महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1898, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेव! आप ही प्रजापतियोंके भी पति, पद्मनाभ और महाबली हैं। आत्मा और महाभूत भी आप ही हैं। सत्त्वस्वरूप परमेश्वर! सदा आपकी जय हो ।। ५८ ।। पादौ तव धरा देवी दिशो बाहू दिवं शिरः । मूर्तिस्तेऽहं सुराः कायश्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ।। ५९ ।। पृथ्वीदेवी आपके चरण हैं, दिशाएँ बाहु हैं और द्युलोक मस्तक है। मैं ब्रह्मा आपका शरीर, देवता अंग-प्रत्यंग और चन्द्रमा तथा सूर्य नेत्र हैं ।। ५९ ।। बलं तपश्च सत्यं च कर्म धर्मात्मकं तव । तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवाः ।। ६० ।। तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है। अग्नि आपका तेज, वायु साँस और जल पसीना है ।। ६० ।। अश्विनौ श्रवणौ नित्यं देवी जिह्वा सरस्वती । वेदाः संस्कारनिष्ठा हि त्वयीदं जगदाश्रितम् ।। ६१ ।। अश्विनीकुमार आपके कान और सरस्वती देवी आपकी जिह्वा हैं। वेद आपकी संस्कारनिष्ठा हैं। यह जगत् सदा आपहीके आधारपर टिका हुआ है ।। ६१ ।। न संख्यानं परीमाणं न तेजो न पराक्रमम् । न बलं योगयोगीश जानीमस्ते न सम्भवम् ।। ६२ ।। योग-योगीश्वर! हम न तो आपकी संख्या जानते हैं, न परिमाण। आपके तेज, पराक्रम और बलका भी हमें पता नहीं है। हम यह भी नहीं जानते कि आपका आविर्भाव कैसे होता है ।। ६२ ।। त्वद्भक्तिनिरता देव नियमैस्त्वां समाश्रिताः । अर्चयामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम् ।। ६३ ।। ऋषयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । पिशाचा मानुषाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ।। ६४ ।। एवमादि मया सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् । देव! हम तो आपकी उपासनामें लगे रहते हैं। आपके नियमोंका पालन करते हुए आपके ही शरण हैं। विष्णो! हम सदा आप परमेश्वर एवं महेश्वरका पूजन ही करते हैं। आपकी ही कृपासे हमने पृथ्वीपर ऋषि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, मनुष्य, मृग, पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े आदिकी सृष्टि की है ।। ६३-६४ १/२ ।। पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दुःखप्रनाशन ।। ६५ ।। त्वं गतिः सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगद्गुरुः । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधाः सदा ।। ६६ ।। पद्मनाभ! विशाललोचन! दुःखहारी श्रीकृष्ण! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रय और नेता हैं, आप ही संसारके गुरु हैं। देवेश्वर! आपकी कृपादृष्टि होनेसे ही सब देवता सदा सुखी