महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मुद्धूतभीमाद्भुतरेणुजालम् ॥ १४ ॥
क्षणभरमें भेरी और पणव आदिके शब्दोंको महान् शंखनादोंने दबा लिया तथा उस शंखध्वनिसे व्याप्त हुए आकाशमें (पृथ्वीसे) उठी हुई धूलोंका भयंकर एवं अद्भुत जाल-सा फैल गया ॥ १४ ॥
महानुभावाश्च ततः प्रकाश-
मालोक्य वीराः सहसाभिपेतूः ।
रथी रथेनाभिहतः ससूतः
पपात साश्वः सरथः सकेतुः ॥ १५ ॥
तदनन्तर महान् प्रभावशाली वीर सूर्यदेवका प्रकाश देखकर सहसा शत्रुमण्डलीपर टूट पड़े। रथी रथीसे भड़ककर सारथि, घोड़े, रथ और ध्वजसहित मरकर गिरने लगा ॥ १५ ॥
गजो गजेनाभिहतः पपात
पदातिना चाभिहतः पदातिः ।
आवर्तमानान्यभिवर्तमानै-
र्घोरीकृतान्यद्भुतदर्शनानि ।
प्रासैश्च खड्गैश्च समाहतानि
सदश्ववृन्दानि सदश्ववृन्दैः ॥ १६ ॥
सुवर्णतारागणभूषितानि
सूर्यप्रभाभानि शरावराणि ।
विदार्यमाणानि परश्वधैश्च
प्रासैश्च खड्गैश्च निपेतुरुर्व्याम् ॥ १७ ॥
हाथी हाथीके आघातसे और पैदल पैदलकी चोटसे धराशायी होने लगे। श्रेष्ठ घोड़ोंके समूहपर उत्तम अश्वोंके समुदाय आक्रमण-प्रत्याक्रमण करते थे। ये सवारोंद्वारा किये हुए खड्ग और प्रासोंके आघातसे घायल होकर भयंकर और अद्भुत दिखायी देते थे। स्वर्णमय तारागणोंके चिह्नोंसे विभूषित सूर्यके समान चमकीले कवच फरसों, तलवारों और प्रासोंकी चोटसे विदीर्ण होकर धरतीपर गिर रहे थे ॥ १६-१७ ॥
गजैर्विषाणैर्वरहस्तरुग्णाः
केचित् ससूता रथिनः प्रपेतुः ।
गजर्षभाश्चापि रथर्षभेण
निपातिता बाणहताः पृथिव्याम् ॥ १८ ॥
दन्तार हाथियोंके दाँतों और सूँडोंके आघातसे रथ चूर-चूर हो जानेके कारण कितने ही रथी सारथि-सहित धरतीपर गिर पड़ते थे। कितने ही श्रेष्ठ रथियोंने बड़े बड़े हाथियोंको अपने बाणोंसे मारकर धराशायी कर दिया ॥ १८ ॥
गजौघवेगोद्धृतसादितानां
श्रुत्वा विषेदुः सहसा मनुष्याः । आर्तस्वनं सादिपदातियूनां विषाणगात्रावरताडितानाम् ॥ १९ ॥ हाथियोंके वेगसे कुचलकर कितने ही घुड़सवार और पैदल युवक मारे गये। वे उनके दाँतों और नीचेके अंगसे कुचलकर हताहत हो रहे थे। सहसा उनकी आर्त चीत्कार सुनकर सभी मनुष्योंको बड़ा खेद होता था ॥ १९ ॥
सम्भ्रान्तनागाश्वरथे मुहूर्ते महाक्षये सादिपदातियूनाम् । महारथैः सम्परिवार्यमाणो ददर्श भीष्मः कपिराजकेतुम् ॥ २० ॥ उस मुहूर्तमें जब कि घुड़सवारों और पैदल युवकोंका विकट संहार हो रहा था तथा हाथी, घोड़े और रथ सभी अत्यन्त घबराहटमें पड़े हुए थे, महा-रथियोंसे घिरे हुए भीष्मने वानरचिह्नसे युक्त ध्वजवाले अर्जुनको देखा ॥ २० ॥
तं पञ्चतालोच्छ्रिततालकेतुः सदश्ववेगाद्भुतवीर्ययानः । महास्त्रबाणाशनिदीप्तिमन्तं किरीटिनं शान्तनवोऽभ्यधावत् ॥ २१ ॥ भीष्मका ध्वज पाँच तालवृक्षोंसे चिह्नित और ऊँचा था। उनके रथमें अच्छे घोड़े जुते हुए थे, जिनके वेगसे वह रथ अद्भुत शक्तिशाली जान पड़ता था। उसपर आरूढ़ होकर शान्तनुनन्दन भीष्मने किरीटधारी अर्जुनपर धावा किया, जो बाण और अशनि आदि महान् दिव्यास्त्रोंकी दीप्तिसे उद्दीप्त हो रहे थे ॥ २१ ॥
तथैव शक्रप्रतिमप्रभाव- मिन्द्रात्मजं द्रोणमुखा विसस्रुः । कृपश्च शल्यश्च विविंशतिश्च दुर्योधनः सौमदत्तिश्च राजन् ॥ २२ ॥ राजन्! इसी प्रकार इन्द्रतुल्य प्रभावशाली इन्द्रकुमार अर्जुनपर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य, विविंशति, दुर्योधन तथा भूरिश्रवाने भी आक्रमण किया ॥ २२ ॥
ततो रथानां प्रमुखादुपैत्य सर्वास्त्रवित् काञ्चनचित्रवर्मा । जवेन शूरोऽभिससार सर्वां- स्तानर्जुनस्यात्मसुतोऽभिमन्युः ॥ २३ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, सोनेके विचित्र कवच धारण करनेवाले शूरवीर अर्जुनपुत्र अभिमन्युने एक श्रेष्ठ रथके द्वारा वेगपूर्वक वहाँ पहुँचकर उन समस्त कौरव
महारथियोंपर धावा किया ॥ २३ ॥ तेषां महास्त्राणि महारथाना- मसह्यकर्मा विनिहत्य कार्ष्णिः । बभौ महामन्त्रहुतार्चिमाली सदोगतः सन् भगवानिवाग्निः ॥ २४ ॥ अर्जुनकुमारका पराक्रम दूसरोंके लिये असह्य था। वह उन कौरव महारथियोंके बड़े-बड़े अस्त्रोंको नष्ट करके यज्ञ-मण्डपमें महान् मन्त्रोंद्वारा हविष्यकी आहुति पाकर प्रज्वलित हुई ज्वालामालाओंसे अलंकृत भगवान् अग्निदेवके समान शोभा पाने लगा ॥ २४ ॥ ततः स तूर्णं रुधिरोदफेनां कृत्वा नदीमाशु रणे रिपूणाम् । जगाम सौभद्रमतीत्य भीष्मो महारथं पार्थमदीनसत्त्वः ॥ २५ ॥ तदनन्तर उदार शक्तिशाली भीष्मने रणभूमिमें तुरंत ही शत्रुओंके रक्तरूपी जल एवं फेनसे भरी नदी बहाकर सुभद्राकुमार अभिमन्युको टालकर महारथी अर्जुनपर आक्रमण किया ॥ २५ ॥ ततः प्रहस्याद्भुतविक्रमेण गाण्डीवमुक्तेन शिलाशितेन । विपाठजालेन महास्त्रजालं विनाशयामास किरीटमाली ॥ २६ ॥ तब किरीटधारी अर्जुनने हँसकर अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए गाण्डीव धनुषसे छोड़े और शिलापर रगड़कर तेज किये हुए विपाठ नामक बाणोंके समूहसे शत्रुओंके बड़े-बड़े अस्त्रोंके जालको छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ २६ ॥ तमुत्तमं सर्वधनुर्धराणा- मसक्तकर्मा कपिराजकेतुः । भीष्मं महात्माभिववर्ष तूर्णं शरौघजालैर्विमलैश्च भल्लैः ॥ २७ ॥ तत्पश्चात् अप्रतिहत पराक्रमवाले महामना कपि-ध्वज अर्जुनने सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ भीष्मपर तुरंत ही निर्मल भल्लों तथा बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २७ ॥ तथैव भीष्माहतमन्तरिक्षे महास्त्रजालं कपिराजकेतोः । विशीर्यमाणं ददृशुस्त्वदीया दिवाकरेणेव तमोऽभिभूतम् ॥ २८ ॥
