महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1895, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदिदं समनुप्राप्तं यत् पाण्डूनवमन्यसे ॥ ३८ ॥ तात! इस तरहकी बातें मैंने पहले पुकार-पुकारकर कही हैं, परंतु तुमने उन सबको अनसुनी कर दिया है। तुम जो पाण्डवोंका अपमान करते आये हो, आज उसीका यह फल प्राप्त हुआ है ॥ ३८ ॥ यश्च हेतुरवध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तं शृणुष्व महाबाहो मम कीर्तयतः प्रभो ॥ ३९ ॥ महाबाहो! प्रभो! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पाण्डवोंके अवध्य होनेमें जो हेतु है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ३९ ॥ नास्ति लोकेषु तद् भूतं भविता नो भविष्यति । यो जयेत् पाण्डवान् सर्वान् पालिताञ्छार्ङ्गधन्वना ॥ ४० ॥ (ससुरासुरमर्त्येषु यो विद्यात् तत्त्वतो हरिम् ।) लोकमें ऐसा कोई प्राणी न हुआ है, न है और न होगा, जो शार्ङ्ग-धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित इन सब पाण्डवोंपर विजय पा सके तथा देवता, असुर और मनुष्योंमें ऐसा भी कोई नहीं है, जो उन भगवान् श्रीहरिको यथार्थरूपसे जान सके ॥ ४० ॥ यत् तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्मभिः । पुराणगीतं धर्मज्ञ तच्छृणुष्व यथातथम् ॥ ४१ ॥ तात धर्मज्ञ! पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंने मुझसे जो पुराणप्रतिपादित यथार्थ बातें कही हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४१ ॥ पुरा किल सुराः सर्वे ऋषयश्च समागताः । पितामहमुपासेदुः पर्वते गन्धमादने ॥ ४२ ॥ पहलेकी बात है, समस्त देवता और महर्षि गन्धमादन पर्वतपर आकर पितामह ब्रह्माजीके पास बैठे ॥ ४२ ॥ तेषां मध्ये समासीनः प्रजापतिरपश्यत । विमानं प्रज्वलद् भासा स्थितं प्रवरमम्बरे ॥ ४३ ॥ उस समय उनके बीचमें बैठे हुए प्रजापति ब्रह्माने आकाशमें खड़ा हुआ एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था ॥ ४३ ॥ ध्यानेनावेद्य तद् ब्रह्मा कृत्वा च नियतोऽञ्जलिम् । नमश्चकार हृष्टात्मा पुरुषं परमेश्वरम् ॥ ४४ ॥ अपने मनको संयममें रखनेवाले ब्रह्माजीने ध्यानसे यथार्थ बात जानकर हाथ जोड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उन परम पुरुष परमेश्वरको नमस्कार किया ॥ ४४ ॥ ऋषयस्त्वथ देवाश्च दृष्ट्वा ब्रह्माणमुत्थितम् । स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे पश्यन्तो महदद्भुतम् ॥ ४५ ॥