महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1900, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंजायेंगे ।। ७३ ।।
त्वां हि ब्रह्मर्षयो लोके देवाश्चामितविक्रम । तैस्तैर्हि नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम् ।। ७४ ।।
अमित पराक्रमी परमेश्वर! संसारमें महर्षि और देवगण एकाग्रचित्त हो उन-उन लीलानुसारी नामोंद्वारा आपके परमात्मस्वरूपका गान करते रहते हैं ।। ७४ ।।
स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसंघाः कृत्वाऽऽश्रयं त्वां वरदं सुबाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ।। ७५ ।।
सुबाहो! आप वरदायक प्रभुका ही आश्रय लेकर समस्त प्राणिसमुदाय आपमें ही स्थित हैं। ब्राह्मणलोग आपको आदि, मध्य और अन्तसे रहित, किसी सीमाके सम्बन्धसे शून्य (असीम) तथा लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये सेतुस्वरूप बताते हैं ।। ७५ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विष्णोपाख्याने पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ।। ६५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विष्णोपाख्यानविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६५ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ७६ श्लोक हैं।]
१. शक्तिसे तात्पर्य यहाँ पाण्डवोंकी शक्तिसे है। २. मेरे पुत्रोंकी बार-बार पराजयका क्या कारण है, वही कारणविषयक प्रश्न है।