इसी प्रकार आपके सैनिकोंने देखा कि आकाशमें कपिध्वज अर्जुनके बिछाये हुए महान् अस्त्रजालको भीष्मजीने अपने अस्त्रोंके आघातसे उसी प्रकार छिन्न-भिन्न कर दिया है, जैसे भगवान् सूर्य अन्धकारराशिको नष्ट कर देते हैं ॥ २८ ॥
एवंविधं कार्मुकभीमनाद-
मदीनवत् सत्पुरुषोत्तमाभ्याम् ।
ददर्श लोकः कुरुसृंजयाश्च
तद् द्वैरथं भीष्मधनंजयाभ्याम् ॥ २९ ॥
इस तरह सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ भीष्म और अर्जुनमें धनुषोंकी भयंकर टंकारसे युक्त, दैन्यरहित द्वैरथ-युद्ध होने लगा, जिसे कौरव और सृंजय वीरों तथा दूसरे लोगोंने भी देखा ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मार्जुनद्वैरथे षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म और अर्जुनके द्वैरथ-युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥
अध्याय (पृष्ठ 1858)
एकषष्टितमोऽध्यायः
अभिमन्युका पराक्रम और धृष्टद्युम्नद्वारा शलके पुत्रका वध
संजय उवाच
द्रौणिर्भूरिश्रवाः शल्यश्चित्रसेनश्च मारिष ।
पुत्रः सांयमनेश्चैव सौभद्रं पर्यवारयन् ।। १ ।।
संजय कहते हैं—माननीय राजन्! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शल्य, चित्रसेन तथा शलके पुत्रने सुभद्राकुमार अभिमन्युको आगे बढ़नेसे रोका ।। १ ।।
संसक्तमतितेजोभिस्तमेकं ददृशुर्जनाः ।
पञ्चभिर्मनुजव्याघ्रैर्गजैः सिंहशिशुं यथा ।। २ ।।
जैसे सिंहका बच्चा पाँच हाथियोंसे भिड़ा हुआहो, उसी प्रकार सुभद्राकुमार अभिमन्यु उन अत्यन्त तेजस्वी पाँच पुरुषसिंहोंसे अकेला ही युद्ध कर रहा था। यह बात वहाँ सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखी ।। २ ।।
नातिलक्ष्यतया कश्चिन्न शौर्ये न पराक्रमे ।
बभूव सदृशः कार्ष्णिर्नास्त्रे नापि च लाघवे ।। ३ ।।
लक्ष्य वेधने, शौर्य प्रकट करने, पराक्रम दिखाने, अस्त्रज्ञान प्रदर्शित करने तथा हाथोंकी फुर्तीमें कोई भी अभिमन्युकी समानता न कर सका ।। ३ ।।
तथा तमात्मजं युद्धे विक्रमन्तमरिंदमम् ।
दृष्ट्वा पार्थः सुसंयत्तं सिंहनादमथानदत् ।। ४ ।।
अपने शत्रुसूदन पुत्र अभिमन्युको युद्धमें इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पराक्रम प्रकट करते देख कुन्तीपुत्र अर्जुनने सिंहके समान गर्जना की ।। ४ ।।
पीडयानं तु तत् सैन्यं पौत्रं तव विशाम्पते ।
दृष्ट्वा त्वदीया राजेन्द्र समन्तात् पर्यवारयन् ।। ५ ।।
प्रजानाथ! राजेन्द्र! आपके पौत्र अभिमन्युको कौरवसेनाको पीड़ा देते देख आपके ही सैनिकोंने सब ओरसे घेर लिया ।। ५ ।।
ध्वजिनीं धार्तराष्ट्राणां दीनशत्रुरदीनवत् ।
प्रत्युद्ययौ स सौभद्रस्तेजसा च बलेन च ।। ६ ।।
अपने शत्रुओंको दीन बना देनेवाले सुभद्राकुमारने दैन्यरहित होकर अपने तेज और बलसे कौरवसेनापर धावा किया ।। ६ ।।
तस्य लाघवमार्गस्थमादित्यसदृशप्रभम् ।
व्यदृश्यत महच्चापं समरे युध्यतः परैः ।। ७ ।।
समरभूमिमें शत्रुओंके साथ युद्ध करते हुए अभिमन्युका विशाल धनुष अस्त्रलाघवके पथपर स्थित हो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ७ ॥ स द्रौणिमिषुणैकेन विद्ध्वा शल्यं च पञ्चभिः । ध्वजं सांयमनेश्चैव सोऽष्टाभिश्चिच्छिदे ततः ॥ ८ ॥ उसने अश्वत्थामाको एक और शल्यको पाँच बाणोंसे घायल करके शलके ध्वजको आठ बाणोंसे काट डाला ॥ ८ ॥ रुक्मदण्डां महाशक्तिं प्रेषितां सौमदत्तिना । शितेनोरगसंकाशां पत्रिणापजहार ताम् ॥ ९ ॥ फिर भूरिश्रवाकी चलायी हुई स्वर्णदण्डविभूषित सर्पसदृश महाशक्तिको तीखे बाणसे छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ९ ॥ शल्यस्य च महावेगानस्यतः समरे शरान् । (धनुश्चिच्छेद भल्लेन तीव्रवेगेन फाल्गुनिः ।) निवार्यार्जुनदायादो जघान चतुरो हयान् ॥ १० ॥ शल्य समरभूमिमें बड़े वेगशाली बाणोंका प्रहार कर रहे थे; किंतु अर्जुनपुत्र अभिमन्युने तीव्र वेगवाले भल्लसे उनके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और उनकी प्रगतिको रोककर पार्थकुमारने चारों घोड़ोंको मार गिराया ॥ १० ॥ भूरिश्रवाश्च शल्यश्च द्रौणिः सांयमनिः शलः । नाभ्यवर्तन्त संरब्धाः कार्ष्णेर्बाहुबलोदयम् ॥ ११ ॥ भूरिश्रवा, शल्य, अश्वत्थामा तथा सांयमनि (सोमदत्तपुत्र) शल—ये सब लोग अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए थे, तथापि अभिमन्युके बाहुबलकी वृद्धिको रोक न सके ॥ ११ ॥ ततस्त्रिगर्ता राजेन्द्र मद्रैश्च सह केकयैः । पञ्चविंशतिसाहस्रास्तव पुत्रेण चोदिताः ॥ १२ ॥ धनुर्वेदविदो मुख्या अजेयाः शत्रुभिर्युधि । सहपुत्रं जिघांसन्तं परिवव्रुः किरीटिनम् ॥ १३ ॥ राजेन्द्र! तब आपके पुत्र दुर्योधनसे प्रेरित होकर त्रिगतों तथा केकयोंसहित मद्रदेशके पचीस हजार योद्धाओंने शत्रुवधकी इच्छा रखनेवाले पुत्रसहित किरीटधारी अर्जुनको घेर लिया। वे सब-के-सब धनुर्वेदके प्रधान ज्ञाता और युद्धस्थलमें शत्रुओंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३ ॥ तौ तु तत्र पितापुत्रौ परिक्षिप्तौ महारथौ । ददर्श राजन् पाञ्चाल्यः सेनापतिररिंदम ॥ १४ ॥ स वारणरथौघानां सहस्रैर्बहुभिर्वृतः । वाजिभिः पत्तिभिश्चैव वृतः शतसहस्रशः ॥ १५ ॥ धनुर्विस्फार्य संक्रुद्धो नोदयित्वा च वाहिनीम् ।
ययौ तं मद्रकानीकं केकयांश्च परंतप ॥ १६ ॥ शत्रुदमन नरेश! पिता-पुत्र महारथी अर्जुन और अभिमन्युको शत्रुओंद्वारा घिरे हुए देख पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्न कई हजार हाथियों और रथों तथा सैकड़ों-हजारों घुड़सवारों एवं पैदलोंसे घिरकर अपनी विशाल वाहिनीको आगे बढ़ाते तथा क्रोधपूर्वक धनुषकी टंकार करते हुए मद्रों और केकयोंकी सेनापर चढ़ आये ॥ १४—१६ ॥ तेन कीर्तिमता गुप्तमनीकं दृढधन्वना । संरब्धरथनागाश्वं योत्स्यमानमशोभत ॥ १७ ॥ सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले यशस्वी धृष्टद्युम्नसे सुरक्षित हुई वह सेना युद्धके लिये उद्यत हो बड़ी शोभा पाने लगी, उसके रथी, हाथीसवार और घुड़सवार सभी रोषावेशमें भरे हुए थे ॥ १७ ॥ सोऽर्जुनप्रमुखे यान्तं पाञ्चालकुलवर्धनः । त्रिभिः शारद्वतं बाणैर्जत्रुदेशे समर्पयत् ॥ १८ ॥ पांचालवंशकी वृद्धि करनेवाले धृष्टद्युम्नने अर्जुनके सामने जाते हुए कृपाचार्यको उनके गलेकी हँसलीपर तीन बाण मारे ॥ १८ ॥ ततः स मद्रकान् हत्वा दशैव दशभिः शरैः । पृष्ठरक्षं जघानाशु भल्लेन कृतवर्मणः ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् दस बाणोंसे मद्रदेशीय दस योद्धाओंको मारकर तुरंत ही एक भल्लके द्वारा कृतवर्माके पृष्ठ-रक्षकको मार डाला ॥ १९ ॥ दमनं चापि दायादं पौरवस्य महात्मनः । जघान विमलाग्रेण नाराचेन परंतपः ॥ २० ॥ इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डव-सेनापतिने निर्मल धारवाले नाराचसे महामना पौरवके पुत्र दमनको भी मार डाला ॥ २० ॥ ततः सांयमनेः पुत्रः पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् । अविध्यत् त्रिंशता बाणैर्दशभिश्चास्य सारथिम् ॥ २१ ॥ तब शलके पुत्रने तीस बाणोंसे रणदुर्मद धृष्टद्युम्नको और दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको घायल कर दिया ॥ सोऽतिविद्धो महेष्वासः सृक्किणी परिसंलिहन् । भल्लेन भृशतीक्ष्णेन निचकर्तस्य कार्मुकम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार अत्यन्त घायल होकर अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने अत्यन्त तीखे भल्लसे शलके पुत्रका धनुष काट दिया ॥ २२ ॥ अथैनं पञ्चविंशत्या क्षिप्रमेव समर्पयत् । अश्वांश्चास्यावधीद् राजन्नुभौ तौ पार्ष्णि सारथी ॥ २३ ॥
राजन्! तत्पश्चात् उन्होंने शीघ्र ही पचीस बाणोंसे शलपुत्रको घायल कर दिया तथा उसके घोड़ों एवं दोनों पृष्ठरक्षकोंको भी मृत्युके मुखमें डाल दिया ॥ २३ ॥ स हताश्वे रथे तिष्ठन् ददर्श भरतर्षभ । पुत्रः सांयमनेः पुत्रं पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ! जिसके घोड़े मार दिये गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शलके पुत्रने महामना धृष्टद्युम्नके पुत्रको देखा ॥ २४ ॥ स प्रगृह्य महाघोरं निस्त्रिंशवरमायसम् । पदातिस्तूर्णमानर्च्छद् रथस्थं पुरुषर्षभः ॥ २५ ॥ तब पुरुषश्रेष्ठ शलपुत्र तुरंत ही एक अत्यन्त भयंकर लोहेकी बनी हुई बड़ी तलवार हाथमें ले पैदल ही रथपर बैठे हुए पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नकी ओर चला ॥ २५ ॥ तं महौघमिवायान्तं खात् पतन्तमिवोरगम् । भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोत्सृष्टमिवान्तकम् ॥ २६ ॥ दीप्यमानमिवादित्यं मत्तवारणविक्रमम् । अपश्यन् पाण्डवास्तत्र धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २७ ॥ उस युद्धमें पाण्डवों तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने मतवाले गजराजके समान पराक्रमी और सूर्यके समान दीप्तिमान् शलपुत्रको आते देखा। वह महान् वेगशाली जलप्रवाह, आकाशसे गिरते हुए सर्प तथा कालकी भेजी हुई मृत्युके समान जान पड़ता था। उसके हाथमें नंगी तलवार थी ॥ २६-२७ ॥ तस्य पाञ्चालदायादः प्रतीपमभिधावतः । शितनिस्त्रिंशहस्तस्य शरावरणधारिणः ॥ २८ ॥ बाणवेगमतीतस्य तथाभ्याशमुपेयुषः । त्वरन् सेनापतिः क्रुद्धो बिभेद गदया शिरः ॥ २९ ॥ वह विरोधभाव लेकर धावा कर रहा था। उसके हाथमें तीखी तलवार थी। उसने अपने अंगोंमें कवच धारण कर रखा था। वह बाणके वेगको लाँघकर अत्यन्त निकट आ पहुँचा था। उस दशामें पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्नने तुरंत क्रोधपूर्वक गदासे आघात करके उसके मस्तकको विदीर्ण कर दिया ॥ २८-२९ ॥ तस्य राजन् सनिस्त्रिंशं सुप्रभं च शरावरम् । हतस्य पततो हस्ताद् वेगेन न्यपतद् भुवि ॥ ३० ॥ राजन्! उसके मारे जानेपर शरीरसे चमकीला कवच और हाथसे तलवार उसके गिरनेके साथ ही वेगपूर्वक पृथ्वीपर गिरी ॥ ३० ॥ तं निहत्य गदाग्रेण स लेभे परमां मुदम् । पुत्रः पाञ्चालराजस्य महात्मा भीमविक्रमः ॥ ३१ ॥
पाञ्चालराजका भयानक पराक्रमी पुत्र महामना धृष्टद्युम्न गदाके अग्रभागसे शलपुत्रको मारकर अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ ३१॥
तस्मिन् हते महेष्वासे राजपुत्रे महारथे।
हाहाकारो महानासीत् तव सैन्यस्य मारिष॥ ३२॥
आर्य! उस महाधनुर्धर महारथी राजकुमारके मारे जानेपर आपकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया॥ ३२॥
ततः सांयमनिः क्रुद्धो दृष्ट्वा निहतमात्मजम्।
अभिदुद्राव वेगेन पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम्॥ ३३॥
अपने पुत्रको मारा गया देख संयमनकुमार शलने कुपित होकर रणदुर्मद पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नपर बड़े वेगसे धावा किया॥ ३३॥
तौ तत्र समरे शूरौ समेतौ युद्धदुर्मदौ।
ददृशुः सर्वराजानः कुरवः पाण्डवास्तथा॥ ३४॥
युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले वे दोनों शूरवीर उस समरभूमिमें एक दूसरेसे भिड़ गये। कौरव और पाण्डव दोनों पक्षोंके समस्त भूपाल उनका युद्ध देखने लगे॥ ३४॥
ततः सांयमनिः क्रुद्धः पार्षतं परवीरहा।
आजघान त्रिभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपम्॥ ३५॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले शलने जैसे महावत किसी महान् गजराजको अंकुशोंसे मारे, उसी प्रकार द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नको क्रोधपूर्वक तीन बाणोंसे घायल किया॥ ३५॥
तथैव पार्षतं शूरं शल्यः समितिशोभनः।
आजघानोरसि क्रुद्धस्ततो युद्धमवर्तत॥ ३६॥
इसी प्रकार संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यने भी क्रुद्ध होकर शूरवीर धृष्टद्युम्नकी छातीपर प्रहार किया। फिर तो वहाँ भयंकर युद्ध छिड़ गया॥ ३६॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थयुद्धदिवसे सांयमनिपुत्रवधे एकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिनके युद्धमें शलपुत्रके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३६ १/२ श्लोक हैं।]
अध्याय (पृष्ठ 1863)
द्विषष्टितमोऽध्यायः
धृष्टद्युम्न और शल्य आदि दोनों पक्षके वीरोंका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार
धृतराष्ट्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये पौरुषादपि संजय ।
यत् सैन्यं मम पुत्रस्य पाण्डुसैन्येन बाध्यते ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—संजय! मैं पुरुषार्थकी अपेक्षा भी दैवको ही प्रधान मानता हूँ, जिससे मेरे पुत्र दुर्योधनकी सेना पाण्डवोंकी सेनासे पीड़ित हो रही है ॥ १ ॥
नित्यं हि मामकांस्तात हतानेव हि शंससि ।
अव्यग्रांश्च प्रहृष्टांश्च नित्यं शंससि पाण्डवान् ॥ २ ॥
तात! तुम प्रतिदिन मेरे ही सैनिकोंके मारे जानेकी बात कहते हो और पाण्डवोंको सदा व्यग्रतासे रहित तथा हर्षोल्लाससे परिपूर्ण बताते हो ॥ २ ॥
हीनान् पुरुषकारेण मामकानद्य संजय ।
पतितान् पात्यमानांश्च हतानेव च शंससि ॥ ३ ॥
संजय! आजकल मेरे पुत्र और सैनिक पुरुषार्थसे हीन हो रहे हैं और शत्रुओंने उन्हें धराशायी किया एवं मार डाला है। प्रतिदिन वे शत्रुओंके हाथसे मारे ही जा रहे हैं। उनके सम्बन्धमें तुम सदा ऐसे ही समाचार देते हो ॥ ३ ॥
युध्यमानान् यथाशक्ति घटमानाञ्जयं प्रति ।
पाण्डवा हि जयन्त्येव जीयन्ते चैव मामकाः ॥ ४ ॥
मेरे बेटे विजयके लिये यथाशक्ति चेष्टा करते और लड़ते हैं, तो भी पाण्डव ही विजयी होते और मेरे पुत्रोंकी ही पराजय होती है ॥ ४ ॥
सोऽहं तीव्राणि दुःखानि दुर्योधनकृतानि च ।
श्रोष्यमि सततं तात दुःसहानि बहूनि च ॥ ५ ॥
तात! ऐसा जान पड़ता है कि मुझे दुर्योधनके कारण सदा अत्यन्त दुःसह एवं तीव्र दुःखकी ही बहुत-सी बातें सुननी पड़ेंगी ॥ ५ ॥
तमुपायं न पश्यामि जीयेरन् येन पाण्डवाः ।
मामका विजयं युद्धे प्राप्नुयुर्येन संजय ॥ ६ ॥
संजय! मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता, जिससे पाण्डव हार जायँ और मेरे पुत्रोंको युद्धमें विजय प्राप्त हो ॥ ६ ॥
