महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1845, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् वीर अर्जुनने शान्तनुनन्दन भीष्मकी छोड़ी हुई बिजलीके समान चमकीली और शोभामयी शक्तिको तथा मद्रराज शल्यकी भुजाओंसे मुक्त हुई गदाको भी दो बाणोंसे काट डाला ।। ११२ ।।
ततो भुजाभ्यां बलवद् विकृष्य चित्रं धनुर्गाण्डिवमप्रमेयम् । माहेन्द्रमस्त्रं विधिवत् सुघोरं प्रादुश्चकाराद्भुतमन्तरिक्षे ।। ११३ ।।
तदनन्तर अप्रमेय शक्तिशाली विचित्र गाण्डीव धनुषको दोनों भुजाओंसे बलपूर्वक खींचकर अर्जुनने विधिपूर्वक अत्यन्त भयंकर माहेन्द्र अस्त्रको प्रकट किया। वह अद्भुत अस्त्र अन्तरिक्षमें चमक उठा ।। ११३ ।।
तेनोत्तमास्त्रेण ततो महात्मा सर्वाण्यनीकानि महाधनुष्मान् । शरौघजालैर्विमलाग्निवर्णै- र्निवारयामास किरीटमाली ।। ११४ ।।
फिर किरीटधारी महामना महाधनुर्धर अर्जुनने उस उत्तम अस्त्रद्वारा निर्मल एवं अग्निके समान प्रज्वलित बाणोंका जाल-सा बिछाकर कौरवोंके समस्त सैनिकोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ११४ ।।
शिलीमुखाः पार्थधनुःप्रमुक्ता रथान् ध्वजाग्राणि धनूंषि बाहून् । निकृत्य देहान् विविशुः परेषां नरेन्द्रनागेन्द्रतुरङ्गमाणाम् ।। ११५ ।।
अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाण शत्रुओंके रथ, ध्वजाग्र, धनुष और बाहु काटकर नरेशों, गजराजों तथा घोड़ोंके शरीरोंमें घुसने लगे ।। ११५ ।।
ततो दिशः सोऽनुदिशश्च पार्थः शरैः सुधारैः समरे वितत्य । गाण्डीवशब्देन मनांसि तेषां किरीटमाली व्यथयाञ्चकार ।। ११६ ।।
तदनन्तर तीखी धारवाले बाणोंसे युद्धस्थलमें सम्पूर्ण दिशाओं और कोणोंको आच्छादित करके किरीटधारी अर्जुनने गाण्डीव धनुषकी टंकारसे कौरवोंके मनमें भारी व्यथा उत्पन्न कर दी ।। ११६ ।।
तस्मिंस्तथा घोरतमे प्रवृत्ते शङ्खस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्च । अन्तर्हिता गाण्डिवनिःस्वनेन