महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयथाशक्त्या पूरयन्तः स्वकर्म तदप्येषां निधनं स्यात् प्रशस्तम् ।। २० ।। पाण्डव अपने बाप-दादोंके कर्म—क्षात्रधर्म (युद्ध आदि)-में प्रवृत्त हो यथाशक्ति अपने कर्तव्यका पालन करते हुए यदि दैववश मृत्युको भी प्राप्त हो जायें तो इनकी वह मृत्यु उत्तम ही मानी जायगी ।। २० ।।
उताहो त्वं मन्यसे शाम्यमेव राज्ञां युद्धे वर्तते धर्मतन्त्रम् । अयुद्धे वा वर्तते धर्मतन्त्रं तथैव ते वाचमिमां शृणोमि ।। २१ ।। यदि तुम शान्ति धारण करना ही ठीक समझते हो तो बताओ, युद्धमें प्रवृत्त होनेसे राजाओंके धर्मका ठीक-ठीक पालन होता है या युद्ध छोड़कर भाग जानेसे? क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए तुम जो कुछ भी कहोगे, मैं तुम्हारी वही बात सुननेको उद्यत हूँ ।।
चातुर्वर्ण्यस्य प्रथमं संविभाग- मवेक्ष्य त्वं संजय स्वं च कर्म । निशम्याथो पाण्डवानां च कर्म प्रशंस वा निन्द वा या मतिस्ते ।। २२ ।। संजय! तुम पहले ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके विभाग तथा उनमेंसे प्रत्येक वर्णके अपने-अपने कर्मको देख लो। फिर पाण्डवोंके वर्तमान कर्मपर दृष्टिपात करो; तत्पश्चात् जैसा तुम्हारा विचार हो, उसके अनुसार इनकी प्रशंसा अथवा निन्दा करना ।। २२ ।।
अधीयीत ब्राह्मणो वै यजेत दद्यादीयात् तीर्थमुख्यानि चैव । अध्यापयेद् याजयेच्चापि याज्यान् प्रतिग्रहान् वा विहितान् प्रतीच्छेत् ।। २३ ।। ब्राह्मण अध्ययन, यज्ञ एवं दान करे तथा प्रधान-प्रधान तीर्थोंकी यात्रा करे, शिष्योंको पढ़ावे और यजमानोंका यज्ञ करावे अथवा शास्त्रविहित प्रतिग्रह (दान) स्वीकार करे ।। २३ ।।
(अधीयीत क्षत्रियोऽथो यजेत दद्याद् दानं न तु याचेत किंचित् । न याजयेन्नापि चाध्यापयीत एष स्मृतः क्षत्रधर्मः पुराणः ।। ) इसी प्रकार क्षत्रिय स्वाध्याय, यज्ञ और दान करे। किसीसे किसी भी वस्तुकी याचना न करे। वह न तो दूसरोंका यज्ञ करावे और न अध्यापनका ही कार्य करे; यही धर्मशास्त्रोंमें क्षत्रियोंका प्राचीन धर्म बताया गया है।