संजय उवाच
क्षयं मनुष्यदेहानां गजवाजिरथक्षयम् । शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा तवैवापनयो महान् ॥ ७ ॥ संजयने कहा— राजन्! उस युद्धमें मानवशरीरोंका भारी संहार हुआ है। हाथी, घोड़े और रथोंका भी विनाश देखा गया है। वह सब आप स्थिर होकर सुनिये। यह आपके ही महान् अन्यायका फल है ॥ ७ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु शल्येन पीडितो नवभिः शरैः । पीडयामास संक्रुद्धो मद्राधिपतिमायसैः ॥ ८ ॥ शल्यके बाणोंसे पीड़ित होकर धृष्टद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने लोहेके बने हुए नौ बाणोंसे मद्रराज शल्यको गहरी पीड़ा पहुँचायी ॥ ८ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम पार्षतस्य पराक्रमम् । न्यवारयत यस्तूर्णं शल्यं समितिशोभनम् ॥ ९ ॥ वहाँ हमलोगोंने धृष्टद्युम्नका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि उन्होंने संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले राजा शल्यको तुरंत ही आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ९ ॥
नान्तरं दृश्यते तत्र तयोश्च रथिनोस्तदा । मुहूर्तंमिव तद् युद्धं तयोः सममिवाभवत् ॥ १० ॥ उस समय उन दोनों महारथियोंमें पराक्रमकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था। दो घड़ीतक दोनोंमें समान-सा युद्ध होता रहा ॥ १० ॥
ततः शल्यो महाराज धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । धनुश्चिच्छेद भल्लेन पीतेन निशितेन च ॥ ११ ॥ महाराज! तदनन्तर राजा शल्यने युद्धस्थलमें शाणपर तीक्ष्ण किये हुए पीले रंगके भल्ल नामक बाणसे धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया ॥ ११ ॥
अथैनं शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे । गिरिं जलागमे यद्वज्जलदा जलवृष्टिभिः ॥ १२ ॥ इसके बाद जैसे बादल बरसातमें पर्वतपर जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने धृष्टद्युम्नपर रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करके उन्हें सब ओरसे ढक दिया ॥ १२ ॥
अभिमन्युस्ततः क्रुद्धो धृष्टद्युम्ने च पीडिते । अभिदुद्राव वेगेन मद्रराजरथं प्रति ॥ १३ ॥ तदनन्तर धृष्टद्युम्नके पीड़ित होनेपर क्रोधमें भरे हुए अभिमन्युने मद्रराज शल्यके रथपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ १३ ॥
ततो मद्राधिपरथं कार्ष्णिः प्राप्यातिकोपनः । आर्त्तायनिममेयात्मा विव्याध निशितैः शरैः ॥ १४ ॥ मद्रराजके रथके निकट पहुँचकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न अर्जुनकुमारने अपने पैने बाणोंद्वारा ऋतायनपुत्र राजा शल्यको घायल कर दिया ॥ १४ ॥
ततस्तु तावका राजन् परीप्सन्तोऽर्जुनिं रणे । मद्रराजरथं तूर्णं परिवार्यावतस्थिरे ॥ १५ ॥ राजन्! तब आपके पुत्र रणभूमिमें अभिमन्युको बन्दी बनानेकी इच्छासे तुरंत वहाँ आये और मद्रराज शल्यके रथको चारों ओरसे घेरकर युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १५ ॥
दुर्योधनो विकर्णश्च दुःशासनविविंशती । दुर्मर्षणो दुःसहश्च चित्रसेनोऽथ दुर्मुखः ॥ १६ ॥ सत्यव्रतश्च भद्रं ते पुरुमित्रश्च भारत । एते मद्राधिपरथं पालयन्तः स्थिता रणे ॥ १७ ॥ भारत! आपका भला हो। दुर्योधन, विकर्ण, दुःशासन, विविंशति, दुर्मर्षण, दुःसह, चित्रसेन, दुर्मुख, सत्यव्रत तथा पुरुमित्र—ये आपके पुत्र मद्रराजके रथकी रक्षा करते हुए युद्धभूमिमें डटे हुए थे ॥ १६-१७ ॥
तान् भीमसेनः संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । द्रौपदेयाऽभिमन्युश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १८ ॥ धार्तराष्ट्रान् दश रथान् दशैव प्रत्यवारयन् । नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो विशाम्पते ॥ १९ ॥ आपके इन दस महारथी पुत्रोंको क्रोधमें भरे हुए भीमसेन, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, पाँचों भाई द्रौपदीकुमार और अभिमन्यु—इन दस ही महारथियोंने रोका। प्रजानाथ! ये सब लोग नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार कर रहे थे ॥ १८-१९ ॥
अभ्यवर्तन्त संहृष्टाः परस्परवधैषिणः । ते वै समेयुः संग्रामे राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ २० ॥ राजन्! ये सब एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखकर हर्ष और उत्साहके साथ क्षत्रियोंका सामना करते थे। आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप ही इन सब योद्धाओंकी आपसमें भिड़न्त हुई थी ॥ २० ॥
तस्मिन् दशरथे क्रुद्धे वर्तमाने महाभये । तावकानां परेषां वा प्रेक्षका रथिनोऽभवन् ॥ २१ ॥ जिस समय ये दसों महारथी क्रोधमें भरकर अत्यन्त भयंकर युद्धमें लगे हुए थे, उस समय आपकी और पाण्डवोंकी सेनाके दूसरे रथी दर्शक होकर देखते थे ॥
