महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1950, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुशुभाते महावीर्यावुभौ समरदुर्जयौ । असृगुक्षितसर्वाङ्गौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥) वे तलवारोंकी मारसे एक-दूसरेको अत्यन्त घायल करने लगे। खड्गके आघातसे पीड़ित हो दोनों ही पृथ्वीपर रक्त बहाने लगे। उनके सारे अंग रक्तरंजित हो रहे थे। अतः वे रणदुर्जय महापराक्रमी वीर खिले हुए दो पलाश-वृक्षोंकी भाँति अत्यन्त सुशोभित होने लगे।
ततः सात्यकिमभ्येत्य निस्त्रिंशवरधारिणम् । भीमसेनस्त्वरन् राजन् रथमारोपयत् तदा ॥ ३० ॥ राजन्! तदनन्तर उत्तम खड्ग धारण करनेवाले सात्यकिके पास पहुँचकर भीमसेनने उस समय तुरंत उन्हें अपने रथपर बिठा लिया ॥ ३० ॥
तवापि तनयो राजन् भूरिश्रवसमाहवे । आरोपयद् रथं तूर्णं पश्यतां सर्वधन्विनाम् ॥ ३१ ॥ महाराज! इसी प्रकार आपके पुत्र दुर्योधनने भी युद्धस्थलमें समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते भूरिश्रवाको तुरंत अपने रथपर चढ़ा लिया ॥ ३१ ॥
तस्मिंस्तथा वर्तमाने रणे भीष्मं महारथम् । अयोधयन्त संरब्धाः पाण्डवा भरतर्षभ ॥ ३२ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय क्रोधमें भरे हुए पाण्डव उस युद्धमें महारथी भीष्मके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥
लोहितायति चादित्ये त्वरमाणो धनंजयः । पञ्चविंशतिसाहस्रान् निजघान महारथान् ॥ ३३ ॥ जब सूर्य अस्ताचलके पास पहुँचकर लाल होने लगे, उस समय अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ बाण-वर्षा करके पचीस हजार महारथियोंको मार डाला ॥
ते हि दुर्योधनादिष्टास्तदा पार्थनिबर्हणे । सम्प्राप्यैव गता नाशं शलभा इव पावकम् ॥ ३४ ॥ वे सब-के-सब दुर्योधनकी आज्ञासे अर्जुनका संहार करनेके लिये आये थे। परंतु वे उस समय आगमें गिरे हुए पतंगोंकी भाँति उनके पास आते ही नष्ट हो गये ॥
ततो मत्स्याः केकयाश्च धनुर्वेदविशारदाः । परिवव्रुस्तदा पार्थं सहपुत्रं महारथम् ॥ ३५ ॥ तदनन्तर धनुर्विद्यामें प्रवीण मत्स्य और केकयदेशके वीर अभिमन्यु आदि पुत्रोंसे युक्त महारथी अर्जुनको घेरकर कौरवोंसे युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ ३५ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु सूर्येऽस्तमुपगच्छति । सर्वेषां चैव सैन्यानां प्रमोहः समजायत ॥ ३६ ॥ इसी समय सूर्य अस्ताचलको चले गये। तब आपके समस्त सैनिकोंपर मोह छा गया ॥ ३६ ॥