भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

तदिदं समनुप्राप्तं यत् पाण्डूनवमन्यसे ॥ ३८ ॥ तात! इस तरहकी बातें मैंने पहले पुकार-पुकारकर कही हैं, परंतु तुमने उन सबको अनसुनी कर दिया है। तुम जो पाण्डवोंका अपमान करते आये हो, आज उसीका यह फल प्राप्त हुआ है ॥ ३८ ॥ यश्च हेतुरवध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तं शृणुष्व महाबाहो मम कीर्तयतः प्रभो ॥ ३९ ॥ महाबाहो! प्रभो! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पाण्डवोंके अवध्य होनेमें जो हेतु है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ३९ ॥ नास्ति लोकेषु तद् भूतं भविता नो भविष्यति । यो जयेत् पाण्डवान् सर्वान् पालिताञ्छार्ङ्गधन्वना ॥ ४० ॥ (ससुरासुरमर्त्येषु यो विद्यात् तत्त्वतो हरिम् ।) लोकमें ऐसा कोई प्राणी न हुआ है, न है और न होगा, जो शार्ङ्ग-धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित इन सब पाण्डवोंपर विजय पा सके तथा देवता, असुर और मनुष्योंमें ऐसा भी कोई नहीं है, जो उन भगवान् श्रीहरिको यथार्थरूपसे जान सके ॥ ४० ॥ यत् तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्मभिः । पुराणगीतं धर्मज्ञ तच्छृणुष्व यथातथम् ॥ ४१ ॥ तात धर्मज्ञ! पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंने मुझसे जो पुराणप्रतिपादित यथार्थ बातें कही हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४१ ॥ पुरा किल सुराः सर्वे ऋषयश्च समागताः । पितामहमुपासेदुः पर्वते गन्धमादने ॥ ४२ ॥ पहलेकी बात है, समस्त देवता और महर्षि गन्धमादन पर्वतपर आकर पितामह ब्रह्माजीके पास बैठे ॥ ४२ ॥ तेषां मध्ये समासीनः प्रजापतिरपश्यत । विमानं प्रज्वलद् भासा स्थितं प्रवरमम्बरे ॥ ४३ ॥ उस समय उनके बीचमें बैठे हुए प्रजापति ब्रह्माने आकाशमें खड़ा हुआ एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था ॥ ४३ ॥ ध्यानेनावेद्य तद् ब्रह्मा कृत्वा च नियतोऽञ्जलिम् । नमश्चकार हृष्टात्मा पुरुषं परमेश्वरम् ॥ ४४ ॥ अपने मनको संयममें रखनेवाले ब्रह्माजीने ध्यानसे यथार्थ बात जानकर हाथ जोड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उन परम पुरुष परमेश्वरको नमस्कार किया ॥ ४४ ॥ ऋषयस्त्वथ देवाश्च दृष्ट्वा ब्रह्माणमुत्थितम् । स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे पश्यन्तो महदद्भुतम् ॥ ४५ ॥

ऋषि तथा देवता ब्रह्माजीको खड़े (और हाथ जोड़े) हुए देख स्वयं भी उस परम अद्भुत तेजका दर्शन करते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ४५ ॥ यथावच्च तमभ्यर्च्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः । जगाद जगतः स्रष्टा परं परमधर्मवित् ॥ ४६ ॥ ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परम धर्मज्ञ, जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने उन तेजोमय परम पुरुषका यथावत् पूजन करके उनकी स्तुति की ॥ ४६ ॥ विश्वावसुर्विश्वमूर्तिर्विश्वेशो विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च । विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्माद् योगात्मानं दैवतं त्वामुपैमि ॥ ४७ ॥ प्रभो! आप सम्पूर्ण विश्वको आच्छादित करनेवाले, विश्वस्वरूप और विश्वके स्वामी हैं। विश्वमें सब ओर आपकी सेना है। यह विश्व आपका कार्य है। आप सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं। इसीलिये आपको विश्वेश्वर और वासुदेव कहते हैं। आप योगस्वरूप देवता हैं, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ४७ ॥ जय विश्व महादेव जय लोकहिते रत । जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर ॥ ४८ ॥ विश्वरूप महादेव! आपकी जय हो, लोकहितमें लगे रहनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले योगीश्वर! आपकी जय हो। योगके आदि और अन्त! आपकी जय हो ॥ ४८ ॥ पद्मगर्भ विशालाक्ष जय लोकेश्वरेश्वर । भूतभव्यभवन्नाथ जय सौम्यात्मजात्मज ॥ ४९ ॥ असंख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण । नारायण सुदुष्पार जय शार्ङ्गधनुर्धर ॥ ५० ॥ आपकी नाभिसे आदि कमलकी उत्पत्ति हुई है, आपके नेत्र विशाल हैं, आप लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं; आपकी जय हो। भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी! आपकी जय हो। आपका स्वरूप सौम्य है, मैं स्वयम्भू ब्रह्मा आपका पुत्र हूँ। आप असंख्य गुणोंके आधार और सबको शरण देनेवाले हैं, आपकी जय हो। शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले नारायण! आपकी महिमाका पार पाना बहुत ही कठिन है, आपकी जय हो ॥ ४९-५० ॥ जय सर्वगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय । विश्वेश्वर महाबाहो जय लोकार्थतत्पर ॥ ५१ ॥ आप समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न, विश्वमूर्ति और निरामय हैं; आपकी जय हो। जगत्का अभीष्ट साधन करनेवाले महाबाहु विश्वेश्वर! आपकी जय हो ॥ ५१ ॥ महोरग वराहाद्य हरिकेश विभो जय ।

हरिवास दिशामीश विश्ववासामिताव्यय ॥ ५२ ॥
आप महान् शेषनाग और महावाराह-रूप धारण करनेवाले हैं, सबके आदि कारण हैं। हरिकेश! प्रभो! आपकी जय हो, आप पीताम्बरधारी, दिशाओंके स्वामी, विश्वके आधार, अप्रमेय और अविनाशी हैं ॥ ५२ ॥

