महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2065, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार अत्यन्त भयानक घमासान युद्ध छिड़ जानेपर दोनों पक्षोंके अश्वसमूह चारों ओर नष्ट हो गये ।। २३ ।।
प्रक्षीणसायकाः शूरा निहताश्वाः श्रमातुराः ।
विलयं समनुप्राप्तास्तक्षमाणाः परस्परम् ।। २४ ।।
शूरवीर योद्धाओंके पास बाण समाप्त हो गये। उनके घोड़े मारे गये। वे परिश्रमसे पीड़ित हो परस्पर घात-प्रतिघात करते हुए विनष्ट हो गये ।। २४ ।।
ततः क्षीणे हयानीके किंचिच्छेषे च भारत ।
सौबलस्यानुजाः शूरा निर्गता रणमूर्धनि ।। २५ ।।
भारत! इस प्रकार जब घुड़सवारोंकी सेना नष्ट हो गयी और उसका अल्पभाग ही अवशिष्ट रह गया; उस अवस्थामें शकुनिके शूरवीर भाई युद्धके मुहानेपर निकले ।। २५ ।।
वायुवेगसमस्पर्शाञ्जवे वायुसमांश्च ते ।
आरुह्य बलसम्पन्नान् वयःस्थांस्तुरगोत्तमान् ।। २६ ।।
गजो गवाक्षो वृषभश्चर्मवानार्जवः शुकः ।
षडेते बलसम्पन्ना निर्ययुर्महतो बलात् ।। २७ ।।
जिनका स्पर्श वायुवेगके समान दुःसह था, जो वेगमें वायुकी समानता करते थे, ऐसे बलसम्पन्न नयी अवस्थावाले उत्तम घोड़ोंपर सवार हो गज, गवाक्ष, वृषभ, चर्मवान्, आर्जव और शुक—ये छः बलवान् वीर अपनी विशाल सेनासे बाहर निकले ।। २६-२७ ।।
वार्यमाणाः शकुनिना तैश्च योधैर्महाबलैः ।
संनद्धा युद्धकुशला रौद्ररूपा महाबलाः ।। २८ ।।
यद्यपि शकुनिने उन्हें मना किया, अन्यान्य महाबली योद्धाओंने भी उन्हें रोका, तथापि वे युद्धकुशल, महाबली रौद्ररूपधारी क्षत्रिय कवच आदिसे सुसज्जित हो युद्धके लिये निकल पड़े ।। २८ ।।
तदनीकं महाबाहो भित्त्वा परमदुर्जयम् ।
बलेन महता युक्ताः स्वर्गाय विजयैषिणः ।। २९ ।।
विविशुस्ते तदा हृष्टा गान्धारा युद्धदुर्मदाः ।
महाबाहो! उस समय उन युद्धदुर्मद गान्धार-देशीय वीरोंने विजय अथवा स्वर्गकी अभिलाषा लेकर विशाल सेनाके साथ पाण्डव-वाहिनीके परम दुर्जयव्यूहका भेदन करके हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण हो उसके भीतर प्रवेश किया ।। २९ १/२ ।।
तान् प्रविष्टांस्तदा दृष्ट्वा इरावानपि वीर्यवान् ।। ३० ।।
अब्रवीत् समरे योधान् विचित्रान् दारुणायुधान् ।
यथैते धार्तराष्ट्रस्य योधाः सानुगवाहनाः ।। ३१ ।।
हन्यन्ते समरे सर्वे तथा नीतिर्विधीयताम् ।