महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1951, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवहारं ततश्चक्रे पिता देवव्रतस्तव ।
संध्याकाले महाराज सैन्यानां श्रान्तवाहनः ॥ ३७ ॥
महाराज! तब आपके ताऊ देवव्रतने संध्याके समय अपनी सेनाको पीछे हटा लिया। उनके वाहन बहुत थक गये थे ॥ ३७ ॥
पाण्डवानां कुरूणां च परस्परसमागमे ।
ते सेने भृशसंविग्ने ययतुः स्वं निवेशनम् ॥ ३८ ॥
पाण्डवों और कौरवोंके पारस्परिक संघर्षमें दोनों ही सेनाएँ अत्यन्त उद्विग्न हो उठी थीं। अतः वे अपनी-अपनी छावनीको चली गयीं ॥ ३८ ॥
ततः स्वशिविरं गत्वा न्यविशंस्तत्र भारत ।
पाण्डवाः सृञ्जयैः सार्धं कुरवश्च यथाविधि ॥ ३९ ॥
भारत! तदनन्तर सृञ्जयोंसहित पाण्डव और कौरव अपने शिविरमें जाकर वहाँ विधिपूर्वक विश्राम करने लगे ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पञ्चमदिवसावहारे
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें पाँचवें दिवसके युद्धकी समाप्तिविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४१ १/३ श्लोक हैं।]