व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सत्क्रिय ।
असंख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीर कामद ॥ ५३ ॥
व्यक्त और अव्यक्त—सब आपहीका स्वरूप है, आपके रहनेका स्थान असीम-अनन्त है, आप इन्द्रियोंके नियन्ता हैं। आपके सभी कर्म शुभ-ही-शुभ हैं। आपकी कोई इयत्ता नहीं है, आप आत्मस्वरूपके ज्ञाता, स्वभावतः गम्भीर और भक्तोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले हैं; आपकी जय हो ॥ ५३ ॥

अनन्तविदित ब्रह्मन् नित्य भूतविभावन ।
कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह ॥ ५४ ॥
ब्रह्मन्! आप अनन्तबोधस्वरूप हैं, नित्य हैं और सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं। आपको कुछ करना बाकी नहीं है, आपकी बुद्धि पवित्र है, आप धर्मका तत्त्व जाननेवाले और विजयप्रदाता हैं ॥ ५४ ॥

गुह्यात्मन् सर्वयोगात्मन् स्फुटं सम्भूतसम्भव ।
भूताद्य लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन ॥ ५५ ॥
पूर्णयोगस्वरूप परमात्मन्! आपका स्वरूप गूढ होता हुआ भी स्पष्ट है। अबतक जो हो चुका है और जो हो रहा है, सब आपका ही रूप है। आप सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण और लोकतत्त्वके स्वामी हैं। भूतभावन! आपकी जय हो ॥ ५५ ॥

आत्मयोने महाभाग कल्पसंक्षेप तत्पर ।
उद्भावनमनोभाव जय ब्रह्म जनप्रिय ॥ ५६ ॥
आप स्वयम्भू हैं, आपका सौभाग्य महान् है। आप इस कल्पका संहार करनेवाले एवं विशुद्ध परब्रह्म हैं। ध्यान करनेसे अन्तःकरणमें आपका आविर्भाव होता है, आप जीवमात्रके प्रियतम परब्रह्म हैं, आपकी जय हो ॥ ५६ ॥

निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर ।
अमृतोद्भव सद्भाव मुक्तात्मन् विजयप्रद ॥ ५७ ॥
आप स्वभावतः संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त रहते हैं, आप ही सम्पूर्ण कामनाओंके स्वामी परमेश्वर हैं। अमृतकी उत्पत्तिके स्थान, सत्यस्वरूप, मुक्तात्मा और विजय देनेवाले आप ही हैं ॥ ५७ ॥

प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महाबल ।
आत्मभूत महाभूत सत्त्वात्मन् जय सर्वदा ॥ ५८ ॥

देव! आप ही प्रजापतियोंके भी पति, पद्मनाभ और महाबली हैं। आत्मा और महाभूत भी आप ही हैं। सत्त्वस्वरूप परमेश्वर! सदा आपकी जय हो ।। ५८ ।। पादौ तव धरा देवी दिशो बाहू दिवं शिरः । मूर्तिस्तेऽहं सुराः कायश्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ।। ५९ ।। पृथ्वीदेवी आपके चरण हैं, दिशाएँ बाहु हैं और द्युलोक मस्तक है। मैं ब्रह्मा आपका शरीर, देवता अंग-प्रत्यंग और चन्द्रमा तथा सूर्य नेत्र हैं ।। ५९ ।। बलं तपश्च सत्यं च कर्म धर्मात्मकं तव । तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवाः ।। ६० ।। तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है। अग्नि आपका तेज, वायु साँस और जल पसीना है ।। ६० ।। अश्विनौ श्रवणौ नित्यं देवी जिह्वा सरस्वती । वेदाः संस्कारनिष्ठा हि त्वयीदं जगदाश्रितम् ।। ६१ ।। अश्विनीकुमार आपके कान और सरस्वती देवी आपकी जिह्वा हैं। वेद आपकी संस्कारनिष्ठा हैं। यह जगत् सदा आपहीके आधारपर टिका हुआ है ।। ६१ ।। न संख्यानं परीमाणं न तेजो न पराक्रमम् । न बलं योगयोगीश जानीमस्ते न सम्भवम् ।। ६२ ।। योग-योगीश्वर! हम न तो आपकी संख्या जानते हैं, न परिमाण। आपके तेज, पराक्रम और बलका भी हमें पता नहीं है। हम यह भी नहीं जानते कि आपका आविर्भाव कैसे होता है ।। ६२ ।। त्वद्भक्तिनिरता देव नियमैस्त्वां समाश्रिताः । अर्चयामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम् ।। ६३ ।। ऋषयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । पिशाचा मानुषाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ।। ६४ ।। एवमादि मया सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् । देव! हम तो आपकी उपासनामें लगे रहते हैं। आपके नियमोंका पालन करते हुए आपके ही शरण हैं। विष्णो! हम सदा आप परमेश्वर एवं महेश्वरका पूजन ही करते हैं। आपकी ही कृपासे हमने पृथ्वीपर ऋषि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, मनुष्य, मृग, पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े आदिकी सृष्टि की है ।। ६३-६४ १/२ ।। पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दुःखप्रनाशन ।। ६५ ।। त्वं गतिः सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगद्गुरुः । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधाः सदा ।। ६६ ।। पद्मनाभ! विशाललोचन! दुःखहारी श्रीकृष्ण! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रय और नेता हैं, आप ही संसारके गुरु हैं। देवेश्वर! आपकी कृपादृष्टि होनेसे ही सब देवता सदा सुखी

