भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2067

शत्रुओंका दमन करनेवाले इरावान्ने अपने शरीरसे वेगपूर्वक प्रासोंको निकालकर उन्हींके द्वारा रणभूमिमें सुबलपुत्रोंपर प्रहार किया ।। ३९ ।।
विकृष्य च शितं खड्गं गृहीत्वा च शरावरम् ।
पदातिर्द्रुतमागच्छज्जिघांसुः सौबलान् युधि ।। ४० ।।
तत्पश्चात् तीखी तलवार और ढाल निकालकर इरावान्ने युद्धमें सुबलपुत्रोंको मार डालनेकी इच्छासे तुरंत उनके ऊपर पैदल ही धावा किया ।। ४० ।।
ततः प्रत्यागतप्राणाः सर्वे ते सुबलात्मजाः ।
भूयः क्रोधसमाविष्टा इरावन्तमभिद्रुताः ।। ४१ ।।
तदनन्तर सुबलपुत्रोंमें प्राणशक्ति पुनः लौट आयी। अतः वे सब-के-सब सचेत होनेपर पुनः क्रोधमें भर गये और इरावान्पर दौड़े ।। ४१ ।।
इरावानपि खड्गेन दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
अभ्यवर्तत तान् सर्वान् सौबलान् बलदर्पितः ।। ४२ ।।
इरावान् भी बलके अभिमानमें उन्मत्त हो अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाता हुआ खड्गके द्वारा उन समस्त सुबलपुत्रोंका सामना करने लगा ।। ४२ ।।
लाघवेनाथ चरतः सर्वे ते सुबलात्मजाः ।
अन्तरं नाभ्यगच्छन्त चरन्तः शीघ्रगैर्हयैः ।। ४३ ।।
वह अकेला बड़ी फुर्तीसे पैंतरे बदल रहा था और वे सभी सुबलपुत्र शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा विचर रहे थे, तो भी वे अपनेमें उसकी अपेक्षा कोई विशेषता न ला सके ।। ४३ ।।
भूमिष्ठमथ तं संख्ये सम्प्रदृश्य ततः पुनः ।
परिवार्य भृशं सर्वे ग्रहीतुमुपचक्रमुः ।। ४४ ।।
तदनन्तर इरावान्को भूमिपर स्थित देख वे सभी सुबलपुत्र युद्धमें उसे पुनः भलीभाँति घेरकर बन्दी बनानेकी तैयारी करने लगे ।। ४४ ।।
अथाभ्याशगतानां स खड्गेनामित्रकर्शनः ।
असिहस्तापहस्ताभ्यां तेषां गात्राण्यकृन्तत ।। ४५ ।।
तब शत्रुसूदन इरावान्ने निकट आनेपर कभी दाहिने और कभी बायें हाथसे तलवार घुमाकर उसके द्वारा शत्रुओंके अंगोंको छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ४५ ।।
आयुधानि च सर्वेषां बाहूनपि विभूषितान् ।
अपतन्त निकृत्ताङ्गा मृता भूमौ गतासवः ।। ४६ ।।
उन सबके आयुधों और भूषणभूषित भुजाओंको भी उसने काट डाला। इस प्रकार अंग-अंग कट जानेसे वे प्राणशून्य हो मरकर धरतीपर गिर पड़े ।। ४६ ।।
वृषभस्तु महाराज बहुधा विपरिक्षतः ।
अमुच्यत महारौद्रात् तस्माद् वीरावकर्तनात् ।। ४७ ।।