महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1899, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहते हैं ॥ ६५-६६ ॥ पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात् सदाभवत् । तस्माद् भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥ ६७ ॥ देव! आपके ही प्रसादसे पृथिवी सदा निर्भय रही है, इसलिये विशाललोचन! आप पुनः पृथ्वीपर यदुवंशमें अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये ॥ ६७ ॥ धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च । जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे विभो ॥ ६८ ॥ प्रभो! धर्मकी स्थापना, दैत्योंके वध और जगत्की रक्षाके लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये ॥ यत् तत् परमकं गुह्यं त्वत्प्रसादादिदं विभो । वासुदेव तदेतत् ते मयोद्गीतं यथातथम् ॥ ६९ ॥ वासुदेव! आप ही पूर्णतम परमेश्वर हैं। आपका जो परम गुह्य यथार्थस्वरूप है, उसीका यहाँ इस रूपमें आपकी कृपासे ही गान किया गया है ॥ ६९ ॥ सृष्ट्वा संकर्षणं देवं स्वयमात्मानमात्मना । कृष्ण त्वमात्मनासाक्षीः प्रद्युम्नं चात्मसम्भवम् ॥ ७० ॥ श्रीकृष्ण! आपने आत्माद्वारा स्वयं अपने-आपको ही संकर्षणदेवके रूपमें प्रकट करके अपने ही द्वारा आत्मजस्वरूप प्रद्युम्नकी सृष्टि की है ॥ ७० ॥ प्रद्युम्नादनिरुद्धं त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् । अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम् ॥ ७१ ॥ प्रद्युम्नसे आपने ही उन अनिरुद्धको प्रकट किया है जिन्हें ज्ञानीजन अविनाशी विष्णुरूपसे जानते हैं। उन विष्णुरूप अनिरुद्धने ही मुझ लोकधाता ब्रह्माकी सृष्टि की है ॥ ७१ ॥ वासुदेवमयः सोऽहं त्वयैवास्मि विनिर्मितः । (तस्माद् याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना ।) विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ॥ ७२ ॥ प्रभो! इस प्रकार आपने ही मेरी सृष्टि की है। आपसे अभिन्न होनेके कारण मैं भी वासुदेवमय हूँ। लोकेश्वर! इसलिये याचना करता हूँ कि आप अपने-आपको स्वयं ही (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध)—इन चार रूपोंमें विभक्त करके मानव-शरीर ग्रहण कीजिये ॥ ७२ ॥ तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय वै । धर्मं प्राप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्स्यसि तत्त्वतः ॥ ७३ ॥ वहाँ सब लोगोंके सुखके लिये असुरोंका वध करके धर्म और यशका विस्तार कीजिये। अन्तमें अवतारका उद्देश्य पूर्ण करके आप पुनः अपने पारमार्थिक स्वरूपसे संयुक्त हो