रहते हैं ॥ ६५-६६ ॥ पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात् सदाभवत् । तस्माद् भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥ ६७ ॥ देव! आपके ही प्रसादसे पृथिवी सदा निर्भय रही है, इसलिये विशाललोचन! आप पुनः पृथ्वीपर यदुवंशमें अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये ॥ ६७ ॥ धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च । जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे विभो ॥ ६८ ॥ प्रभो! धर्मकी स्थापना, दैत्योंके वध और जगत्की रक्षाके लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये ॥ यत् तत् परमकं गुह्यं त्वत्प्रसादादिदं विभो । वासुदेव तदेतत् ते मयोद्गीतं यथातथम् ॥ ६९ ॥ वासुदेव! आप ही पूर्णतम परमेश्वर हैं। आपका जो परम गुह्य यथार्थस्वरूप है, उसीका यहाँ इस रूपमें आपकी कृपासे ही गान किया गया है ॥ ६९ ॥ सृष्ट्वा संकर्षणं देवं स्वयमात्मानमात्मना । कृष्ण त्वमात्मनासाक्षीः प्रद्युम्नं चात्मसम्भवम् ॥ ७० ॥ श्रीकृष्ण! आपने आत्माद्वारा स्वयं अपने-आपको ही संकर्षणदेवके रूपमें प्रकट करके अपने ही द्वारा आत्मजस्वरूप प्रद्युम्नकी सृष्टि की है ॥ ७० ॥ प्रद्युम्नादनिरुद्धं त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् । अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम् ॥ ७१ ॥ प्रद्युम्नसे आपने ही उन अनिरुद्धको प्रकट किया है जिन्हें ज्ञानीजन अविनाशी विष्णुरूपसे जानते हैं। उन विष्णुरूप अनिरुद्धने ही मुझ लोकधाता ब्रह्माकी सृष्टि की है ॥ ७१ ॥ वासुदेवमयः सोऽहं त्वयैवास्मि विनिर्मितः । (तस्माद् याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना ।) विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ॥ ७२ ॥ प्रभो! इस प्रकार आपने ही मेरी सृष्टि की है। आपसे अभिन्न होनेके कारण मैं भी वासुदेवमय हूँ। लोकेश्वर! इसलिये याचना करता हूँ कि आप अपने-आपको स्वयं ही (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध)—इन चार रूपोंमें विभक्त करके मानव-शरीर ग्रहण कीजिये ॥ ७२ ॥ तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय वै । धर्मं प्राप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्स्यसि तत्त्वतः ॥ ७३ ॥ वहाँ सब लोगोंके सुखके लिये असुरोंका वध करके धर्म और यशका विस्तार कीजिये। अन्तमें अवतारका उद्देश्य पूर्ण करके आप पुनः अपने पारमार्थिक स्वरूपसे संयुक्त हो

जायेंगे ।। ७३ ।।

त्वां हि ब्रह्मर्षयो लोके देवाश्चामितविक्रम । तैस्तैर्हि नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम् ।। ७४ ।।

अमित पराक्रमी परमेश्वर! संसारमें महर्षि और देवगण एकाग्रचित्त हो उन-उन लीलानुसारी नामोंद्वारा आपके परमात्मस्वरूपका गान करते रहते हैं ।। ७४ ।।

स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसंघाः कृत्वाऽऽश्रयं त्वां वरदं सुबाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ।। ७५ ।।

सुबाहो! आप वरदायक प्रभुका ही आश्रय लेकर समस्त प्राणिसमुदाय आपमें ही स्थित हैं। ब्राह्मणलोग आपको आदि, मध्य और अन्तसे रहित, किसी सीमाके सम्बन्धसे शून्य (असीम) तथा लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये सेतुस्वरूप बताते हैं ।। ७५ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विष्णोपाख्याने पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ।। ६५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विष्णोपाख्यानविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६५ ।।

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ७६ श्लोक हैं।]


१. शक्तिसे तात्पर्य यहाँ पाण्डवोंकी शक्तिसे है। २. मेरे पुत्रोंकी बार-बार पराजयका क्या कारण है, वही कारणविषयक प्रश्न है।

अध्याय (पृष्ठ 1901)

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्षष्टितमोऽध्यायः

नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन

भीष्म उवाच

ततः स भगवान् देवो लोकानामीश्वरेश्वरः ।
ब्रह्माणं प्रत्युवाचेदं स्निग्धगम्भीरया गिरा ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**दुर्योधन! तब लोकेश्वरोंके भी ईश्वर दिव्यरूपधारी श्रीभगवान्‌ने स्नेहमधुर गम्भीर वाणीमें ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

विदितं तात योगासे सर्वमेतत् तवेप्सितम् ।
तथा तद् भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ २ ॥
‘तात! तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा है, वह सब मुझे योगबलसे ज्ञात हो गयी है। उसके अनुसार ही सब कार्य होगा’—ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २ ॥

ततो देवर्षिगन्धर्वा विस्मयं परमं गताः ।
कौतूहलपराः सर्वे पितामहमथाब्रुवन् ॥ ३ ॥
तब देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी बड़े विस्मयमें पड़े। उन सबने अत्यन्त उत्सुक होकर पितामह ब्रह्माजीसे कहा— ॥ ३ ॥

को न्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद् विभो । वाग्भिः स्तुतो वरिष्ठाभिः श्रोतुमिच्छाम तं वयम् ॥ ४ ॥ 'प्रभो! आपने विनयपूर्वक प्रणाम करके श्रेष्ठ वचनोंद्वारा जिनकी स्तुति की है, ये कौन थे? हम उनके विषयमें सुनना चाहते हैं' ॥ ४ ॥

एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाच पितामहः । देवब्रह्मर्षिगन्धर्वान् सर्वान् मधुरया गिरा ॥ ५ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् ब्रह्माने उन समस्त देवताओं, ब्रह्मर्षियों और गन्धर्वोंसे मधुर वाणीमें कहा— ॥ ५ ॥

