महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शत्रुओंका दमन करनेवाले इरावान्ने अपने शरीरसे वेगपूर्वक प्रासोंको निकालकर उन्हींके द्वारा रणभूमिमें सुबलपुत्रोंपर प्रहार किया ।। ३९ ।।
विकृष्य च शितं खड्गं गृहीत्वा च शरावरम् ।
पदातिर्द्रुतमागच्छज्जिघांसुः सौबलान् युधि ।। ४० ।।
तत्पश्चात् तीखी तलवार और ढाल निकालकर इरावान्ने युद्धमें सुबलपुत्रोंको मार डालनेकी इच्छासे तुरंत उनके ऊपर पैदल ही धावा किया ।। ४० ।।
ततः प्रत्यागतप्राणाः सर्वे ते सुबलात्मजाः ।
भूयः क्रोधसमाविष्टा इरावन्तमभिद्रुताः ।। ४१ ।।
तदनन्तर सुबलपुत्रोंमें प्राणशक्ति पुनः लौट आयी। अतः वे सब-के-सब सचेत होनेपर पुनः क्रोधमें भर गये और इरावान्पर दौड़े ।। ४१ ।।
इरावानपि खड्गेन दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
अभ्यवर्तत तान् सर्वान् सौबलान् बलदर्पितः ।। ४२ ।।
इरावान् भी बलके अभिमानमें उन्मत्त हो अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाता हुआ खड्गके द्वारा उन समस्त सुबलपुत्रोंका सामना करने लगा ।। ४२ ।।
लाघवेनाथ चरतः सर्वे ते सुबलात्मजाः ।
अन्तरं नाभ्यगच्छन्त चरन्तः शीघ्रगैर्हयैः ।। ४३ ।।
वह अकेला बड़ी फुर्तीसे पैंतरे बदल रहा था और वे सभी सुबलपुत्र शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा विचर रहे थे, तो भी वे अपनेमें उसकी अपेक्षा कोई विशेषता न ला सके ।। ४३ ।।
भूमिष्ठमथ तं संख्ये सम्प्रदृश्य ततः पुनः ।
परिवार्य भृशं सर्वे ग्रहीतुमुपचक्रमुः ।। ४४ ।।
तदनन्तर इरावान्को भूमिपर स्थित देख वे सभी सुबलपुत्र युद्धमें उसे पुनः भलीभाँति घेरकर बन्दी बनानेकी तैयारी करने लगे ।। ४४ ।।
अथाभ्याशगतानां स खड्गेनामित्रकर्शनः ।
असिहस्तापहस्ताभ्यां तेषां गात्राण्यकृन्तत ।। ४५ ।।
तब शत्रुसूदन इरावान्ने निकट आनेपर कभी दाहिने और कभी बायें हाथसे तलवार घुमाकर उसके द्वारा शत्रुओंके अंगोंको छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ४५ ।।
आयुधानि च सर्वेषां बाहूनपि विभूषितान् ।
अपतन्त निकृत्ताङ्गा मृता भूमौ गतासवः ।। ४६ ।।
उन सबके आयुधों और भूषणभूषित भुजाओंको भी उसने काट डाला। इस प्रकार अंग-अंग कट जानेसे वे प्राणशून्य हो मरकर धरतीपर गिर पड़े ।। ४६ ।।
वृषभस्तु महाराज बहुधा विपरिक्षतः ।
अमुच्यत महारौद्रात् तस्माद् वीरावकर्तनात् ।। ४७ ।।
महाराज! वृषभ बहुत घायल हो गया था तो भी वीरोंका उच्छेद करनेवाले उस महाभयंकर संग्रामसे उसने अपने-आपको किसी प्रकार मुक्त कर लिया॥ ४७॥ तान् सर्वान् पतितान् दृष्ट्वा भीतो दुर्योधनस्ततः । अभ्यधावत संक्रुद्धो राक्षसं घोरदर्शनम् ॥ ४८॥ आर्ऋष्यशृङ्गिं महेष्वासं मायाविनमरिंदमम् । वैरिणं भीमसेनस्य पूर्वं बकवधेन वै ॥ ४९॥ उन सबको मार गिराया गया देख दुर्योधन भयभीत हो उठा और वह अत्यन्त क्रोधमें भरकर भयंकर दीखनेवाले राक्षस ऋष्यशृंगपुत्र (अलम्बुष)-के पास दौड़ा गया। वह राक्षस शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ, मायावी और महान् धनुर्धर था। पूर्वकालमें किये गये बकासुरवधके कारण वह भीमसेनका वैरी बन बैठा था॥ ४८-४९॥ पश्य वीर यथा ह्येष फाल्गुनस्य सुतो बली । मायावी विप्रियं कर्तुमकार्षीन्मे बलक्षयम् ॥ ५०॥ उसके पास जाकर दुर्योधनने कहा—'वीर! देखो, अर्जुनका यह बलवान् पुत्र बड़ा मायावी है। इसने मेरा अप्रिय करनेके लिये मेरी सेनाका संहार कर डाला है॥ ५०॥ त्वं च कामगमस्तात मायास्त्रे च विशारदः । कृतवैरश्च पार्थेन तस्मादेनं रणे जहि ॥ ५१॥ 'तात! तुम इच्छानुसार चलनेवाले तथा मायामय अस्त्रोंके प्रयोगमें कुशल हो। कुन्तीकुमार भीमने तुम्हारे साथ वैर भी किया है। अतः तुम युद्धमें इस इरावान्को अवश्य मार डालो'॥ ५१॥ बाढमित्येवमुक्त्वा तु राक्षसो घोरदर्शनः । प्रययौ सिंहनादेन यत्रार्जुनसुतो युवा ॥ ५२॥ 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर वह भयानक दिखायी देनेवाला राक्षस सिंहनाद करके जहाँ नवयुवक अर्जुन-कुमार इरावान् था, उस स्थानपर गया॥ ५२॥ आरूढैर्युद्धकुशलैर्विमलप्रासयोधिभिः । वीरैः प्रहारिभिर्युक्तैः स्वैरनीकैः समावृतः ॥ ५३॥ हतशेषैर्महाराज द्विसाहस्रैर्हयोत्तमैः । निहन्तुकामः समरे इरावन्तं महाबलम् ॥ ५४॥ उसके साथ निर्मल प्रास नामक अस्त्रसे युद्ध करनेवाले संग्रामकुशल तथा प्रहार करनेमें समर्थ वीरोंसे युक्त बहुत-सी सेनाएँ थीं। उसके सभी सैनिक सवारियोंपर बैठे हुए थे। उन सबसे घिरा हुआ वह समरभूमिमें महाबली इरावान्को मार डालनेकी इच्छासे युद्धस्थलमें गया। महाराज! मरनेसे बचे हुए दो हजार उत्तम घोड़े उसके साथ थे॥ ५३-५४॥ इरावानपि संक्रुद्धस्त्वरमाणः पराक्रमी । हन्तुकामममित्रघ्नो राक्षसं प्रत्यवारयत् ॥ ५५॥
शत्रुओंका नाश करनेवाला पराक्रमी इरावान् भी क्रोधमें भरा हुआ था। उसने उसे मारनेकी इच्छा रखनेवाले उस राक्षसका बड़ी उतावलीके साथ निवारण किया ।। ५५ ।।
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य राक्षसः सुमहाबलः ।
त्वरमाणस्ततो मायां प्रयोक्तुमुपचक्रमे ।। ५६ ।।
इरावान्को आते देख उस महाबली राक्षसने शीघ्रतापूर्वक मायाका प्रयोग आरम्भ किया ।। ५६ ।।
तेन मायामयाः सृष्टा हयास्तावन्त एव हि ।
स्वारूढा राक्षसैर्घोरैः शूलपट्टिशधारिभिः ।। ५७ ।।
उसने मायामय दो हजार घोड़े उत्पन्न किये, जिनपर शूल और पट्टिश धारण करनेवाले भयंकर राक्षस सवार थे ।। ५७ ।।
ते संरब्धाः समागम्य द्विसाहस्राः प्रहारिणः ।
अचिराद् गमयामासुः प्रेतलोकं परस्परम् ।। ५८ ।।
वे दो हजार प्रहारकुशल योद्धा क्रोधमें भरे हुए आकर इरावान्के सैनिकोंके साथ युद्ध करने लगे। इस प्रकार दोनों ओरके योद्धाओंने परस्पर प्रहार करके शीघ्र ही एक-दूसरेको यमलोक पहुँचा दिया ।। ५८ ।।
