महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1852, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारथैर्वारणवाजिभिश्च । बभौ सविद्युत्स्तनयित्नुकल्पा जलागमे द्यौरिव जातमेघा ॥ ५ ॥ शान्तनुनन्दन भीष्मसे रक्षित वह विशाल वाहिनी बड़े-बड़े रथों, हाथियों और घोड़ोंसे ऐसी शोभा पा रही थी, मानो वर्षाकालमें मेघोंकी घटासे आच्छादित आकाश बिजलीसहित बादलोंसे सुशोभित हो ॥ ५ ॥
ततो रणायाभिमुखी प्रयाता प्रत्यर्जुनं शान्तनवाभिगुप्ता । सेना महोग्रा सहसा कुरूणां वेगो यथा भीम इवापगायाः ॥ ६ ॥ तदनन्तर नदीके भयानक वेगकी भाँति कौरवोंकी वह अत्यन्त भयंकर सेना शान्तनुनन्दन भीष्मसे सुरक्षित हो रणके लिये अर्जुनकी ओर सहसा चली ॥ ६ ॥
तं व्यालनानाविधगूढसारं गजाश्वपादातरथौघपक्षम् । व्यूहं महामेघसमं महात्मा ददर्श दूरात् कपिराजकेतुः ॥ ७ ॥ महामना कपिध्वज अर्जुनने दूरसे देखा कि कौरवसेना व्याल नामक व्यूहमें आबद्ध होनेके कारण अनेक प्रकारकी दिखायी दे रही है। उसकी शक्ति छिपी हुई है। उसमें हाथी, घोड़े, पैदल तथा रथियोंके समूह भरे हुए हैं। सेनाका वह व्यूह महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ता है ॥ ७ ॥
विनिर्ययौ केतुमता रथेन नरर्षभः श्वेतहयेन वीरः । वरूथिना सैन्यमुखे महात्मा वधे धृतः सर्वसपत्नयूनाम् ॥ ८ ॥ तदनन्तर नरश्रेष्ठ महामना वीर अर्जुन समस्त शत्रुपक्षीय युवकोंके वधका संकल्प लेकर श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए ध्वज एवं आवरणसे युक्त रथपर आरूढ़ हो शत्रुसेनाके सामने चले ॥ ८ ॥
सूपस्करं सोत्तरबन्धुरेषं यत्तं यदूनामृषभेण संख्ये । कपिध्वजं प्रेक्ष्य विषेदुराजौ सहैव पुत्रैस्तव कौरवेयाः ॥ ९ ॥ जिसमें सब सामग्री सुन्दरतासे सजाकर रखी गयी थी, अच्छी तरह बँधी होनेके कारण जिसकी ईषा अत्यन्त मनोहर दिखायी देती है तथा यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण जिसका