महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रियोंको सुख पहुँचानेके सिवा दूसरा कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है* ॥ १३ ॥ एवंरूपं कर्मफलं नरेन्द्र मात्रावहं हृदयस्य प्रियेण । स क्रोधजं पाण्डव हर्षजं च लोकावुभौ मा प्रहासीश्चिराय ॥ १४ ॥ नरेन्द्र! इस प्रकार हृदयको प्रिय लगनेवाले विषयसे कर्मफलकी प्रार्थना नहीं करनी चाहिये। पाण्डुनन्दन! आप क्रोधजनित नरक और हर्षजनित स्वर्ग—इन दोनों लोकोंमें कभी न जायँ; (अपितु सनातन मोक्ष-सुखके लिये निष्काम कर्म अथवा ज्ञानयोगका ही साधन करें) ॥ १४ ॥ अन्तं गत्वा कर्मणां मा प्रजह्याः सत्यं दमं चार्जवमानृशंस्यम् । अश्वमेधं राजसूयं तथेज्याः पापस्यान्तं कर्मणो मा पुनर्गाः ॥ १५ ॥ इस तरह (ज्ञानाग्निके द्वारा) कर्मोंको दग्ध करके सत्य, दम, आर्जव (सरलता) तथा अनृशंसता (दया) इन सद्गुणोंका कभी त्याग न करें। अश्वमेध, राजसूय और अन्य यज्ञोंको भी न छोड़ें, परंतु युद्ध-जैसे पापकर्मके निकट फिर कभी न जायँ ॥ १५ ॥ तच्चेदेवं द्वेषरूपेण पार्थाः करिष्यध्वं कर्म पापं चिराय । निवसध्वं वर्षपूगान् वनेषु दुःखं वासं पाण्डवा धर्म एव ॥ १६ ॥ कुन्तीकुमारो! यदि आपलोगोंको राज्यके लिये चिरस्थायी विद्वेषके रूपमें युद्धरूप पापकर्म ही करना है, तब तो मैं यही कहूँगा कि आप बहुत वर्षोंतक दुःखमय वनवासका ही कष्ट भोगते रहें। पाण्डवो! वह वनवास ही आपके लिये धर्मरूप होगा ॥ १६ ॥ अप्रव्रज्येमा स्म हित्वाऽऽपुरस्ता- दात्माधीनं यद् बलं ह्येतदासीत् । नित्यं च वश्याः सचिवास्तवेमे जनार्दनो युयुधानश्च वीरः ॥ १७ ॥ पहले (द्यूतक्रीड़ाके समय ही) हमलोग बलपूर्वक इन्हें अपने वशमें रखकर वनमें गये बिना ही यहाँ रह सकते थे; क्योंकि आज जो सेना एकत्र हुई है, यह पहले भी अपने ही लोगोंके अधीन थी और ये भगवान् श्रीकृष्ण तथा वीरवर सात्यकि सदासे ही आपलोगोंके (प्रेमके कारण) वशीभूत एवं आपके सहायक रहे हैं ॥ मत्स्यो राजा रुक्मरथः सपुत्रः प्रहारिभिः सह वीरैर्विराटः ।