तस्मिंस्तु निहते सैन्ये तावुभौ युद्धदुर्मदौ ।
संग्रामे समतिष्ठेतां यथा वै वृत्रवासवौ ।। ५९ ।।
इस प्रकार जब दोनों ओरकी सेनाएँ मार डाली गयीं, तब युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले वे दोनों वीर इरावान् तथा अलम्बुष राक्षस ही युद्धभूमिमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान डटे रहे ।। ५९ ।।
आद्रवन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसं युद्धदुर्मदम् ।
इरावानथ संरब्धः प्रत्यधावन्महाबलः ।। ६० ।।
रणदुर्मद राक्षस अलम्बुषको अपने ऊपर धावा करते देख महाबली इरावान् भी क्रोधमें भरकर उसके ऊपर टूट पड़ा ।। ६० ।।
समभ्याशगतस्याजौ तस्य खड्गेन दुर्मतेः ।
चिच्छेद कार्मुकं दीप्तं शरावापं च सत्वरम् ।। ६१ ।।
एक बार जब वह दुर्बुद्धि राक्षस बहुत निकट आ गया, तब इरावान्ने अपने खड्गसे उसके देदीप्यमान धनुष और भाथेको शीघ्र ही काट डाला ।। ६१ ।।
स निकृत्तं धनुर्दृष्ट्वा खं जवेन समाविशत् ।
इरावन्तमभिक्रुद्धं मोहयन्निव मायया ।। ६२ ।।
धनुषको कटा हुआ देख वह राक्षस क्रोधमें भरे हुए इरावान्को अपनी मायासे मोहित-सा करता हुआ बड़े वेगसे आकाशमें उड़ गया ।। ६२ ।।
ततोऽन्तरिक्षमुत्पत्य इरावानपि राक्षसम् ।
विमोहयित्वा मायाभिस्तस्य गात्राणि सायकैः ।। ६३ ।। चिच्छेद सर्वमर्मज्ञः कामरूपो दुरासदः । तथा स राक्षसश्रेष्ठः शरैः कृत्तः पुनः पुनः ।। ६४ ।। सम्बभूव महाराज समवाप च यौवनम् । माया हि सहजा तेषां वयो रूपं च कामजम् ।। ६५ ।। तब इरावान् भी आकाशमें उछलकर उस राक्षसको अपनी मायाओंसे मोहित करके उसके अंगोंको सायकोंद्वारा छिन्न-भिन्न करने लगा। वह कामरूपधारी श्रेष्ठ राक्षस सम्पूर्ण मर्मस्थानोंको जानने-वाला और दुर्जय था। वह बाणोंसे कटनेपर भी पुनः ठीक हो जाता था। महाराज! वह नयी जवानी प्राप्त कर लेता था; क्योंकि राक्षसोंमें मायाका बल स्वाभाविक होता है और वे इच्छानुसार रूप तथा अवस्था धारण कर लेते हैं ।। ६३—६५ ।।
एवं तद् राक्षसस्याङ्गं छिन्नं छिन्नं बभूव ह । इरावानपि संक्रुद्धो राक्षसं तं महाबलम् ।। ६६ ।। परश्वधेन तीक्ष्णेन चिच्छेद च पुनः पुनः । इस प्रकार उस राक्षसका जो-जो अंग कटता, वह पुनः नये सिरेसे उत्पन्न हो जाता था। इरावान् भी अत्यन्त कुपित होकर उस महाबली राक्षसको बारंबार तीखे फरसेसे काटने लगा ।। ६६ १/२ ।।
स तेन बलिना वीरश्छिद्यमान इरावता ।। ६७ ।। राक्षसोऽप्यनदद् घोरं स शब्दस्तुमुलोऽभवत् । बलवान् इरावान्के फरसेसे छिन्न-भिन्न हुआ वह वीर राक्षस घोर आर्तनाद करने लगा। उसका वह शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ।। ६७ १/२ ।।
