भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1865

ततस्तु तावका राजन् परीप्सन्तोऽर्जुनिं रणे । मद्रराजरथं तूर्णं परिवार्यावतस्थिरे ॥ १५ ॥ राजन्! तब आपके पुत्र रणभूमिमें अभिमन्युको बन्दी बनानेकी इच्छासे तुरंत वहाँ आये और मद्रराज शल्यके रथको चारों ओरसे घेरकर युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १५ ॥

दुर्योधनो विकर्णश्च दुःशासनविविंशती । दुर्मर्षणो दुःसहश्च चित्रसेनोऽथ दुर्मुखः ॥ १६ ॥ सत्यव्रतश्च भद्रं ते पुरुमित्रश्च भारत । एते मद्राधिपरथं पालयन्तः स्थिता रणे ॥ १७ ॥ भारत! आपका भला हो। दुर्योधन, विकर्ण, दुःशासन, विविंशति, दुर्मर्षण, दुःसह, चित्रसेन, दुर्मुख, सत्यव्रत तथा पुरुमित्र—ये आपके पुत्र मद्रराजके रथकी रक्षा करते हुए युद्धभूमिमें डटे हुए थे ॥ १६-१७ ॥

तान् भीमसेनः संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । द्रौपदेयाऽभिमन्युश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १८ ॥ धार्तराष्ट्रान् दश रथान् दशैव प्रत्यवारयन् । नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो विशाम्पते ॥ १९ ॥ आपके इन दस महारथी पुत्रोंको क्रोधमें भरे हुए भीमसेन, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, पाँचों भाई द्रौपदीकुमार और अभिमन्यु—इन दस ही महारथियोंने रोका। प्रजानाथ! ये सब लोग नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार कर रहे थे ॥ १८-१९ ॥

अभ्यवर्तन्त संहृष्टाः परस्परवधैषिणः । ते वै समेयुः संग्रामे राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ २० ॥ राजन्! ये सब एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखकर हर्ष और उत्साहके साथ क्षत्रियोंका सामना करते थे। आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप ही इन सब योद्धाओंकी आपसमें भिड़न्त हुई थी ॥ २० ॥

तस्मिन् दशरथे क्रुद्धे वर्तमाने महाभये । तावकानां परेषां वा प्रेक्षका रथिनोऽभवन् ॥ २१ ॥ जिस समय ये दसों महारथी क्रोधमें भरकर अत्यन्त भयंकर युद्धमें लगे हुए थे, उस समय आपकी और पाण्डवोंकी सेनाके दूसरे रथी दर्शक होकर देखते थे ॥

शस्त्राण्यनेकरूपाणि विसृजन्तो महारथाः । अन्योन्यमभिनर्दन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ २२ ॥ किंतु आपके और पाण्डवोंके वे महारथी वीर एक-दूसरेपर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए गर्जते और युद्ध करते थे ॥ २२ ॥

ते तदा जातसंरम्भाः सर्वेऽन्योन्यं जिघांसवः ।