भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

राजानश्च ये विजिताः पुरस्तात् त्वामेव ते संश्रयेयुः समस्ताः ॥ १८ ॥ प्रहार करनेमें कुशल वीर सैनिकों तथा पुत्रोंके साथ सुवर्णमय रथसे सुशोभित मत्स्यदेशके राजा विराट तथा दूसरे भी बहुत-से नरेश, जिन्हें पहले आपलोगोंने युद्धमें जीता था, वे सब-के-सब संग्राममें आपका ही पक्ष लेते ॥ १८ ॥

महासहायः प्रतपन् बलस्थः पुरस्कृतो वासुदेवार्जुनाभ्याम् । वरान् हनिष्यन् द्विषतो रङ्गमध्ये व्यनेष्यथा धार्तराष्ट्रस्य दर्पम् ॥ १९ ॥ उस समय आप महान् सहायकोंसे सम्पन्न और बलशाली थे, आप श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके आगे-आगे चलकर शत्रुओंपर आक्रमण कर सकते थे। समरांगणमें अपने महान् शत्रुओंका संहार करते हुए आप दुर्योधनके घमंडको चूर-चूर कर सकते थे ॥ १९ ॥

बलं कस्माद् वर्धयित्वा परस्य निजान् कस्मात् कर्शयित्वा सहायान् । निरुष्य कस्माद् वर्षपूगान् वनेषु युयुत्ससे पाण्डव हीनकालम् ॥ २० ॥ पाण्डुनन्दन! फिर क्या कारण है कि आपने शत्रु की शक्तिको बढ़नेका अवसर दिया? किसलिये अपने सहायकोंको दुर्बल बनाया और क्यों बारह वर्षोंतक वनमें निवास किया? फिर आज जब वह अनुकूल अवसर बीत चुका है, आपको युद्ध करनेकी इच्छा क्यों हुई है? ॥ २० ॥

अप्राज्ञो वा पाण्डव युध्यमानो- ऽधर्मज्ञो वा भूतिमथोऽभ्युपैति । प्रज्ञावान् वा बुध्यमानोऽपि धर्मं संस्तम्भाद् वा सोऽपि भूतेरपैति ॥ २१ ॥ पाण्डुकुमार! अज्ञानी अथवा पापी मनुष्य भी युद्ध करके सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है और बुद्धिमान् अथवा धर्मज्ञ पुरुष भी दैवी बाधाके कारण पराजित होकर ऐश्वर्यसे हाथ धो बैठता है ॥ २१ ॥

नाधर्मे ते धीयते पार्थ बुद्धि- र्न संरम्भात् कर्म चकर्थ पापम् । आत्थ किं तत् कारणं यस्य हेतोः प्रज्ञाविरुद्धं कर्म चिकीर्षसीदम् ॥ २२ ॥ कुन्तीनन्दन! आपकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं लगती तथा आपने क्रोधमें आकर भी कभी पापकर्म नहीं किया है, तो बताइये, कौन-सा ऐसा (प्रबल) कारण है, जिसके लिये