महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2064, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुणोंमें अपने ही समान उस पुत्रको हृदयसे लगाकर अर्जुन बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे देवराजके भवनमें ले गये ॥ १५ ॥ सोऽर्जुनेन समाज्ञप्तो देवलोके तदा नृप । प्रीतिपूर्वं महाबाहुः स्वकार्यं प्रति भारत ॥ १६ ॥ नरेश्वर! भरतनन्दन! उन दिनों देवलोकमें अर्जुनने प्रेमपूर्वक अपने महाबाहु पुत्रको अपना सब कार्य बताते हुए कहा— ॥ १६ ॥ युद्धकाले त्वयास्माकं साह्यं देयमिति प्रभो । बाढमित्येवमुक्त्वा तु युद्धकाल इहागतः ॥ १७ ॥ ‘शक्तिशाली पुत्र! युद्धके अवसरपर तुम हमलोगोंको सहायता देना।’ तब बहुत अच्छा कहकर इरावान् चला गया और अब युद्धके अवसरपर यहाँ आया है ॥ १७ ॥ कामवर्णजवैर्श्वैर्बहुभिः संवृतो नृप । ते हयाः काञ्चनापीडा नानावर्णा मनोजवाः ॥ १८ ॥ नरेश्वर! इरावान्के साथ इच्छानुसार रूप-रंग और वेगवाले बहुत-से घोड़े मौजूद थे। वे सब-के-सब सोनेके शिरोभूषण धारण करनेवाले तथा मनके समान वेगशाली थे। उनके रंग अनेक प्रकारके थे ॥ १८ ॥ उत्पेतुः सहसा राजन् हंसा इव महोदधौ । ते त्वदीयान् समासाद्य हयसंघान् मनोजवान् ॥ १९ ॥ क्रोडैः क्रोडानभिघ्नन्तो घोणाभिश्च परस्परम् । निपेतुः सहसा राजन् सुवेगाभिहता भुवि ॥ २० ॥ राजन्! वे घोड़े महासागरमें उड़नेवाले हंसोंके समान सहसा उछले और आपके मनके समान वेगशाली अश्वोंके समुदायमें पहुँचकर छातीसे उनकी छातीमें तथा नासिकासे एक-दूसरेकी नासिकापर चोट करने लगे। वे सहसा वेगपूर्वक टकराकर पृथ्वीपर गिरते थे ॥ १९-२० ॥ निपतद्भिश्च तैश्च हयसंघैः परस्परम् । शुश्रुवे दारुणः शब्दः सुपर्णपतने यथा ॥ २१ ॥ वे अश्वोंके समुदाय परस्पर टकराकर जब गिरते थे, उस समय गरुड़के वेगपूर्वक उतरनेके समान भयंकर शब्द सुनायी देता था ॥ २१ ॥ तथैव तावका राजन् समेत्यान्योन्यमाहवे । परस्परवधं घोरं चक्रुस्ते हयसादिनः ॥ २२ ॥ राजन्! इसी प्रकार आपके और पाण्डवोंके घुड़-सवार युद्धमें एक-दूसरेसे भिड़कर आपसमें भयंकर मार-काट करते थे ॥ २२ ॥ तस्मिंस्तथा वर्तमाने संकुले तुमुले भृशम् । उभयोरपि संशान्ता हयसङ्घाः समन्ततः ॥ २३ ॥