भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2032, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2032

मस्त्रं युगान्ताग्निसमप्रकाशम् । न सम्मुमोह द्रुपदस्य पुत्रो राजन् महेन्द्रप्रतिमप्रभावः ॥ २८ ॥ राजन्! प्रलयकालकी अग्निके समान तेजस्वी उस अस्त्रको प्रकट हुआ देखकर देवराज इन्द्रके समान प्रभावशाली द्रुपदकुमार शिखण्डी घबराया नहीं ॥ २८ ॥ तस्थौ च तत्रैव महाधनुष्मान्- शरैस्तदस्त्रं प्रतिबाधमानः । अथाददे वारुणमन्यदस्त्रं शिखण्ड्यथोग्रं प्रतिघातमस्य ॥ २९ ॥ वह महाधनुर्धर वीर अपने बाणोंद्वारा शल्यके अस्त्रका निवारण करता हुआ वहीं डटा रहा। फिर शिखण्डीने शल्यके अस्त्रका प्रतिघात करनेवाले अन्य भयंकर वारुणास्त्रको हाथमें लिया ॥ २९ ॥ तदस्त्रमस्त्रेण विदार्यमाणं खस्थाः सुरा ददृशुः पार्थिवाश्च । भीष्मस्तु राजन् समरे महात्मा धनुश्च चित्रं ध्वजमेव चापि ॥ ३० ॥ छित्त्वानदत् पाण्डुसुतस्य वीरो युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः । आकाशमें खड़े हुए देवताओं तथा रणक्षेत्रमें आये हुए राजाओंने देखा, शिखण्डीके दिव्यास्त्रसे शल्यका अस्त्र विदीर्ण हो रहा है। राजन्! महात्मा एवं वीर भीष्म युद्धस्थलमें अजमीढ़कुलनन्दन पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरके विचित्र धनुष और ध्वजको काटकर गर्जना करने लगे ॥ ३० १/२ ॥ ततः समुत्सृज्य धनुः सबाणं युधिष्ठिरं वीक्ष्य भयाभिभूतम् ॥ ३१ ॥ गदां प्रगृह्याभिपपात संख्ये जयद्रथं भीमसेनः पदातिः । तब धनुष-बाण फेंककर भयसे दबे हुए युधिष्ठिरको देखकर भीमसेन गदा लेकर युद्धमें पैदल ही राजा जयद्रथपर टूट पड़े ॥ ३१ १/२ ॥ तमापतन्तं सहसा जवेन जयद्रथः सगदं भीमसेनम् ॥ ३२ ॥ विव्याध घोरैर्यमदण्डकल्पैः शितैःशरैः पञ्चशतैः समन्तात् ।