यत् तत् परं भविष्यं च भवितव्यं च यत्परम् । भूतात्मा च प्रभुश्चैव ब्रह्म यच्च परं पदम् ॥ ६ ॥ तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः । जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः ॥ ७ ॥ मानुषं लोकमातिष्ठ वासुदेव इति श्रुतः । असुराणां वधार्थाय सम्भवस्व महीतले ॥ ८ ॥ 'श्रेष्ठ देवताओ! जो परम तत्त्व हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों जिनके उत्कृष्ट स्वरूप हैं तथा जो इन सबसे विलक्षण हैं, जिन्हें सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा और सर्वशक्तिमान् प्रभु कहा गया है, जो परम ब्रह्म और परम पदके नामसे विख्यात हैं, उन्हीं परमात्माने मुझे

दर्शन देकर मुझसे प्रसन्न हो बातचीत की है। मैंने उन जगदीश्वरसे सम्पूर्ण जगत्पर कृपा करनेके लिये यों प्रार्थना की है कि प्रभो! आप वासुदेव नामसे विख्यात होकर कुछ कालतक मनुष्यलोकमें रहें और असुरोंके वधके लिये इस भूतलपर अवतीर्ण हों ॥ ६—८॥

संग्रामे निहता ये ते दैत्यदानवराक्षसाः । त इमे नृषु सम्भूता घोररूपा महाबलाः ॥ ९ ॥ ‘जो-जो दैत्य, दानव तथा राक्षस संग्रामभूमिमें मारे गये थे, वे मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए हैं और अत्यन्त बलवान् होकर जगत्के लिये भयंकर बन बैठे हैं ॥ ९ ॥

तेषां वधार्थं भगवान् नरेण सहितो वशी । मानुषीं योनिमास्थाय चरिष्यति महीतले ॥ १० ॥ ‘उन सबका वध करनेके लिये सबको वशमें करनेवाले भगवान् नारायण नरके साथ मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण होकर भूतलपर विचरेंगे ॥ १० ॥

नरनारायणौ यौ तौ पुराणावृषिसत्तमौ । सहितौ मानुषे लोके सम्भूतावमितद्युती ॥ ११ ॥ ‘ऋषियोंमें श्रेष्ठ जो पुरातन महर्षि अमित तेजस्वी नर और नारायण हैं, वे एक साथ मानवलोकमें अवतीर्ण होंगे ॥

अजेयौ समरे यत्तौ सहितैरमरैरपि । मूढास्त्वेतौ न जानन्ति नरनारायणावृषी ॥ १२ ॥ ‘युद्धभूमिमें यदि वे विजयके लिये यत्नशील हों तो सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते। मूढ़ मनुष्य उन नर-नारायण ऋषिको नहीं जान सकेंगे ॥

तस्याहमग्रजः पुत्रः सर्वस्य जगतः प्रभुः । वासुदेवोऽर्चनीयो वः सर्वलोकमहेश्वरः ॥ १३ ॥ ‘सम्पूर्ण जगत्का स्वामी मैं ब्रह्मा उन भगवान्‌का ज्येष्ठ पुत्र हूँ। तुम सब लोगोंको उन सर्वलोकमहेश्वर भगवान् वासुदेवकी आराधना करनी चाहिये ॥ १३ ॥

तथा मनुष्योऽयमिति कदाचित् सुरसत्तमाः । नावज्ञेयो महावीर्यः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ १४ ॥ ‘सुरश्रेष्ठगण! शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन महापराक्रमी भगवान् वासुदेवका ‘ये मनुष्य हैं’ ऐसा समझकर अनादर नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥

एतत् परमकं गुह्यमेतत् परमकं पदम् । एतत् परमकं ब्रह्म एतत् परमकं यशः ॥ १५ ॥ एतदक्षरमव्यक्तमेतद् वै शाश्वतं महः । ‘ये भगवान् ही परम गुह्य हैं। ये ही परम पद हैं। ये ही परम ब्रह्म हैं। ये ही परम यश हैं और ये ही अक्षर, अव्यक्त एवं सनातन तेज हैं ॥ १५ १/२ ॥

यत् तत् पुरुषसंज्ञं वै गीयते ज्ञायते न च ॥ १६ ॥
एतत् परमकं तेज एतत् परमकं सुखम् ।
एतत् परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा ॥ १७ ॥
‘ये ही पुरुष नामसे कहे जाते हैं, किंतु इनका वास्तविक रूप जाना नहीं जा सकता। ये ही विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीके द्वारा परम सुख, परम तेज और परम सत्य कहे गये हैं॥ १६-१७॥
तस्मात् सेन्द्रैः सुरैः सर्वैर्लोकैश्चामितविक्रमः ।
नावज्ञेयो वासुदेवो मानुषोऽयमिति प्रभुः ॥ १८ ॥
‘इसलिये ‘ये मनुष्य हैं,’ ऐसा समझकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओं तथा संसारके मनुष्योंको अमित पराक्रमी भगवान् वासुदेवकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये॥
यश्च मानुषमात्रोऽयमिति ब्रूयात् स मन्दधीः ।
हृषीकेशमवज्ञानात् तमाहुः पुरुषाधमम् ॥ १९ ॥
‘जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी इन भगवान् वासुदेवको केवल मनुष्य कहता है, वह मूर्ख है। भगवान्‌की अवहेलना करनेके कारण उसे नराधम कहा गया है॥ १९॥
योगिनं तं महात्मानं प्रविष्टं मानुषीं तनुम् ।
अवमन्येद् वासुदेवं तमाहुस्तामसं जनाः ॥ २० ॥
‘भगवान् वासुदेव साक्षात् परमात्मा हैं और योगशक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण उन्होंने मानव-शरीरमें प्रवेश किया है। जो उनकी अवहेलना करता है, उसे ज्ञानी पुरुष तमोगुणी बताते हैं॥ २०॥
देवं चराचरात्मानं श्रीवत्साङ्कं सुवर्चसम् ।
पद्मनाभं च जानाति तमाहुस्तामसं बुधाः ॥ २१ ॥
‘जो चराचरस्वरूप श्रीवत्सचिह्नभूषित उत्तम कान्तिसे सम्पन्न भगवान् पद्मनाभको नहीं जानता, उसे विद्वान् पुरुष तमोगुणी कहते हैं॥ २१॥
किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयंकरम् ।
अवजानन् महात्मानं घोरे तमसि मज्जति ॥ २२ ॥
‘जो किरीट और कौस्तुभमणि धारण करनेवाले तथा मित्रों (भक्तजनों)-को अभय देनेवाले हैं, उन परमात्माकी अवहेलना करनेवाला मनुष्य घोर नरकमें डूबता है॥ २२॥
एवं विदित्वा तत्त्वार्थं लोकानामीश्वरेश्वरः ।
वासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोकैः सुरोत्तमाः ॥ २३ ॥
‘सुरश्रेष्ठगण! इस प्रकार तात्त्विक वस्तुको समझकर सब लोगोंको लोकेश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करना चाहिये’॥ २३॥
भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा स भगवान् देवान् सर्षिगणान् पुरा । विसृज्य सर्वभूतात्मा जगाम भवनं स्वकम् ॥ २४ ॥ भीष्मजी कहते हैं—दुर्योधन! देवताओं तथा ऋषियोंसे ऐसा कहकर पूर्वकालमें सर्वभूतात्मा भगवान् ब्रह्माने उन सबको विदा कर दिया। फिर वे अपने लोकको चले गये ॥ २४ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽप्सरसोऽपि च । कथां तां ब्रह्मणा गीतां श्रुत्वा प्रीता दिवं ययुः ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्माजीकी कही हुई उस परमार्थ-चर्चाको सुनकर देवता, गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ—ये सभी प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २५ ॥

