भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1910

उन पूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णने पहले सम्पूर्ण भूतोंके अग्रज संकर्षणको प्रकट किया, उनसे सनातन देवाधिदेव नारायणका प्रादुर्भाव हुआ ।। ११ ।।

नाभौ पद्मं बभूवास्य सर्वलोकस्य सम्भवात् । तस्मात् पितामहो जातस्तस्माज्जातास्त्विमाः प्रजाः ।। १२ ।। नारायणकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ। सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत उस कमलसे पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीसे ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं ।। १२ ।।

शेषं चाकल्पयद् देवमनन्तं विश्वरूपिणम् । यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम् ।। १३ ।। जो सम्पूर्ण भूतोंको तथा पर्वतोंसहित इस पृथ्वीको धारण करते हैं, जिन्हें विश्वरूपी अनन्तदेव तथा शेष कहा गया है, उन्हें भी उन परमात्माने ही उत्पन्न किया है ।।

ध्यानयोगेन विप्रांश्च तं विदन्ति महौजसम् । कर्णस्रोतोद्भवं चापि मधुं नाम महासुरम् ।। १४ ।। तमुग्रमुग्रर्माणमुग्रां बुद्धिं समास्थितम् । ब्रह्मणोऽपचितिं कुर्वन् जघान पुरुषोत्तमः ।। १५ ।। ब्राह्मणलोग ध्यानयोगके द्वारा इन्हीं परम तेजस्वी वासुदेवका ज्ञान प्राप्त करते हैं। जलशायी नारायणके कानकी मैलसे महान् असुर मधुका प्राकट्य हुआ था। वह मधु बड़े ही उग्र स्वभावका तथा क्रूरकर्मा था। उसने ब्रह्माजीका समादर करते हुए अत्यन्त भयंकर बुद्धिका आश्रय लिया था। इसलिये ब्रह्माजीका समादर करते हुए भगवान् पुरुषोत्तमने मधुको मार डाला था ।।

तस्य तात वधादेव देवदानवमानवाः । मधुसूदनमित्याहुर्ऋषयश्च जनार्दनम् ।। १६ ।। तात! मधुका वध करनेके कारण ही देवता, दानव, मनुष्य तथा ऋषिगण श्रीजनार्दनको मधुसूदन कहते हैं ।।

वराहश्चैव सिंहश्च त्रिविक्रमगतिः प्रभुः । एष माता पिता चैव सर्वेषां प्राणिनां हरिः ।। १७ ।। वे ही भगवान् समय-समयपर वाराह, नृसिंह और वामनके रूपमें प्रकट हुए हैं। ये श्रीहरि ही समस्त प्राणियोंके पिता और माता हैं ।। १७ ।।

परं हि पुण्डरीकाक्षान्न भूतं न भविष्यति । मुखतः सोऽसृजद् विप्रान् बाहुभ्यां क्षत्रियांस्तथा ।। १८ ।। वैश्यांश्चाप्यूरुतो राजन् शूद्रान् वै पादतस्तथा । इन कमलनयन भगवान्‌से बढ़कर दूसरा कोई तत्त्व न हुआ है, न होगा। राजन्! इन्होंने अपने मुखसे ब्राह्मणों, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियों, जंघासे वैश्यों और चरणोंसे शूद्रोंको उत्पन्न किया है ।। १८ १/२ ।।