भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1975, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1975

रहा ॥ २४ ॥ दुःशासनस्तु समरे केकयान् पञ्च मारिष । योधयामास राजेन्द्र तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २५ ॥ आर्य! राजेन्द्र! दुःशासनने अकेले ही समरभूमिमें पाँच केकयराजकुमारोंके साथ युद्ध किया। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ २५ ॥ द्रौपदेया रणे क्रुद्धा दुर्योधनमवारयन् । शरैराशीविषाकारैः पुत्रं तव विशाम्पते ॥ २६ ॥ प्रजानाथ! युद्धमें कुपित हुए द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने विषधर सर्पके समान आकारवाले भयंकर बाणोंद्वारा आपके पुत्र दुर्योधनको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २६ ॥ पुत्रोऽपि तव दुर्धर्षो द्रौपद्यास्तनयान् रणे । सायकैर्निशितै राजन्नाजघान पृथक् पृथक् ॥ २७ ॥ राजन्! तब आपके दुर्धर्ष पुत्रने भी तीखे सायकों-द्वारा रणभूमिमें द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥ २७ ॥ तैश्चापि विद्धः शुशुभे रुधिरेण समुक्षितः । गिरिः प्रस्रवणैर्यद्वद् गैरिकादिविमिश्रितैः ॥ २८ ॥ फिर उनके द्वारा भी अत्यन्त घायल किये जानेपर आपका पुत्र रक्तसे नहा उठा और गेरु आदि धातुओंसे मिश्रित झरनोंके जलसे युक्त पर्वतकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ २८ ॥ भीष्मोऽपि समरे राजन् पाण्डवानामनीकिनीम् । कालयामास बलवान् पालः पशुगणानिव ॥ २९ ॥ राजन्! तदनन्तर बलवान् भीष्म भी संग्रामभूमिमें पाण्डव-सेनाको उसी प्रकार खदेड़ने लगे, जैसे चरवाहा पशुओंको हाँकता है ॥ २९ ॥ ततो गाण्डीवनिर्घोषः प्रादुरासीद् विशाम्पते । दक्षिणेन वरूथिन्याः पार्थस्यारीन् विनिघ्नतः ॥ ३० ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर शत्रुओंका संहार करते हुए अर्जुनके गाण्डीवधनुषका घोष सेनाके दक्षिणभागसे प्रकट हुआ ॥ ३० ॥ उत्तस्थुः समरे तत्र कबन्धानि समन्ततः । कुरुणां चैव सैन्येषु पाण्डवानां च भारत ॥ ३१ ॥ भारत! वहाँ समरमें कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंमें चारों ओर कबन्ध उठने लगे ॥ ३१ ॥ शोणितोदं शरावर्तं गजद्वीपं हयोर्मिणम् । रथनौभिर्नरव्याघ्राः प्रतेरुः सैन्यसागरम् ॥ ३२ ॥ वह सेना एक समुद्रके समान थी। रक्त ही वहाँ जलके समान था। बाणोंकी भँवर उठती थी। हाथी द्वीपके समान जान पड़ते थे और घोड़े तरंगकी शोभा धारण करते थे। रथरूपी