एतच्छ्रुतं मया तात ऋषीणां भावितात्मनाम् । वासुदेवं कथयतां समवाये पुरातनम् ॥ २६ ॥ तात! एक समय शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियोंका एक समाज जुटा हुआ था, जिसमें वे पुरातन भगवान् वासुदेवकी माहात्म्य-कथा कह रहे थे। उन्हींके मुँहसे मैंने ये सब बातें सुनी हैं ॥ २६ ॥

रामस्य जामदग्न्यस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः । व्यासनारदयोश्चापि सकाशाद् भरतर्षभ ॥ २७ ॥ भरतश्रेष्ठ! इसके सिवा जमदग्निनन्दन परशुराम, बुद्धिमान् मार्कण्डेय, व्यास तथा नारदसे भी मैंने यह बात सुनी है ॥ २७ ॥

एतमर्थं च विज्ञाय श्रुत्वा च प्रभुमव्ययम् । वासुदेवं महात्मानं लोकानामीश्वरेश्वरम् ॥ २८ ॥ (जानामि भरतश्रेष्ठ कृष्णं नारायणं प्रभुम् ।) भरतकुलभूषण! इस विषयको सुन और समझकर मैं वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको अविनाशी प्रभु परमात्मा लोकेश्वरेश्वर और सर्वशक्तिमान् नारायण जानता हूँ ॥ २८ ॥

यस्य चैवात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता । कथं न वासुदेवोऽयमर्च्यश्चेज्यश्च मानवैः ॥ २९ ॥ सम्पूर्ण जगत्‌के पिता ब्रह्मा जिनके पुत्र हैं, वे भगवान् वासुदेव मनुष्योंके लिये आराधनीय तथा पूजनीय कैसे नहीं हैं? ॥ २९ ॥

वारितोऽसि मया तात मुनिभिर्वेदपारगैः । मा गच्छ संयुगं तेन वासुदेवेन धन्विना ॥ ३० ॥ मा पाण्डवैः सार्धमिति तत् त्वं मोहान्न बुध्यसे । मन्ये त्वां राक्षसं क्रूरं तथा चासि तमोवृतः ॥ ३१ ॥

तात! वेदोंके पारंगत विद्वान् महर्षियोंने तथा मैंने तुमको मना किया था कि तुम धनुर्धर भगवान् वासुदेवके साथ विरोध न करो, पाण्डवोंके साथ लोहा न लो; परंतु मोहवश तुमने इन बातोंका कोई मूल्य नहीं समझा। मैं समझता हूँ, तुम कोई क्रूर राक्षस हो; क्योंकि राक्षसोंके ही समान तुम्हारी बुद्धि सदा तमोगुणसे आच्छन्न रहती है ।। ३०-३१ ।।

यस्माद् द्विषि गोविन्दं पाण्डवं तं धनंजयम् । नरनारायणौ देवौ कोऽन्यो द्विष्याद्धि मानवः ।। ३२ ।। तुम भगवान् गोविन्द तथा पाण्डुनन्दन धनंजयसे द्वेष करते हो। वे दोनों ही नर और नारायण देव हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य उनसे द्वेष कर सकता है? ।। ३२ ।।

तस्माद् ब्रवीमि ते राजन्नेष वै शाश्वतोऽव्ययः । सर्वलोकमयो नित्यः शास्ता धात्रीधरो ध्रुवः ।। ३३ ।। राजन्! इसलिये तुम्हें यह बता रहा हूँ कि ये भगवान् श्रीकृष्ण सनातन, अविनाशी, सर्वलोकस्वरूप, नित्य शासक, धरणीधर एवं अविचल हैं ।। ३३ ।।

यो धारयति लोकांस्त्रींश्चराचरगुरुः प्रभुः । योद्धा जयश्च जेता च सर्वप्रकृतिरीश्वरः ।। ३४ ।। ये चराचरगुरु भगवान् श्रीहरि तीनों लोकोंको धारण करते हैं। ये ही योद्धा हैं, ये ही विजय हैं और ये ही विजयी हैं। सबके कारणभूत परमेश्वर भी ये ही हैं ।। ३४ ।।

राजन् सर्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जितः । यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ।। ३५ ।। राजन्! ये श्रीहरि सर्वस्वरूप और तम एवं रागसे रहित हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ।। ३५ ।।