शस्त्राण्यनेकरूपाणि विसृजन्तो महारथाः । अन्योन्यमभिनर्दन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ २२ ॥ किंतु आपके और पाण्डवोंके वे महारथी वीर एक-दूसरेपर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए गर्जते और युद्ध करते थे ॥ २२ ॥
ते तदा जातसंरम्भाः सर्वेऽन्योन्यं जिघांसवः ।
अन्योन्यमभिमर्दन्तः स्पर्धमानाः परस्परम् ॥ २३ ॥
उस समय उन सबमें क्रोध भरा हुआ था। सभी एक दूसरेके वधकी इच्छा रखते थे। सबमें परस्पर लाग-डाँट थी और सभी सबको कुचलनेकी चेष्टा करते थे ॥ २३ ॥
अन्योन्यस्पर्धया राजन् ज्ञातयः सङ्गता मिथः ।
महास्त्राणि विमुञ्चन्तः समापेतुरमर्षिणः ॥ २४ ॥
महाराज! वे सब आपसमें कुटुम्बी—भाई-बन्धु थे, परंतु परस्पर स्पर्धा रखनेके कारण लड़ रहे थे। एक दूसरेके प्रति अमर्षमें भरकर बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्रहार करते हुए आक्रमण-प्रत्याक्रमण करते थे ॥ २४ ॥
दुर्योधनस्तु संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नं महारणे ।
विव्याध निशितैर्बाणैश्चतुर्भिः समरे द्रुतम् ॥ २५ ॥
दुर्योधनने कुपित होकर उस महासंग्राममें अपने चार तीखे बाणोंद्वारा तुरंत ही धृष्टद्युम्नको बींध दिया ॥
दुर्मर्षणश्च विंशत्या चित्रसेनश्च पञ्चभिः ।
दुर्मुखो नवभिर्बाणैर्दुःसहश्चापि सप्तभिः ॥ २६ ॥
विविंशतिः पञ्चभिश्च त्रिभिर्दुःशासनस्तथा ।
तान् प्रत्यविध्यद् राजेन्द्र पार्षतः शत्रुतापनः ॥ २७ ॥
एकैकं पञ्चविंशत्या दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
दुर्मर्षणने बीस, चित्रसेनने पाँच, दुर्मुखने नौ, दुःसहने सात, विविंशतिने पाँच तथा दुःशासनने तीन बाणोंसे उन सबको बींध डाला। राजेन्द्र! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए दुर्योधन आदिमेंसे प्रत्येकको पचीस-पचीस बाणोंसे घायल किया ॥ २६-२७ १/२ ॥
सत्यव्रतं च समरे पुरुमित्रं च भारत ॥ २८ ॥
अभिमन्युरविध्यत् तु दशभिर्दशभिः शरैः ।
भारत! अभिमन्युने समरभूमिमें सत्यव्रत और पुरुमित्रको दस-दस बाणोंसे पीड़ित किया ॥ २८ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ तु समरे मातुलं मातृनन्दनौ ॥ २९ ॥
अविध्येतां शरैस्तीक्ष्णैस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
माताको आनन्दित करनेवाले माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने अपने मामा शल्यको पैने बाणोंसे घायल कर दिया। यह अद्भुत-सी बात हुई ॥ २९ १/२ ॥
ततः शल्यो महाराज स्वस्रीयौ रथिनां वरौ ॥ ३० ॥
शरैर्बहुभिरानर्च्छत् कृतप्रतिकृतैषिणौ ।
छाद्यमानौ ततस्तौ तु माद्रीपुत्रौ न चलतुः ॥ ३१ ॥
महाराज! तदनन्तर शल्यने किये हुए प्रहारका बदला चुकानेकी इच्छा रखनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ अपने दोनों भानजोंको अनेक बाणोंसे पीड़ित किया। उनके बाणोंसे आच्छादित होनेपर भी नकुल-सहदेव विचलित नहीं हुए ।। ३०-३१ ।।
अथ दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ।
विधित्सुः कलहस्यान्तं गदां जग्राह पाण्डवः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेनने दुर्योधनको देखकर झगड़ेका अन्त कर डालनेकी इच्छासे गदा उठा ली ।। ३२ ।।
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा कैलासमिव शृङ्गिणम् ।
भीमसेनं महाबाहुं पुत्रास्ते प्राद्रवन् भयात् ॥ ३३ ॥
गदा उठाये हुए महाबाहु भीमसेनको एक शिखरसे युक्त कैलास पर्वतके समान उपस्थित देख आपके सभी पुत्र भयके मारे भाग गये ।। ३३ ।।
दुर्योधनस्तु संक्रुद्धो मागधं समचोदयत् ।
अनीकं दशसाहस्रं कुञ्जराणां तरस्विनाम् ॥ ३४ ॥
तब दुर्योधनने कुपित होकर मगधदेशीय दस हजार हाथियोंकी वेगशाली सेनाको युद्धके लिये प्रेरित किया ।। ३४ ।।
गजानीकेन सहितस्तेन राजा सुयोधनः ।
मागधं पुरतः कृत्वा भीमसेनं समभ्ययात् ॥ ३५ ॥
उस गजसेनाके साथ मागधको आगे करके दुर्योधनने भीमसेनपर आक्रमण किया ।। ३५ ।।
आपतन्तं च तं दृष्ट्वा गजानीकं वृकोदरः ।
गदापाणिरवारोहद् रथात् सिंह इवोन्नदन् ॥ ३६ ॥
उस गजसेनाको आते देख भीमसेन हाथमें गदा लेकर सिंहके समान गर्जना करते हुए रथसे उतर पड़े ।। ३६ ।।
अद्रिसारमयीं गुर्वी प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
अभ्यधावद् गजानीकं व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३७ ॥
लोहेकी उस विशाल एवं भारी गदाको लेकर वे मुँह बाये हुए कालके समान उस गजसेनाकी ओर दौड़े ।। ३७ ।।
स गजान् गदया निघ्नन् व्यचरत् समरे बली ।
भीमसेनो महाबाहुः सवज्र इव वासवः ॥ ३८ ॥
बलवान् महाबाहु भीमसेन वज्रधारी इन्द्रके समान गदासे हाथियोंका संहार करते हुए समरांगणमें विचरने लगे ।। ३८ ।।
तस्य नादेन महता मनोहृदयकम्पिना ।
व्यत्यचेष्टन्त संहृत्य गजा भीमस्य गर्जतः ॥ ३९ ॥
