महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2012, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतौ स जित्वा महाराज नागराजसुतासुतः । पौरुषं ख्यापयंस्तूर्णं व्यधमत् तव वाहिनीम् ॥ २३ ॥ महाराज! इरावान् नागराजकन्या उलूपीका पुत्र था। उसने विन्द और अनुविन्दको जीतकर अपने पुरुषार्थका परिचय देते हुए तुरंत ही आपकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ॥ २३ ॥
सा वध्यमाना समरे धार्तराष्ट्री महाचमूः । वेगान् बहुविधांश्चक्रे विषं पीत्वेव मानवः ॥ २४ ॥ युद्धक्षेत्रमें इरावान्से पीड़ित होकर आपकी विशाल सेना विषपान किये हुए मनुष्यकी भाँति नाना प्रकारसे उद्वेग प्रकट करने लगी ॥ २४ ॥
हैडिम्बो राक्षसेन्द्रस्तु भगदत्तं समाद्रवत् । रथेनादित्यवर्णेन सध्वजेन महाबलः ॥ २५ ॥ दूसरी ओर राक्षसराज महाबली घटोत्कचने सूर्यके समान तेजस्वी एवं ध्वजयुक्त रथके द्वारा भगदत्तपर आक्रमण किया ॥ २५ ॥
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा नागराजं समास्थितः । यथा वज्रधरः पूर्वं संग्रामे तारकामये ॥ २६ ॥ जैसे पूर्वकालमें तारकामय-संग्रामके अवसरपर वज्रधारी इन्द्र ऐरावत नामक हाथीपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये गये थे, उसी प्रकार इस महायुद्धमें प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी राजा भगदत्त एक गजराजपर चढ़कर आये थे ॥ २६ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च समागताः । विशेषं न स्म विविदुर्हैडिम्बभगदत्तयोः ॥ २७ ॥ वहाँ युद्ध देखनेके लिये आये हुए देवताओं, गन्धर्वों तथा ऋषियोंकी भी समझमें यह नहीं आया कि घटोत्कच और भगदत्तमें पराक्रमकी दृष्टिसे क्या अन्तर है ॥ २७ ॥
यथा सुरपतिः शक्रस्त्रासयामास दानवान् । तथैव समरे राजा द्रावयामास पाण्डवान् ॥ २८ ॥ जैसे देवराज इन्द्रने दानवोंको भयभीत किया था, उसी प्रकार भगदत्तने पाण्डवसैनिकोंको भयभीत करके भगाना आरम्भ किया ॥ २८ ॥
तेन विद्राव्यमाणास्ते पाण्डवाः सर्वतो दिशम् । त्रातारं नाभ्यगच्छन्तः स्वेष्वनीकेषु भारत ॥ २९ ॥ भारत! भगदत्तके द्वारा खदेड़े हुए पाण्डवसैनिक सम्पूर्ण दिशाओंमें भागते हुए अपनी सेनाओंमें भी कहीं कोई रक्षक नहीं पाते थे ॥ २९ ॥
भैमसेनिं रथस्थं तु तत्रापश्याम भारत । शेषा विमनसो भूत्वा प्राद्रवन्त महारथाः ॥ ३० ॥