तस्य माहात्म्ययोगेन योगेनात्ममयेन च । धृताः पाण्डुसुता राजन् जयश्चैषां भविष्यति ।। ३६ ।। उनके माहात्म्ययोगसे तथा आत्मस्वरूपयोगसे समस्त पाण्डव सुरक्षित हैं। राजन्! इसीलिये इनकी विजय होगी ।। ३६ ।।

श्रेयोयुक्तां सदा बुद्धिं पाण्डवानां दधाति यः । बलं चैव रणे नित्यं भयेभ्यश्चैव रक्षति ।। ३७ ।। वे पाण्डवोंको सदा कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करते हैं, युद्धमें बल देते हैं और भयसे नित्य उनकी रक्षा करते हैं ।। ३७ ।।

स एष शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमयः शिवः । वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत ।। ३८ ।। भारत! जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वे सनातन देवता सर्वगुह्यमय कल्याणस्वरूप परमात्मा ही 'वासुदेव' नामसे जाननेयोग्य हैं ।। ३८ ।।

ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्च कृतलक्षणैः ।

सेव्यतेऽभ्यर्च्यते चैव नित्ययुक्तैः स्वकर्मभिः ॥ ३९ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुभ लक्षणसम्पन्न शूद्र—ये सभी नित्य तत्पर होकर अपने कर्मोंद्वारा इन्हींकी सेवा-पूजा करते हैं ॥ ३९ ॥
द्वापरस्य युगस्यान्ते आदौ कलियुगस्य च ।
सात्वतं विधिमास्थाय गीतः संकर्षणेन वै ॥ ४० ॥
(कृष्णेति नाम्ना विख्यात इमं लोकं स रक्षति ।)
द्वापरयुगके अन्त और कलियुगके आदिमें संकर्षणने श्रीकृष्णोपासनाकी विधिका आश्रय ले इन्हींकी महिमाका गान किया है। ये ही श्रीकृष्णनामसे विख्यात होकर इस लोककी रक्षा करते हैं ॥ ४० ॥
स एष सर्वं सुरमर्त्यलोकं
समुद्रकक्ष्यान्तरितां पुरीं च ।
युगे युगे मानुषं चैव वासं
पुनः पुनः सृजते वासुदेवः ॥ ४१ ॥
ये भगवान् वासुदेव ही युग-युगमें देवलोक, मर्त्यलोक तथा समुद्रसे घिरी हुई द्वारिका नगरीका निर्माण करते हैं और ये ही बारंबार मनुष्यलोकमें अवतार ग्रहण करते हैं ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं।]

अध्याय (पृष्ठ 1908)

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा

दुर्योधन उवाच

वासुदेवो महद् भूतं सर्वलोकेषु कथ्यते ।
तस्यागमं प्रतिष्ठां च ज्ञातुमिच्छे पितामह ॥ १ ॥

दुर्योधनने पूछा— पितामह! वासुदेव श्रीकृष्णको सम्पूर्ण लोकोंमें महान् बताया जाता है; अतः मैं उनकी उत्पत्ति और स्थितिके विषयमें जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

वासुदेवो महद् भूतं सर्वदैवतदैवतम् ।
न परं पुण्डरीकाक्षाद् दृश्यते भरतर्षभ ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— भरतश्रेष्ठ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वास्तवमें महान् हैं। वे सम्पूर्ण देवताओंके भी देवता हैं। कमलनयन श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ २ ॥

मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयत्यद्भुतं महत् ।
सर्वभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥

आपो वायुश्च तेजश्च त्रयमेतदकल्पयत् । मार्कण्डेयजी भगवान् गोविन्दके विषयमें अत्यन्त अद्भुत बातें कहते हैं। वे भगवान् ही सर्वभूतमय हैं और वे ही सबके आत्मस्वरूप महात्मा पुरुषोत्तम हैं। सृष्टिके आरम्भमें इन्हीं परमात्माने जल, वायु और तेज—इन तीन भूतों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि की थी ॥ ३ १/२ ॥

स सृष्ट्वा पृथिवीं देवीं सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ॥ ४ ॥ अप्सु वै शयनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः । सर्वतेजोमयो देवो योगात् सुषुवाप तत्र ह ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वर इन भगवान् श्रीहरिने पृथ्वीदेवी-की सृष्टि करके जलमें शयन किया। वे महात्मा पुरुषोत्तम सर्वतेजोमय देवता योगशक्तिसे उस जलमें सोये ॥ ४-५ ॥

मुखतः सोऽग्निमसृजत् प्राणाद् वायुमथापि च । सरस्वतीं च वेदांश्च मनसः ससृजेऽच्युतः ॥ ६ ॥ उन अच्युतने अपने मुखसे अग्निकी, प्राणसे वायुकी तथा मनसे सरस्वतीदेवी और वेदोंकी रचना की ॥ ६ ॥

एष लोकान् ससर्जादौ देवांश्च ऋषिभिः सह । निधनं चैव मृत्युं च प्रजानां प्रभवाप्ययौ ॥ ७ ॥ इन्होंने ही सर्गके आरम्भमें सम्पूर्ण लोकों तथा ऋषियोंसहित देवताओंकी रचना की थी। ये ही प्रलयके अधिष्ठान और मृत्युस्वरूप हैं। प्रजाकी उत्पत्ति और विनाश इन्हींसे होते हैं ॥ ७ ॥

एष धर्मश्च धर्मज्ञो वरदः सर्वकामदः । एष कर्ता च कार्यं च पूर्वदेवः स्वयम्प्रभुः ॥ ८ ॥ ये धर्मज्ञ, वरदाता, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले तथा धर्मस्वरूप हैं। ये ही कर्ता, कार्य, आदिदेव तथा स्वयं सर्वसमर्थ हैं ॥ ८ ॥

भूतं भव्यं भविष्यच्च पूर्वमेतदकल्पयत् । उभे संध्ये दिशः खं च नियमांश्च जनार्दनः ॥ ९ ॥ भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी सृष्टि भी पूर्वकालमें इन्हींके द्वारा हुई है। इन जनार्दनने ही दोनों संध्याओं, दसों दिशाओं, आकाश तथा नियमोंकी रचना की है ॥ ९ ॥

