भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2066

तब उन्हें सेनाके भीतर प्रविष्ट हुआ देख पराक्रमी इरावान्ने भी समरभूमिमें भयंकर अस्त्र-शस्त्रवाले अपने विचित्र योद्धाओंसे कहा—‘वीरो! तुम सब लोग संग्राममें ऐसी नीति बना लो, जिससे दुर्योधनके ये समस्त योद्धा अपने सेवकों और सवारियोंसहित मार डाले जायँ’ ॥ ३०-३१ १/२ ॥

बाढमित्येवमुक्त्वा ते सर्वे योधा इरावतः ॥ ३२ ॥
जघ्नुस्तेषां बलानीकं दुर्जयं समरे परैः ।
तब ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर इरावान्‌के समस्त सैनिकोंने उन छहों वीरोंके सैन्यसमूहको, जो समरांगणमें दूसरोंके लिये दुर्जय था, मार डाला ॥ ३२ १/२ ॥

तदनीकमनीकेन समरे वीक्ष्य पातितम् ॥ ३३ ॥
अमृष्यमाणास्ते सर्वे सुबलस्यात्मजा रणे ।
इरावन्तमभिद्रुत्य सर्वतः पर्यवारयन् ॥ ३४ ॥
अपनी सेनाको समरभूमिमें शत्रुके सेनाद्वारा मार गिरायी गयी देख सुबलके सभी पुत्र इसे सह न सके। उन्होंने इरावान्‌पर धावा करके उसे सब ओरसे घेर लिया ॥ ३३-३४ ॥

ताडयन्तः शितैः प्रासैश्चोदयन्तः परस्परम् ।
ते शूराः पर्यधावन्त कुर्वन्तो महदाकुलम् ॥ ३५ ॥
वे छहों शूर तीखे प्रासोंसे मारते और एक-दूसरेको बढ़ावा देते हुए इरावान्‌पर टूट पड़े तथा उसे अत्यन्त व्याकुल करने लगे ॥ ३५ ॥

इरावानथ निर्भिन्नः प्रासैस्तीक्ष्णैर्महात्मभिः ।
स्रवता रुधिरेणाक्तस्तोत्रैर्विद्ध इव द्विपः ॥ ३६ ॥
उन महामनस्वी वीरोंके तीखे प्रासोंसे क्षत-विक्षत होकर इरावान् बहते हुए रक्तसे नहा उठा। अंकुशोंसे घायल हुए हाथीके समान व्याकुल हो गया ॥ ३६ ॥

पुरतोऽपि च पृष्ठे च पार्श्वयोश्च भृशाहतः ।
एको बहुभिरत्यर्थं धैर्याद् राजन् न विव्यथे ॥ ३७ ॥
राजन्! वह अकेला था और उसपर प्रहार करनेवालोंकी संख्या बहुत थी। वह आगे-पीछे और अगल-बगलमें अत्यन्त घायल हो गया था; तो भी धैर्यके कारण व्यथित नहीं हुआ ॥ ३७ ॥

इरावानपि संक्रुद्धः सर्वांस्तान् निशितैः शरैः ।
मोहयामास समरे विद्ध्वा परपुरंजयः ॥ ३८ ॥
अब इरावान्‌को भी बड़ा क्रोध हुआ। शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले उस वीरने समरमें तीखे बाणोंद्वारा बींधकर उन सबको मूर्च्छित कर दिया ॥ ३८ ॥

प्रासानुत्कृत्य तरसा स्वशरीरादरिंदमः ।
तैरेव ताडयामास सुबलस्यात्मजान् रणे ॥ ३९ ॥