महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1974, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकान्तिमान् थे। उस महासमरमें उन्हें आते देखकर आपके महाबली पुत्र भीमसेनको छोड़कर वहाँसे दूर हट गये ॥ १५-१६ ॥ तान् नामृष्यत कौन्तेयो जीवमाना गता इति । अन्वीय च पुनः सर्वांस्तव पुत्रानपीडयत् ॥ १७ ॥ परंतु वे जीवित लौट गये; यह बात भीमसेनसे नहीं सही गयी। उन्होंने पुनः आपके उन सब पुत्रोंका पीछा करके उन्हें अपने बाणोंसे पीड़ित कर दिया ॥ १७ ॥ अथाभिमन्युं समरे भीमसेनेन संगतम् । पार्षतेन च सम्प्रेक्ष्य तव सैन्ये महारथाः ॥ १८ ॥ दुर्योधनप्रभृतयः प्रगृहीतशरासनाः । भृशमश्वैः प्रजवितैः प्रययुर्यत्र ते रथाः ॥ १९ ॥ इधर, उस समरभूमिमें अभिमन्युको भीमसेन तथा धृष्टद्युम्नसे मिला हुआ देख आपकी सेनाके दुर्योधन आदि महारथी हाथोंमें धनुष लिये अत्यन्त वेगशाली अश्वोंद्वारा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ वे बारह पाण्डवपक्षीय महारथी विद्यमान थे ॥ १८-१९ ॥ अपराह्ने महाराज प्रावर्तत महारणः । तावकानां च बलिनां परेषां चैव भारत ॥ २० ॥ महाराज! भरतनन्दन! तब अपराह्नकालमें आपके और पाण्डवपक्षके अत्यन्त बलवान् योद्धाओंमें बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हुआ ॥ २० ॥ अभिमन्युर्विकर्णस्य हयान् हत्वा महाहवे । अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् ॥ २१ ॥ अभिमन्युने उस महायुद्धमें विकर्णके घोड़ोंको मारकर स्वयं विकर्णको भी पचीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २१ ॥ हताश्वं रथमुत्सृज्य विकर्णस्तु महारथः । आरुरोह रथं राजंश्चित्रसेनस्य भारत ॥ २२ ॥ भरतवंशी नरेश! घोड़ोंके मारे जानेपर महारथी विकर्ण अपना रथ छोड़कर चित्रसेनके रथपर जा बैठा ॥ २२ ॥ स्थितावेकरथे तौ तु भ्रातरौ कुलवर्धनौ । आर्जुनिः शरजालेन च्छादयामास भारत ॥ २३ ॥ भरतनन्दन! अभिमन्युने एक रथपर बैठे हुए उन दोनों वंशवर्धक भ्राताओंको अपने बाणोंके जालसे आच्छादित कर दिया ॥ २३ ॥ चित्रसेनो विकर्णश्च कार्ष्णिं पञ्चभिरायसैः । विव्याध तेन चाकम्पत् कार्ष्णिर्मेरुरिव स्थितः ॥ २४ ॥ चित्रसेन और विकर्णने भी लोहेके पाँच बाणोंसे अभिमन्युको बींध डाला। उस आघातसे अर्जुनकुमार अभिमन्यु विचलित नहीं हुआ। मेरु पर्वतकी भाँति अडिग खड़ा