भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 192

अब आप अपनी बुद्धिके विरुद्ध यह युद्ध-जैसा पापकर्म करना चाहते हैं? ।। २२ ।।

अव्याधिजं कटुकं शीर्षरोगि

यशोमुषं पापफलोदयं वा ।

सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो

मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य ।। २३ ।।

महाराज! जो बिना व्याधिके ही उत्पन्न होता है, स्वादमें कड़ुआ है, जिसके कारण

सिरमें दर्द होने लगता है, जो यशका नाशक और पापरूप फलको प्रकट करनेवाला है, जो

सज्जन पुरुषोंके ही पीने योग्य है, जिसे असाधु पुरुष नहीं पीते हैं, उस क्रोधको आप पी

लीजिये और शान्त हो जाइये ।। २३ ।।

पापानुबन्धं को नु तं कामयेत

क्षमैव ते ज्यायसी नोत भोगाः ।

यत्र भीष्मः शान्तनवो हतः स्याद्

यत्र द्रोणः सहपुत्रो हतः स्यात् ।। २४ ।।

जो पापकी जड़ है, उस क्रोधकी इच्छा कौन करेगा? आपकी दृष्टिमें तो क्षमा ही सबसे

श्रेष्ठ वस्तु है, वे भोग नहीं, जिनके लिये शान्तनुनन्दन भीष्म तथा पुत्रसहित आचार्य द्रोणकी

हत्या की जाय ।। २४ ।।

कृपः शल्यः सौमदत्तिर्विकर्णो

विविंशतिः कर्णदुर्योधनौ च ।

एतान् हत्वा कीदृशं तत् सुखं स्याद्

यद् विन्देथास्तदनु ब्रूहि पार्थ ।। २५ ।।

कुन्तीनन्दन! ऐसा कौन-सा सुख हो सकता है, जिसे आप कृपाचार्य, शल्य, भूरिश्रवा,

विकर्ण, विविंशति, कर्ण तथा दुर्योधन—इन सबका वध करके पाना चाहते हैं, कृपया

बताइये ।। २५ ।।

लब्ध्वापीमां पृथिवीं सागरान्तां

जरामृत्यू नैव हि त्वं प्रजह्याः ।

प्रियाप्रिये सुखदुःखे च राज-

न्नेवं विद्वान् नैव युद्धं कुरु त्वम् ।। २६ ।।

राजन्! समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथिवीको पाकर भी आप जरा-मृत्यु, प्रिय-अप्रिय तथा

सुख-दुःखसे पिण्ड नहीं छुड़ा सकते। आप इन सब बातोंको अच्छी तरह जानते हैं; अतः

मेरी प्रार्थना है कि आप युद्ध न करें ।। २६ ।।

अमात्यानां यदि कामस्य हेतो-

रेवं युक्तं कर्म चिकीर्षसि त्वम् ।

अपक्रामैः स्वं प्रदायैव तेषां