महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1853, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंचालन करते हैं, उस वानरके चिह्नवाली ध्वजासे युक्त रथको युद्धभूमिमें उपस्थित देख आपके पुत्रोंसहित समस्त कौरवसैनिक विषादमग्न हो गये ।। प्रकर्षता गुप्तमुदायुधेन किरीटिना लोकमहारथेन । तं व्यूहराजं ददृशुस्त्वदीया- श्चतुश्चतुर्व्यालसहस्रकर्णम् ॥ १० ॥ लोकविख्यात महारथी किरीटधारी अर्जुन अस्त्र-शस्त्र लेकर जिसे सुरक्षितरूपसे अपने साथ ले आ रहे थे और जिसमें चार-चार हजार मतवाले हाथी प्रत्येक दिशामें खड़े किये गये थे, उस व्यूहराजको आपके सैनिकोंने देखा ॥ १० ॥ यथा हि पूर्वेऽहनि धर्मराज्ञा व्यूहः कृतः कौरवसत्तमेन । तथा न भूतो भुवि मानुषेषु न दृष्टपूर्वो न च संश्रुतश्च ॥ ११ ॥ कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने पहले दिन जैसा व्यूह बनाया था, वैसा ही वह भी था। वैसा व्यूह इस भूतलपर मनुष्योंकी सेनाओंमें न तो पहले कभी देखा गया था और न कभी सुना ही गया था ॥ ११ ॥ ततो यथादेशमुपेत्य तस्थुः पाञ्चालमुख्याः सह चेदिमुख्यैः । ततः समादेशसमाहतानि भेरीसहस्राणि विनेदुराजौ ॥ १२ ॥ तदनन्तर सेनापतिकी आज्ञाके अनुसार यथोचित स्थानपर पहुँचकर पांचाल और चेदिदेशके प्रमुख वीर खड़े हुए। फिर उस युद्धस्थलमें प्रधानके आदेशानुसार सहस्रों रणभेरियाँ एक साथ बज उठीं ॥ १२ ॥ शङ्खस्वनास्तूर्यरथस्वनाश्च सर्वेष्वनीकेषु ससिंहनादाः । ततः सबाणानि महास्वनानि विस्फार्यमाणानि धनूंषि वीरैः ॥ १३ ॥ सभी सेनाओंमें शंखनाद, तूर्यनाद (वाद्योंकी ध्वनि) तथा वीरोंके सिंहनादसहित रथोंकी घर-घराहटके शब्द होने लगे। फिर वीरोंके द्वारा खींचे जानेवाले बाणसहित धनुषके महान् टंकार-शब्द गूँज उठे ॥ १३ ॥ क्षणेन भेरीपणवप्रणादा- नन्तर्दधुः शङ्खमहास्वनाश्च । तच्छङ्खशब्दावृतमन्तरिक्ष-