महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 205, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथा राजन्यो रक्षणं वै प्रजानां कृत्वा धर्मेणाप्रमत्तोऽथ दत्त्वा । यज्ञैरिष्ट्वा सर्ववेदानधीत्य दारान् कृत्वा पुण्यकृदावसेद् गृहान् ॥ २४ ॥ स धर्मात्मा धर्ममधीत्य पुण्यं यदिच्छया व्रजति ब्रह्मलोकम् । इसके सिवा क्षत्रिय धर्मके अनुसार सावधान रहकर प्रजाजनोंकी रक्षा करे, दान दे, यज्ञ करे, सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके विवाह करे और पुण्य कर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ गृहस्थाश्रममें रहे। इस प्रकार वह धर्मात्मा क्षत्रिय धर्म एवं पुण्यका सम्पादन करके अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मलोकको जाता है ॥ २४ १/२ ॥ वैश्योऽधीत्य कृषिगोरक्षपण्यै- र्वित्तं चिन्वन् पालयन्नप्रमत्तः ॥ २५ ॥ प्रियं कुर्वन् ब्राह्मणक्षत्रियाणां धर्मशीलः पुण्यकृदावसेद् गृहान् । वैश्य अध्ययन करके कृषि, गोरक्षा तथा व्यापारद्वारा धनोपार्जन करते हुए सावधानीके साथ उसकी रक्षा करे। ब्राह्मणों और क्षत्रियोंका प्रिय करते हुए धर्मशील एवं पुण्यात्मा होकर वह गृहस्थाश्रममें निवास करे ।। परिचर्या वन्दनं ब्राह्मणानां नाधीयीत प्रतिषिद्धोऽस्य यज्ञः । नित्योत्थितो भूतयेऽतन्द्रितः स्या- देवं स्मृतः शूद्रधर्मः पुराणः ॥ २६ ॥ शूद्र ब्राह्मणोंकी सेवा तथा वन्दना करे, वेदोंका स्वाध्याय न करे। उसके लिये यज्ञका भी निषेध है। वह सदा उद्योगी और आलस्यरहित होकर अपने कल्याणके लिये चेष्टा करे। इस प्रकार शूद्रोंका प्राचीन धर्म बताया गया है ॥ २६ ॥ एतान् राजा पालयन्नप्रमत्तो नियोजयन् सर्ववर्णान् स्वधर्मे । अकामात्मा समवृत्तिः प्रजासु नाधार्मिकाननुरुध्येत कामान् ॥ २७ ॥ राजा सावधानीके साथ इन सब वर्णोंका पालन करते हुए ही इन्हें अपने-अपने धर्ममें लगावे। वह कामभोगमें आसक्त न होकर समस्त प्रजाओंके साथ समानभावसे बर्ताव करे और पापपूर्ण इच्छाओंका कदापि अनुसरण न करे ।। २७ ।। श्रेयांस्तस्माद् यदि विद्येत कश्चि- दभिजातः सर्वधर्मोपपन्नः ।