महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1909, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपो वायुश्च तेजश्च त्रयमेतदकल्पयत् । मार्कण्डेयजी भगवान् गोविन्दके विषयमें अत्यन्त अद्भुत बातें कहते हैं। वे भगवान् ही सर्वभूतमय हैं और वे ही सबके आत्मस्वरूप महात्मा पुरुषोत्तम हैं। सृष्टिके आरम्भमें इन्हीं परमात्माने जल, वायु और तेज—इन तीन भूतों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि की थी ॥ ३ १/२ ॥
स सृष्ट्वा पृथिवीं देवीं सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ॥ ४ ॥ अप्सु वै शयनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः । सर्वतेजोमयो देवो योगात् सुषुवाप तत्र ह ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वर इन भगवान् श्रीहरिने पृथ्वीदेवी-की सृष्टि करके जलमें शयन किया। वे महात्मा पुरुषोत्तम सर्वतेजोमय देवता योगशक्तिसे उस जलमें सोये ॥ ४-५ ॥
मुखतः सोऽग्निमसृजत् प्राणाद् वायुमथापि च । सरस्वतीं च वेदांश्च मनसः ससृजेऽच्युतः ॥ ६ ॥ उन अच्युतने अपने मुखसे अग्निकी, प्राणसे वायुकी तथा मनसे सरस्वतीदेवी और वेदोंकी रचना की ॥ ६ ॥
एष लोकान् ससर्जादौ देवांश्च ऋषिभिः सह । निधनं चैव मृत्युं च प्रजानां प्रभवाप्ययौ ॥ ७ ॥ इन्होंने ही सर्गके आरम्भमें सम्पूर्ण लोकों तथा ऋषियोंसहित देवताओंकी रचना की थी। ये ही प्रलयके अधिष्ठान और मृत्युस्वरूप हैं। प्रजाकी उत्पत्ति और विनाश इन्हींसे होते हैं ॥ ७ ॥
एष धर्मश्च धर्मज्ञो वरदः सर्वकामदः । एष कर्ता च कार्यं च पूर्वदेवः स्वयम्प्रभुः ॥ ८ ॥ ये धर्मज्ञ, वरदाता, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले तथा धर्मस्वरूप हैं। ये ही कर्ता, कार्य, आदिदेव तथा स्वयं सर्वसमर्थ हैं ॥ ८ ॥
भूतं भव्यं भविष्यच्च पूर्वमेतदकल्पयत् । उभे संध्ये दिशः खं च नियमांश्च जनार्दनः ॥ ९ ॥ भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी सृष्टि भी पूर्वकालमें इन्हींके द्वारा हुई है। इन जनार्दनने ही दोनों संध्याओं, दसों दिशाओं, आकाश तथा नियमोंकी रचना की है ॥ ९ ॥
ऋषींश्चैव हि गोविन्दस्तपश्चैवाभ्यकल्पयत् । स्रष्टारं जगतश्चापि महात्मा प्रभुरव्ययः ॥ १० ॥ महात्मा अविनाशी प्रभु गोविन्दने ही ऋषियों तथा तपस्याकी रचना की है। जगत्स्रष्टा प्रजापतिको भी उन्होंने ही उत्पन्न किया है ॥ १० ॥
अग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमकल्पयत् । तस्मान्नारायणो जज्ञे देवदेवः सनातनः ॥ ११ ॥