मन और हृदयको कँपा देनेवाली गर्जते हुए भीमसेनकी उस भीषण गर्जनासे सब हाथी एकत्र हो भयके मारे निश्चेष्ट एवं अचेत-से हो गये ॥ ३९ ॥
ततस्तु द्रौपदीपुत्राः सौभद्रश्च महारथः ।
नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ४० ॥
पृष्ठं भीमस्य रक्षन्तः शरवर्षेण वारणान् ।
अभ्यवर्षन्त धावन्तो मेघा इव गिरीन् यथा ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् द्रौपदीके पाँचों पुत्र, महारथी अभिमन्यु, नकुल-सहदेव तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न—ये सब लोग भीमसेनके पृष्ठभागकी रक्षा करते हुए हाथियोंपर उसी प्रकार दौड़-दौड़कर बाण-वर्षा करने लगे, जैसे बादल पर्वतोंपर पानीकी बूँदें बरसाते हैं ॥ ४०-४१ ॥
क्षुरैः क्षुरप्रैर्भल्लैश्च पीतैश्चाञ्जलिकैः शितैः ।
व्यहरन्नुत्तमाङ्गानि पाण्डवा गजयोधिनाम् ॥ ४२ ॥
पाण्डव रथी क्षुर, क्षुरप्र, पीले रंगके भल्ल तथा तीखे आंजलिक नामक बाणोंद्वारा हाथीसवार योद्धाओंके मस्तक काट-काटकर गिराने लगे ॥ ४२ ॥
शिरोभिः प्रपतद्भिश्च बाहुभिश्च विभूषितैः ।
अश्मवृष्टिरिवाभाति पाणिभिश्च सहाङ्कुशैः ॥ ४३ ॥
उनके शिरों, बाजूबन्दविभूषित भुजाओं और अंकुशोंसहित हाथोंके गिरनेसे ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे ओले और पत्थरोंकी वर्षा हो रही हो ॥ ४३ ॥
हतोत्तमाङ्गाः स्कन्धेषु गजानां गजयोधिनः ।
अदृश्यन्ताचलाग्रेषु द्रुमा भग्नशिखा इव ॥ ४४ ॥
मस्तक कट जानेपर भी हाथियोंकी पीठपर टिके हुए गजारोही योद्धाओंके धड़ पर्वतके शिखरोंपर स्थित हुए शिखाहीन वृक्षोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ४४ ॥
धृष्टद्युम्नहतानन्यान्पश्याम महागजान् ।
पततः पात्यमानांश्च पार्षतेन महात्मना ॥ ४५ ॥
हमलोगोंोंने धृष्टद्युम्नके द्वारा मारे गये बहुत-से हाथियोंको देखा, महामना द्रुपदकुमारकी मार खाकर बहुत-से हाथी गिरे और गिराये जा रहे थे ॥ ४५ ॥
मागधोऽथ महीपालो गजमैरावणोपमम् ।
प्रेषयामास समरे सौभद्रस्य रथं प्रति ॥ ४६ ॥
इसी समय मगधदेशीय भूपालने युद्धस्थलमें अभिमन्युके रथकी ओर ऐरावतके समान एक विशाल हाथीको प्रेरित किया ॥ ४६ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मागधस्य महाग़जम् ।
जघानैकेषुना वीरः सौभद्रः परवीरहा ॥ ४७ ॥
मगधनरेशके उस विशाल गजको आते देख शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले वीर सुभद्राकुमारने उसे एक ही बाणसे मार डाला ॥ ४७ ॥
तस्यावर्जितनागस्य कार्ष्णिः परपुरंजयः । राज्ञो रजतपुङ्खेन भल्लेनापाहरच्छिरः ॥ ४८ ॥ फिर शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले अर्जुनपुत्र अभिमन्युने मरनेपर भी हाथीको न छोड़नेवाले मगधराजका मस्तक रजतमय पंखवाले भल्लके द्वारा काट गिराया ॥ ४८ ॥
विगाह्य तद् गजानीकं भीमसेनोऽपि पाण्डवः । व्यचरत् समरे मृद्नन् गजानिन्द्रो गिरीनिव ॥ ४९ ॥ उधर पाण्डुनन्दन भीमसेन भी गजसेनामें घुसकर पर्वतोंको विदीर्ण करनेवाले देवेन्द्रके समान हाथियोंको रौंदते हुए समरांगणमें विचरने लगे ॥ ४९ ॥
एकप्रहारनिहतान् भीमसेनेन दन्तिनः । अपश्याम रणे तस्मिन् गिरीन् वज्रहतानिव ॥ ५० ॥ महाराज! उस युद्धस्थलमें हमने वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति भीमसेनके एक ही प्रहारसे दन्तार हाथियोंको भी मरते देखा था ॥ ५० ॥
भग्नदन्तान् भग्नकरान् भग्नसक्थांश्च वारणान् । भग्नपृष्ठत्रिकानन्यान् निहतान् पर्वतोपमान् ॥ ५१ ॥ नदतः सीदतश्चान्यान् विमुखान् समरे गतान् । विद्रुतान् भयसंविग्नांस्तथा विशकृतोऽपरान् ॥ ५२ ॥ किन्हींके दाँत टूट गये, किन्हींकी सूँड़ कट गयी, कितनोंकी जाँघें टूट गयीं, किन्हींकी पीठ टूट गयी और कितने ही पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज मारे गये, कुछ चिग्घाड़ रहे थे, कुछ कष्टसे कराह रहे थे, कुछ युद्धभूमिसे विमुख होकर भागने लगे थे और कुछ भयसे व्याकुल होकर मल-मूत्र कर रहे थे। इन सबको मैंने अपनी आँखों देखा था ॥ ५१-५२ ॥
भीमसेनस्य मार्गेषु पतितान् पर्वतोपमान् । अपश्यं निहतान् नागान् राजन् निष्ठीवतोऽपरान् ।। ५३ ।। भीमसेनके मार्गोंमें उनके द्वारा मारे गये पर्वतोपम हाथी पड़े दिखायी दिये। राजन्! अन्य बहुत-से हाथियोंको मैंने मुँहसे फेन फेंकते देखा था ।। ५३ ।।
वमन्तो रुधिरं चान्ये भिन्नकुम्भा महागजाः । विह्वलन्तो गता भूमिं शैला इव धरातले ।। ५४ ।। कितने ही विशालकाय हाथी खून उगल रहे थे और उनके कुम्भस्थल फट गये थे। बहुत-से व्याकुल होकर इस भूतलपर पर्वतोंके समान पड़े थे ।। ५४ ।।
मेदोरुधिरदिग्धाङ्गो वसामज्जासमुक्षितः । व्यचरत् समरे भीमो दण्डपाणिरिवान्तकः ।। ५५ ।। भीमसेनका सारा शरीर मेदा तथा रक्तसे लिए हो रहा था। वे वसा और मज्जासे नहा गये थे और हाथमें गदा लिये दण्डपाणि यमराजके समान उस युद्धभूमिमें विचर रहे थे ।। ५५ ।।
