भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1998, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1998

तत्पश्चात् अर्जुनने अत्यन्त क्रुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—'माधव! युद्धस्थलमें दुर्योधनकी इन सेनाओंको देखिये, व्यूहके विद्वान् महात्मा गंगानन्दनने इनका व्यूह रचा है ।। ३४-३५ ।। युद्धाभिकामान् शूरांश्च पश्य माधव दंशितान् । त्रिगर्तराजं सहितं भ्रातृभिः पश्य केशव ।। ३६ ।। 'माधव! युद्धकी इच्छासे कवच बाँधकर आये हुए इन शूरवीरोंपर दृष्टिपात कीजिये। केशव! यह देखिये, यह भाइयोंसहित त्रिगर्तराज खड़ा है ।। ३६ ।। अद्यैतान् नाशयिष्यामि पश्यतस्ते जनार्दन । य इमे मां यदुश्रेष्ठ योद्धुकामा रणाजिरे ।। ३७ ।। 'जनार्दन! यदुश्रेष्ठ! ये जो रणक्षेत्रमें मुझसे युद्ध करना चाहते हैं, मैं इन सबको आज आपके देखते-देखते नष्ट कर दूँगा' ।। ३७ ।। एतदुक्त्वा तु कौन्तेयो धनुर्ज्यामवमृज्य च । ववर्ष शरवर्षाणि नराधिपगणान् प्रति ।। ३८ ।। ऐसा कहकर कुन्तीनन्दन अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचापर हाथ फेरा और विपक्षी नरेशोंपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। ३८ ।। तेऽपि तं परमेष्वासाः शरवर्षैरपूरयन् । तडागं वारिधाराभिर्यथा प्रावृषि तोयदाः ।। ३९ ।। जैसे बादल वर्षा-ऋतुमें जलकी धाराओंसे तालाबको भरते हैं, उसी प्रकार वे महाधनुर्धर नरेश भी बाणोंकी वृष्टिसे अर्जुनको भरपूर करने लगे ।। ३९ ।। हाहाकारो महानासीत् तव सैन्ये विशाम्पते । छाद्यमानौ रणे कृष्णौ शरैर्दृष्ट्वा महारणे ।। ४० ।। प्रजानाथ! उस महायुद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको बाणोंसे आच्छादित देख आपकी सेनामें बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा ।। ४० ।। देवा देवर्षयश्चैव गन्धर्वाश्च सहोरगैः । विस्मयं परमं जग्मुर्दृष्ट्वा कृष्णौ तथागतौ ।। ४१ ।। श्रीकृष्ण और अर्जुनको उस अवस्थामें देखकर देवताओं, देवर्षियों, गन्धर्वों और नागोंको महान् आश्चर्य हुआ ।। ४१ ।। ततः क्रुद्धोऽर्जुनो राजन्नैन्द्रमस्त्रमुदैरयत् । तत्राद्भुतमपश्याम विजयस्य पराक्रमम् ।। ४२ ।। राजन्! तब अर्जुनने कुपित होकर इन्द्रास्त्रका प्रयोग किया। उस समय हमलोगोंने अर्जुनका अद्भुत पराक्रम देखा ।। ४२ ।। शस्त्रवृष्टिं परैर्मुक्तां शरौघैर्यदवारयत् । न च तत्राप्यनिर्भिन्नः कश्चिदासीद् विशाम्पते ।। ४३ ।।