महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1911, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् ॥ १९ ॥ ब्रह्मभूतंममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च । योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् ॥ २० ॥ जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर हो संयम-नियमका पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमाको समस्त देहधारियोंके आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान् केशवकी<sup>३</sup> आराधना करता है, वह परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥ १९-२० ॥
केशवः परमं तेजः सर्वलोकपितामहः । एनमाहुर्हषीकेशं मुनयो वै नराधिप ॥ २१ ॥ नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंके पितामह भगवान् श्रीकृष्ण परम तेज हैं। मुनिजन इन्हें हृषीकेश कहते हैं ॥ २१ ॥
एवमेनं विजानीहि आचार्यं पितरं गुरुम् । कृष्णो यस्य प्रसीदेत लोकास्तेनाक्षया जिताः ॥ २२ ॥ इस प्रकार इन भगवान् गोविन्दको तुम आचार्य, पिता और गुरु समझो। भगवान् श्रीकृष्ण जिसके ऊपर प्रसन्न हो जायँ, वह अक्षय लोकोंपर विजय पा जाता है ॥
यश्चैवेनं भयस्थाने केशवं शरणं व्रजेत् । सदा नरः पठंश्चेदं स्वस्तिमान् स सुखी भवेत् ॥ २३ ॥ जो मनुष्य भयके समय इन भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेता है और सर्वदा इस स्तुतिका पाठ करता है, वह सुखी एवं कल्याणका भागी होता है ॥ २३ ॥
ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः । भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥ २४ ॥ जो मानव भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते। जनार्दन महान् भयमें निमग्न भगवान् उन मनुष्योंकी सदा रक्षा करते हैं ॥ २४ ॥
स तं युधिष्ठिरो ज्ञात्वा याथातथ्येन भारत । सर्वात्मना महात्मानं केशवं जगदीश्वरम् । प्रपन्नः शरणं राजन् योगानां प्रभुमीश्वरम् ॥ २५ ॥ भरतवंशी नरेश! इस बातको अच्छी तरह समझकर राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण हृदयसे योगोंके स्वामी, सर्वसमर्थ, जगदीश्वर एवं महात्मा भगवान् केशवकी शरण ली है ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