॥ १०९ ॥ उस समय कौरवराज दुर्योधन हाथमें धनुष-बाण लिये बड़े वेगसे अर्जुनके सामने आया, मानो घास-फूँसको जलानेके लिये प्रज्वलित आग बढ़ती चली आ रही हो। भीष्म और भूरिश्रवाने भी दुर्योधनका साथ दिया ॥ १०९ ॥ अथार्जुनाय प्रजिघाय भल्लान् भूरिश्रवाः सप्त सुवर्णपुङ्खान् । दुर्योधनस्तोमरमुग्रवेगं शल्यो गदां शान्तनवश्च शक्तिम् ॥ ११० ॥ तदनन्तर भूरिश्रवाने सोनेके पंखसे युक्त सात भल्ल अर्जुनपर चलाये। दुर्योधनने भयंकर वेगशाली तोमरका प्रहार किया। शल्यने गदा और शान्तनुनन्दन भीष्मने शक्ति चलायी ॥ ११० ॥ स सप्तभिः सप्त शरप्रवेकान् संवार्य भूरिश्रवसा विसृष्टान् । शितेन दुर्योधनबाहुमुक्तं क्षुरेण तत् तोमरमुन्ममाथ ॥ १११ ॥ अर्जुनने सात बाणोंसे भूरिश्रवाके छोड़े हुए सातों भल्लोंको काटकर तीखे छुरेसे दुर्योधनकी भुजाओंसे मुक्त हुए उस तोमरको भी नष्ट कर दिया ॥ १११ ॥ ततः शुभामापतन्तीं स शक्तिं विद्युत्प्रभां शान्तनवेन मुक्ताम् । गदां च मद्राधिपबाहुमुक्तां द्वाभ्यां शराभ्यां निचकर्त वीरः ॥ ११२ ॥