भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2011, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2011

युध्यतां हि तथा राजन् विशेषो न व्यदृश्यत । यततां शत्रुनाशाय कृतप्रतिकृतैषिणाम् ॥ १५ ॥ नरेश्वर! दोनों ही पक्षवाले अपने शत्रु का नाश करनेके लिये प्रयत्नशील थे। दोनों ही एक-दूसरेके अस्त्रोंका निवारण करनेकी इच्छा रखते थे। अतः युद्ध करते समय उनमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ॥ १५ ॥

इरावांस्तु ततो राजन्ननुविन्दस्य सायकैः । चतुर्भिंश्चतुरो वाहाननयद् यमसादनम् ॥ १६ ॥ राजन्! उस समय इरावान्‌ने अपने चार बाणोंद्वारा अनुविन्दके चारों घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ १६ ॥

भल्लाभ्यां च सुतीक्ष्णाभ्यां धनुः केतुं च मारिष । चिच्छेद समरे राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १७ ॥ आर्य! राजन्! तदनन्तर दो तीखे भल्लोंद्वारा उन्होंने युद्धस्थलमें उसके धनुष और ध्वज काट डाले। वह अद्भुत-सी बात हुई ॥ १७ ॥

त्यक्त्वानुविन्दोऽथ रथं विन्दस्य रथमास्थितः । धनुर्गृहीत्वा परमं भारसाधनमुत्तमम् ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् अनुविन्द अपना रथ त्यागकर विन्दके रथपर जा बैठा और भार वहन करनेमें समर्थ दूसरा परम उत्तम धनुष लेकर युद्धके लिये डट गया ॥ १८ ॥

तावेकस्थौ रणे वीरावावन्त्यौ रथिनां वरौ । शरान् मुमुचतुस्तूर्णमिरावति महात्मनि ॥ १९ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ वे दोनों आवन्त्य वीर रणभूमिमें एक ही रथपर बैठकर बड़ी शीघ्रताके साथ महामना इरावान्‌पर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १९ ॥

ताभ्यां मुक्ता महावेगाः शराः काञ्चनभूषणाः । दिवाकरपथं प्राप्य च्छादयामासुरम्बरम् ॥ २० ॥ उन दोनोंके छोड़े हुए महान् वेगशाली सुवर्णभूषित बाणोंने सूर्यके पथपर पहुँचकर आकाशको आच्छादित कर दिया ॥ २० ॥

इरावांस्तु रणे क्रुद्धो भ्रातरौ तौ महारथौ । ववर्ष शरवर्षेण सारथिं चाप्यपातयत् ॥ २१ ॥ तब इरावान्‌ने भी रणक्षेत्रमें क्रुद्ध होकर उन दोनों महारथी बन्धुओंपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी और उनके सारथिको मार गिराया ॥ २१ ॥

तस्मिंस्तु पतिते भूमौ गतसत्त्वे तु सारथौ । रथः प्रदुद्राव दिशः समुद्भ्रान्तहयस्ततः ॥ २२ ॥ सारथिके प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर जानेके पश्चात् उस रथके घोड़े घबराकर भागने लगे और इस प्रकार वह रथ सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ने लगा ॥ २२ ॥