ऋषींश्चैव हि गोविन्दस्तपश्चैवाभ्यकल्पयत् । स्रष्टारं जगतश्चापि महात्मा प्रभुरव्ययः ॥ १० ॥ महात्मा अविनाशी प्रभु गोविन्दने ही ऋषियों तथा तपस्याकी रचना की है। जगत्स्रष्टा प्रजापतिको भी उन्होंने ही उत्पन्न किया है ॥ १० ॥

अग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमकल्पयत् । तस्मान्नारायणो जज्ञे देवदेवः सनातनः ॥ ११ ॥

उन पूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णने पहले सम्पूर्ण भूतोंके अग्रज संकर्षणको प्रकट किया, उनसे सनातन देवाधिदेव नारायणका प्रादुर्भाव हुआ ।। ११ ।।

नाभौ पद्मं बभूवास्य सर्वलोकस्य सम्भवात् । तस्मात् पितामहो जातस्तस्माज्जातास्त्विमाः प्रजाः ।। १२ ।। नारायणकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ। सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत उस कमलसे पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीसे ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं ।। १२ ।।

शेषं चाकल्पयद् देवमनन्तं विश्वरूपिणम् । यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम् ।। १३ ।। जो सम्पूर्ण भूतोंको तथा पर्वतोंसहित इस पृथ्वीको धारण करते हैं, जिन्हें विश्वरूपी अनन्तदेव तथा शेष कहा गया है, उन्हें भी उन परमात्माने ही उत्पन्न किया है ।।

ध्यानयोगेन विप्रांश्च तं विदन्ति महौजसम् । कर्णस्रोतोद्भवं चापि मधुं नाम महासुरम् ।। १४ ।। तमुग्रमुग्रर्माणमुग्रां बुद्धिं समास्थितम् । ब्रह्मणोऽपचितिं कुर्वन् जघान पुरुषोत्तमः ।। १५ ।। ब्राह्मणलोग ध्यानयोगके द्वारा इन्हीं परम तेजस्वी वासुदेवका ज्ञान प्राप्त करते हैं। जलशायी नारायणके कानकी मैलसे महान् असुर मधुका प्राकट्य हुआ था। वह मधु बड़े ही उग्र स्वभावका तथा क्रूरकर्मा था। उसने ब्रह्माजीका समादर करते हुए अत्यन्त भयंकर बुद्धिका आश्रय लिया था। इसलिये ब्रह्माजीका समादर करते हुए भगवान् पुरुषोत्तमने मधुको मार डाला था ।।

तस्य तात वधादेव देवदानवमानवाः । मधुसूदनमित्याहुर्ऋषयश्च जनार्दनम् ।। १६ ।। तात! मधुका वध करनेके कारण ही देवता, दानव, मनुष्य तथा ऋषिगण श्रीजनार्दनको मधुसूदन कहते हैं ।।

वराहश्चैव सिंहश्च त्रिविक्रमगतिः प्रभुः । एष माता पिता चैव सर्वेषां प्राणिनां हरिः ।। १७ ।। वे ही भगवान् समय-समयपर वाराह, नृसिंह और वामनके रूपमें प्रकट हुए हैं। ये श्रीहरि ही समस्त प्राणियोंके पिता और माता हैं ।। १७ ।।

परं हि पुण्डरीकाक्षान्न भूतं न भविष्यति । मुखतः सोऽसृजद् विप्रान् बाहुभ्यां क्षत्रियांस्तथा ।। १८ ।। वैश्यांश्चाप्यूरुतो राजन् शूद्रान् वै पादतस्तथा । इन कमलनयन भगवान्‌से बढ़कर दूसरा कोई तत्त्व न हुआ है, न होगा। राजन्! इन्होंने अपने मुखसे ब्राह्मणों, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियों, जंघासे वैश्यों और चरणोंसे शूद्रोंको उत्पन्न किया है ।। १८ १/२ ।।

तपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् ॥ १९ ॥ ब्रह्मभूतंममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च । योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् ॥ २० ॥ जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर हो संयम-नियमका पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमाको समस्त देहधारियोंके आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान् केशवकी<sup></sup> आराधना करता है, वह परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥ १९-२० ॥

केशवः परमं तेजः सर्वलोकपितामहः । एनमाहुर्हषीकेशं मुनयो वै नराधिप ॥ २१ ॥ नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंके पितामह भगवान् श्रीकृष्ण परम तेज हैं। मुनिजन इन्हें हृषीकेश कहते हैं ॥ २१ ॥

एवमेनं विजानीहि आचार्यं पितरं गुरुम् । कृष्णो यस्य प्रसीदेत लोकास्तेनाक्षया जिताः ॥ २२ ॥ इस प्रकार इन भगवान् गोविन्दको तुम आचार्य, पिता और गुरु समझो। भगवान् श्रीकृष्ण जिसके ऊपर प्रसन्न हो जायँ, वह अक्षय लोकोंपर विजय पा जाता है ॥

यश्चैवेनं भयस्थाने केशवं शरणं व्रजेत् । सदा नरः पठंश्चेदं स्वस्तिमान् स सुखी भवेत् ॥ २३ ॥ जो मनुष्य भयके समय इन भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेता है और सर्वदा इस स्तुतिका पाठ करता है, वह सुखी एवं कल्याणका भागी होता है ॥ २३ ॥

ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः । भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥ २४ ॥ जो मानव भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते। जनार्दन महान् भयमें निमग्न भगवान् उन मनुष्योंकी सदा रक्षा करते हैं ॥ २४ ॥

स तं युधिष्ठिरो ज्ञात्वा याथातथ्येन भारत । सर्वात्मना महात्मानं केशवं जगदीश्वरम् । प्रपन्नः शरणं राजन् योगानां प्रभुमीश्वरम् ॥ २५ ॥ भरतवंशी नरेश! इस बातको अच्छी तरह समझकर राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण हृदयसे योगोंके स्वामी, सर्वसमर्थ, जगदीश्वर एवं महात्मा भगवान् केशवकी शरण ली है ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥

