भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1854

मुद्धूतभीमाद्भुतरेणुजालम् ॥ १४ ॥
क्षणभरमें भेरी और पणव आदिके शब्दोंको महान् शंखनादोंने दबा लिया तथा उस शंखध्वनिसे व्याप्त हुए आकाशमें (पृथ्वीसे) उठी हुई धूलोंका भयंकर एवं अद्भुत जाल-सा फैल गया ॥ १४ ॥

महानुभावाश्च ततः प्रकाश-
मालोक्य वीराः सहसाभिपेतूः ।
रथी रथेनाभिहतः ससूतः
पपात साश्वः सरथः सकेतुः ॥ १५ ॥
तदनन्तर महान् प्रभावशाली वीर सूर्यदेवका प्रकाश देखकर सहसा शत्रुमण्डलीपर टूट पड़े। रथी रथीसे भड़ककर सारथि, घोड़े, रथ और ध्वजसहित मरकर गिरने लगा ॥ १५ ॥

गजो गजेनाभिहतः पपात
पदातिना चाभिहतः पदातिः ।
आवर्तमानान्यभिवर्तमानै-
र्घोरीकृतान्यद्भुतदर्शनानि ।
प्रासैश्च खड्गैश्च समाहतानि
सदश्ववृन्दानि सदश्ववृन्दैः ॥ १६ ॥
सुवर्णतारागणभूषितानि
सूर्यप्रभाभानि शरावराणि ।
विदार्यमाणानि परश्वधैश्च
प्रासैश्च खड्गैश्च निपेतुरुर्व्याम् ॥ १७ ॥
हाथी हाथीके आघातसे और पैदल पैदलकी चोटसे धराशायी होने लगे। श्रेष्ठ घोड़ोंके समूहपर उत्तम अश्वोंके समुदाय आक्रमण-प्रत्याक्रमण करते थे। ये सवारोंद्वारा किये हुए खड्ग और प्रासोंके आघातसे घायल होकर भयंकर और अद्भुत दिखायी देते थे। स्वर्णमय तारागणोंके चिह्नोंसे विभूषित सूर्यके समान चमकीले कवच फरसों, तलवारों और प्रासोंकी चोटसे विदीर्ण होकर धरतीपर गिर रहे थे ॥ १६-१७ ॥

गजैर्विषाणैर्वरहस्तरुग्णाः
केचित् ससूता रथिनः प्रपेतुः ।
गजर्षभाश्चापि रथर्षभेण
निपातिता बाणहताः पृथिव्याम् ॥ १८ ॥
दन्तार हाथियोंके दाँतों और सूँडोंके आघातसे रथ चूर-चूर हो जानेके कारण कितने ही रथी सारथि-सहित धरतीपर गिर पड़ते थे। कितने ही श्रेष्ठ रथियोंने बड़े बड़े हाथियोंको अपने बाणोंसे मारकर धराशायी कर दिया ॥ १८ ॥

गजौघवेगोद्धृतसादितानां