भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1870

भीमसेनस्य मार्गेषु पतितान् पर्वतोपमान् । अपश्यं निहतान् नागान् राजन् निष्ठीवतोऽपरान् ।। ५३ ।। भीमसेनके मार्गोंमें उनके द्वारा मारे गये पर्वतोपम हाथी पड़े दिखायी दिये। राजन्! अन्य बहुत-से हाथियोंको मैंने मुँहसे फेन फेंकते देखा था ।। ५३ ।।

वमन्तो रुधिरं चान्ये भिन्नकुम्भा महागजाः । विह्वलन्तो गता भूमिं शैला इव धरातले ।। ५४ ।। कितने ही विशालकाय हाथी खून उगल रहे थे और उनके कुम्भस्थल फट गये थे। बहुत-से व्याकुल होकर इस भूतलपर पर्वतोंके समान पड़े थे ।। ५४ ।।

मेदोरुधिरदिग्धाङ्गो वसामज्जासमुक्षितः । व्यचरत् समरे भीमो दण्डपाणिरिवान्तकः ।। ५५ ।। भीमसेनका सारा शरीर मेदा तथा रक्तसे लिए हो रहा था। वे वसा और मज्जासे नहा गये थे और हाथमें गदा लिये दण्डपाणि यमराजके समान उस युद्धभूमिमें विचर रहे थे ।। ५५ ।।

गजानां रुधिरक्लिन्नां गदां बिभ्रद् वृकोदरः । घोरः प्रतिभयश्चासीत् पिनाकीव पिनाकधृक् ।। ५६ ।। हाथियोंके खूनसे भीगी हुई गदा धारण किये भीमसेन पिनाकधारी भगवान् रुद्रके समान घोर एवं भयंकर दिखायी देते थे ।। ५६ ।।

सम्मथ्यमानाः क्रुद्धेन भीमसेनेन दन्तिनः । सहसा प्राद्रवन् क्लिष्टा मृद्नन्तस्तव वाहिनीम् ।। ५७ ।।