१. केशव नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—क=ब्रह्मा, अ=विष्णु, ईश=शिव जिनके वपु हैं।

अध्याय (पृष्ठ 1913)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता

भीष्म उवाच

शृणु चेदं महाराज ब्रह्मभूतं स्तवं मम ।
ब्रह्मर्षिभिश्च देवैश्च यः पुरा कथितो भुवि ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—महाराज दुर्योधन! पूर्वकालमें इस भूतलपर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंने इनका जो ब्रह्मभूतस्तोत्र कहा है, उसे तुम मुझसे सुनो— ॥ १ ॥

साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वरः प्रभुः ।
लोकभावनभावज्ञ इति त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
‘प्रभो! आप साध्यगण और देवताओंके भी स्वामी एवं देवदेवेश्वर हैं। आप सम्पूर्ण जगत्‌के हृदयके भावोंको जाननेवाले हैं। आपके विषयमें नारदजीने ऐसा ही कहा है ॥ २ ॥

भूतं भव्यं भविष्यं च मार्कण्डेयोऽभ्युवाच ह ।
यज्ञं त्वां चैव यज्ञानां तपश्च तपसामपि ॥ ३ ॥
‘मार्कण्डेयजीने आपको भूत, भविष्य और वर्तमान स्वरूप बताया है। वे आपको यज्ञोंका यज्ञ और तपस्याओंका भी सारभूत तप बताया करते हैं ॥ ३ ॥

देवानामपि देवं च त्वामाह भगवान् भृगुः ।
पुराणं चैव परमं विष्णो रूपं तवेति च ॥ ४ ॥
‘भगवान् भृगुने आपको देवताओंका भी देवता कहा है। विष्णो! आपका रूप अत्यन्त पुरातन और उत्कृष्ट है ।।

वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापयिता तथा ।
देव देवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
‘प्रभो! आप वसुओंके वासुदेव तथा इन्द्रको स्वर्गके राज्यपर स्थापित करनेवाले हैं। देव! आप देवताओंके भी देवता हैं। महर्षि द्वैपायन आपके विषयमें ऐसा ही कहते हैं ॥ ५ ॥

पूर्वे प्रजानिसर्गे च दक्षमाहुः प्रजापतिम् ।
स्रष्टारं सर्वलोकानामङ्गिस्त्वां तथाब्रवीत् ॥ ६ ॥
‘प्रथम प्रजासृष्टिके समय आपको ही दक्ष प्रजापति कहा गया है। आप ही सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा हैं—इस प्रकार अंगिरा मुनि आपके विषयमें कहते हैं ॥ ६ ॥

अव्यक्तं ते शरीरोत्थं व्यक्तं ते मनसि स्थितम् ।
देवास्त्वत्सम्भवाश्चैव देवलस्त्वसितोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥

‘अव्यक्त (प्रधान) आपके शरीरसे उत्पन्न हुआ है, व्यक्त महत्तत्त्व आदि कार्यवर्ग आपके मनमें स्थित है तथा सम्पूर्ण देवता भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं; ऐसा असित और देवलका कथन है॥ ७॥

शिरसा ते दिवं व्याप्तं बाहुभ्यां पृथिवी तथा।
जठरं ते त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः॥ ८॥
एवं त्वामभिजानन्ति तपसा भाविता नराः।
आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणां चासि सत्तमः॥ ९॥
‘आपके मस्तकसे द्युलोक और भुजाओंसे भूलोक व्याप्त है। तीनों लोक आपके उदरमें स्थित हैं। आप ही सनातन पुरुष हैं। तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरण-वाले महात्मा पुरुष आपको ऐसा ही जानते हैं। आत्मसाक्षात्कारसे तृप्त हुए ज्ञानी महर्षियोंकी दृष्टिमें भी आप सबसे श्रेष्ठ हैं॥ ८-९॥

राजर्षीणामुदाराणामाहवेष्वनिवर्तिनाम्।
सर्वधर्मप्रधानानां त्वं गतिर्मधुसूदन॥ १०॥
‘मधुसूदन! जो सम्पूर्ण धर्मोंमें प्रधान और संग्रामसे कभी पीछे हटनेवाले नहीं हैं, उन उदार राजर्षियोंके परम आश्रय भी आप ही हैं॥ १०॥

इति नित्यं योगविद्भिर्भगवान् पुरुषोत्तमः।
सनत्कुमारप्रमुखैः स्तूयतेऽभ्यर्च्यते हरिः॥ ११॥
‘इस प्रकार सनत्कुमार आदि योगवेत्ता पापापहारी आप भगवान् पुरुषोत्तमकी सदा ही स्तुति और पूजा करते हैं’॥ ११॥

एष ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः।
केशवस्य यथातत्त्वं सुप्रीतो भज केशवम्॥ १२॥
तात! दुर्योधन! इस तरह विस्तार और संक्षेपसे मैंने तुम्हें भगवान् केशवकी यथार्थ महिमा बतायी है। अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो॥ १२॥

संजय उवाच

पुण्यं श्रुत्वैतदाख्यानं महाराज सुतस्तव।
केशवं बहु मेने स पाण्डवांश्च महारथान्॥ १३॥
संजय कहते हैं— महाराज! भीष्मजीके मुखसे यह पवित्र आख्यान सुनकर तुम्हारे पुत्रने भगवान् श्रीकृष्ण तथा महारथी पाण्डवोंको बहुत महत्त्वशाली समझा॥ १३॥

तमब्रवीन्महाराज भीष्मः शान्तनवः पुनः।
माहात्म्यं ते श्रुतं राजन् केशवस्य महात्मनः॥ १४॥
नरस्य च यथातत्त्वं यन्मां त्वं पृच्छसे नृप।