महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1869, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्यावर्जितनागस्य कार्ष्णिः परपुरंजयः । राज्ञो रजतपुङ्खेन भल्लेनापाहरच्छिरः ॥ ४८ ॥ फिर शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले अर्जुनपुत्र अभिमन्युने मरनेपर भी हाथीको न छोड़नेवाले मगधराजका मस्तक रजतमय पंखवाले भल्लके द्वारा काट गिराया ॥ ४८ ॥
विगाह्य तद् गजानीकं भीमसेनोऽपि पाण्डवः । व्यचरत् समरे मृद्नन् गजानिन्द्रो गिरीनिव ॥ ४९ ॥ उधर पाण्डुनन्दन भीमसेन भी गजसेनामें घुसकर पर्वतोंको विदीर्ण करनेवाले देवेन्द्रके समान हाथियोंको रौंदते हुए समरांगणमें विचरने लगे ॥ ४९ ॥
एकप्रहारनिहतान् भीमसेनेन दन्तिनः । अपश्याम रणे तस्मिन् गिरीन् वज्रहतानिव ॥ ५० ॥ महाराज! उस युद्धस्थलमें हमने वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति भीमसेनके एक ही प्रहारसे दन्तार हाथियोंको भी मरते देखा था ॥ ५० ॥
भग्नदन्तान् भग्नकरान् भग्नसक्थांश्च वारणान् । भग्नपृष्ठत्रिकानन्यान् निहतान् पर्वतोपमान् ॥ ५१ ॥ नदतः सीदतश्चान्यान् विमुखान् समरे गतान् । विद्रुतान् भयसंविग्नांस्तथा विशकृतोऽपरान् ॥ ५२ ॥ किन्हींके दाँत टूट गये, किन्हींकी सूँड़ कट गयी, कितनोंकी जाँघें टूट गयीं, किन्हींकी पीठ टूट गयी और कितने ही पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज मारे गये, कुछ चिग्घाड़ रहे थे, कुछ कष्टसे कराह रहे थे, कुछ युद्धभूमिसे विमुख होकर भागने लगे थे और कुछ भयसे व्याकुल होकर मल-मूत्र कर रहे थे। इन सबको मैंने अपनी आँखों देखा था ॥ ५१-५२ ॥