गजानां रुधिरक्लिन्नां गदां बिभ्रद् वृकोदरः । घोरः प्रतिभयश्चासीत् पिनाकीव पिनाकधृक् ।। ५६ ।। हाथियोंके खूनसे भीगी हुई गदा धारण किये भीमसेन पिनाकधारी भगवान् रुद्रके समान घोर एवं भयंकर दिखायी देते थे ।। ५६ ।।
सम्मथ्यमानाः क्रुद्धेन भीमसेनेन दन्तिनः । सहसा प्राद्रवन् क्लिष्टा मृद्नन्तस्तव वाहिनीम् ।। ५७ ।।
क्रोधमें भरे हुए भीमसेन हाथियोंको मथे डालते थे; अतः वे उनके द्वारा अत्यन्त क्लेश पाकर आपकी सेनाको कुचलते हुए सहसा युद्धस्थलसे भाग चले ॥ ५७ ॥ तं हि वीरं महेष्वासं सौभद्रप्रमुखा रथाः । पर्य्यरक्षन्त युध्यन्तं वज्रायुधमिवामराः ॥ ५८ ॥ जैसे देवता वज्रधारी इन्द्रकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार सुभद्रकुमार आदि पाण्डव योद्धा युद्धमें तत्पर हुए महाधनुर्धर वीर भीमसेनकी सब ओरसे रक्षा करते थे ॥ ५८ ॥ शोणिताक्तां गदां बिभ्रदुक्षितां गजशोणितैः । कृतान्त इव रौद्रात्मा भीमसेनो व्यदृश्यत ॥ ५९ ॥ खूनमें सनी तथा हाथियोंके रक्तसे भीगी हुई गदा लिये रौद्ररूपधारी भीमसेन यमराजके समान दिखायी देते थे ॥ ५९ ॥ व्यायच्छमानं गदया दिक्षु सर्वासु भारत । अपश्याम रणे भीमं नृत्यन्तमिव शंकरम् ॥ ६० ॥ भारत! भीमसेन गदा लेकर सम्पूर्ण दिशाओंमें व्यायाम-सा कर रहे थे। समरभूमिमें भीमको हमलोगोंने ताण्डव-नृत्य करते हुए भगवान् शंकरके समान देखा था ॥ ६० ॥ यमदण्डोपमां गुर्वीमिन्द्राशनिसमस्वनाम् । अपश्याम महाराज रौद्रां विशसनीं गदाम् ॥ ६१ ॥ महाराज! भीमसेनकी भारी और भयंकर गदा सबका संहार करनेवाली है। हमें तो वह यमदण्डके समान दिखायी देती थी। प्रहार करनेपर उससे इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान आवाज होती थी ॥ ६१ ॥ विमिश्रां केशमज्जाभिः प्रदिग्धां रुधिरेण च । पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् ॥ ६२ ॥ रक्तसे भीगी तथा केश और मज्जासे मिली हुई उस गदाको हमने प्रलयकालमें क्रोधसे भरकर समस्त पशुओं (जीवों)-का संहार करनेवाले रुद्रदेवके पिनाकके समान समझा था ॥ ६२ ॥ यथा पशूनां संघातं यष्ट्या पालः प्रकालयेत् । तथा भीमो गजानीकं गदया समकालयत् ॥ ६३ ॥ जैसे चरवाहा पशुओंके झुंडको डंडेसे हाँकता है, उसी प्रकार भीमसेन हाथियोंके समूहको अपनी गदासे हाँक रहे थे ॥ ६३ ॥ गदया वध्यमानास्ते मार्गणैश्च समन्ततः । स्वान्यनीकानि मृद्नन्तः प्राद्रवन् कुञ्जरास्तव ॥ ६४ ॥ महाराज! चारों ओरसे गदा और बाणोंकी मार पड़नेपर आपकी सेनाके वे समस्त हाथी अपने ही सैनिकोंको कुचलते हुए भाग रहे थे ॥ ६४ ॥ महावात इवाभ्राणि विधमित्वा स वारणान् ।
अतिष्ठत् तुमुले भीमः श्मशान इव शूलभृत् ॥ ६५ ॥
जैसे आँधी बादलोंको छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार भीमसेन उस भयंकर युद्धमें हाथियोंकी सेनाको नष्ट करके श्मशानभूमिमें त्रिशूलधारी भगवान् शंकरके समान खड़े थे ॥ ६५ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थदिवसे भीमयुद्धे
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिन भीमसेनका युद्धविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1873)
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़
संजय उवाच
हते तस्मिन् गजानीके पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
भीमसेनं घ्नतेत्येवं सर्वसैन्यान्यचोदयत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! हाथियोंकी उस सेनाके मारे जानेपर आपके पुत्र दुर्योधनने समस्त सैनिकोंको आज्ञा दी कि सब मिलकर भीमसेनको मार डालो ॥ १ ॥
ततः सर्वाण्यनीकानि तव पुत्रस्य शासनात् ।
अभ्यद्रवन् भीमसेनं नदन्तं भैरवान् रवान् ॥ २ ॥
तदनन्तर आपके पुत्रकी आज्ञासे समस्त सेनाएँ भैरव गर्जना करती हुई भीमसेनपर टूट पड़ीं ॥ २ ॥
तं बलौघमपर्यन्तं देवैरपि सुदुःसहम् ।
आपतन्तं सुदुष्पारं समुद्रमिव पर्वणि ॥ ३ ॥
सेनाका वह अनन्त वेग देवताओंके लिये भी दुःसह था। पूर्णिमाको बढ़े हुए समुद्रके समान अपार जान पड़ता था ॥
रथनागाश्वकलिलं शङ्खदुन्दुभिनादितम् ।
अनन्तरथपादातं रजसा सर्वतो वृतम् ॥ ४ ॥
वह सैन्य-समुद्र रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरा हुआ था। शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे कोलाहलपूर्ण हो रहा था। उसमें रथ और पैदलोंकी संख्या नहीं बतायी जा सकती थी तथा उस सेनामें सब ओर धूल व्याप्त हो रही थी ॥ ४ ॥
तं भीमसेनः समरे महोदधिमिवापरम् ।
सेनासागरमक्षोभ्यं वेलेव समवारयत् ॥ ५ ॥
दूसरे महासागरके समान उस अक्षोभ्य सैन्यसमुद्रको युद्धमें भीमसेनने तटप्रदेशकी भाँति रोक दिया ॥ ५ ॥
तदाश्चर्यमपश्याम पाण्डवस्य महात्मनः ।
भीमसेनस्य समरे राजन् कर्मातिमानुषम् ॥ ६ ॥
राजन्! उस समय संग्रामभूमिमें हमलोगोंने महामना पाण्डुनन्दन भीमसेनका अत्यन्त आश्चर्यमय अतिमानुष कर्म देखा था ॥ ६ ॥
उदीर्णान् पार्थिवान् सर्वान् साश्वान् सरथकुञ्जरान् ।