महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1864, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षयं मनुष्यदेहानां गजवाजिरथक्षयम् । शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा तवैवापनयो महान् ॥ ७ ॥ संजयने कहा— राजन्! उस युद्धमें मानवशरीरोंका भारी संहार हुआ है। हाथी, घोड़े और रथोंका भी विनाश देखा गया है। वह सब आप स्थिर होकर सुनिये। यह आपके ही महान् अन्यायका फल है ॥ ७ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु शल्येन पीडितो नवभिः शरैः । पीडयामास संक्रुद्धो मद्राधिपतिमायसैः ॥ ८ ॥ शल्यके बाणोंसे पीड़ित होकर धृष्टद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने लोहेके बने हुए नौ बाणोंसे मद्रराज शल्यको गहरी पीड़ा पहुँचायी ॥ ८ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम पार्षतस्य पराक्रमम् । न्यवारयत यस्तूर्णं शल्यं समितिशोभनम् ॥ ९ ॥ वहाँ हमलोगोंने धृष्टद्युम्नका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि उन्होंने संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले राजा शल्यको तुरंत ही आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ९ ॥
नान्तरं दृश्यते तत्र तयोश्च रथिनोस्तदा । मुहूर्तंमिव तद् युद्धं तयोः सममिवाभवत् ॥ १० ॥ उस समय उन दोनों महारथियोंमें पराक्रमकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था। दो घड़ीतक दोनोंमें समान-सा युद्ध होता रहा ॥ १० ॥
ततः शल्यो महाराज धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । धनुश्चिच्छेद भल्लेन पीतेन निशितेन च ॥ ११ ॥ महाराज! तदनन्तर राजा शल्यने युद्धस्थलमें शाणपर तीक्ष्ण किये हुए पीले रंगके भल्ल नामक बाणसे धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया ॥ ११ ॥
अथैनं शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे । गिरिं जलागमे यद्वज्जलदा जलवृष्टिभिः ॥ १२ ॥ इसके बाद जैसे बादल बरसातमें पर्वतपर जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने धृष्टद्युम्नपर रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करके उन्हें सब ओरसे ढक दिया ॥ १२ ॥
अभिमन्युस्ततः क्रुद्धो धृष्टद्युम्ने च पीडिते । अभिदुद्राव वेगेन मद्रराजरथं प्रति ॥ १३ ॥ तदनन्तर धृष्टद्युम्नके पीड़ित होनेपर क्रोधमें भरे हुए अभिमन्युने मद्रराज शल्यके रथपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ १३ ॥
ततो मद्राधिपरथं कार्ष्णिः प्राप्यातिकोपनः । आर्त्तायनिममेयात्मा विव्याध निशितैः शरैः ॥ १४ ॥ मद्रराजके रथके निकट पहुँचकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न अर्जुनकुमारने अपने पैने बाणोंद्वारा ऋतायनपुत्र राजा शल्यको घायल कर दिया ॥ १४ ॥