परश्वधक्षतं रक्षः सुस्राव बहु शोणितम् ।। ६८ ।। ततश्चुक्रोध बलवांश्चक्रे वेगं च संयुगे । आर्ष्यशृङ्गिस्तथा दृष्ट्वा समरे शत्रुमूर्जितम् ।। ६९ ।। कृत्वा घोरं महद् रूपं ग्रहीतुमुपचक्रमे । अर्जुनस्य सुतं वीरमिरावन्तं यशस्विनम् ।। ७० ।। फरसेसे बारंबार छिदनेके कारण राक्षसके शरीरसे बहुत-सा रक्त बह गया। इससे राक्षस ऋष्यशृंगके बलवान् पुत्र अलम्बुषने समरभूमिमें अत्यन्त क्रोध और वेग प्रकट किया। उसने युद्धस्थलमें अपने शत्रुको प्रबल हुआ देख अत्यन्त भयंकर एवं विशाल रूप धारण करके अर्जुनके वीर एवं यशस्वी पुत्र इरावान्को कैद करनेका प्रयत्न आरम्भ किया ।। ६८—७० ।।
संग्रामशिरसो मध्ये सर्वेषां तत्र पश्यताम् । तां दृष्ट्वा तादृशीं मायां राक्षसस्य दुरात्मनः ।। ७१ ।।
इरावानपि संक्रुद्धो मायां स्रष्टुं प्रचक्रमे ।
युद्धके मुहानेपर समस्त योद्धाओंके देखते-देखते वह इरावान्को पकड़ना चाहता था। उस दुरात्मा राक्षसकी वैसी माया देखकर क्रोधमें भरे हुए इरावान्ने भी मायाका प्रयोग आरम्भ किया ।। ७१ १/२ ।।
तस्य क्रोधाभिभूतस्य समरेष्वनिवर्तिनः ।। ७२ ।।
योऽन्वयो मातृकस्तस्य स एनमभिपेदिवान् ।
संग्राममें पीठ न दिखानेवाला इरावान् जब क्रोधमें भरकर युद्ध कर रहा था, उसी समय उसके मातृकुलके नागोंका समुदाय उसकी सहायताके लिये वहाँ आ पहुँचा ।। ७२ १/२ ।।
स नागैर्बहुभी राजन्निरावान् संवृतो रणे ।। ७३ ।।
दधार सुमहद् रूपमनन्त इव भोगवान् ।
राजन्! रणभूमिमें बहुतेरे नागोंसे घिरे हुए इरावान्ने विशाल शरीरवाले शेषनागकी भाँति बहुत बड़ा रूप धारण कर लिया ।। ७३ १/२ ।।
ततो बहुविधैर्नागैश्छादयामास राक्षसम् ।। ७४ ।।
छाद्यमानस्तु नागैः स ध्यात्वा राक्षसपुङ्गवः ।
सौपर्णं रूपमास्थाय भक्षयामास पन्नगान् ।। ७५ ।।
तदनन्तर उसने बहुत-से नागोंद्वारा राक्षसको आच्छादित कर दिया। नागोंद्वारा आच्छादित होनेपर उस राक्षसराजने कुछ सोच-विचारकर गरुड़का रूप धारण कर लिया और समस्त नागोंको भक्षण करना आरम्भ किया ।। ७४-७५ ।।
मायया भक्षिते तस्मिन्नन्वये तस्य मातृके ।
विमोहितमिरावन्तं न्यहनद् राक्षसोऽसिना ।। ७६ ।।
जब उस राक्षसने इरावान्के मातृकुलके सब नागोंको भक्षण कर लिया, तब मोहित हुए इरावान्को तलवारसे मार डाला ।। ७६ ।।
सकुण्डलं समुकुटं पद्मेन्दुसदृशप्रभम् ।
इरावतः शिरो रक्षाः पातयामास भूतले ।। ७७ ।।
इरावान्के कमल और चन्द्रमाके समान कान्तिमान् तथा कुण्डल एवं मुकुटसे मण्डित मस्तकको काटकर राक्षसने धरतीपर गिरा दिया ।। ७७ ।।
तस्मिंस्तु विहते वीरे राक्षसेनार्जुनात्मजे ।
विशोकाः समपद्यन्त धार्तराष्ट्राः सराजकाः ।। ७८ ।।
इस प्रकार राक्षसद्वारा अर्जुनके वीर पुत्र इरावान्के मारे जानेपर राजा दुर्योधनसहित आपके सभी पुत्र शोकरहित हो गये ।। ७८ ।।
तस्मिन् महति संग्रामे तादृशे भैरवे पुनः ।
महान् व्यतिकरो घोरः सेनयोः समपद्यत ।। ७९ ।।
फिर तो उस भयंकर एवं महान् संग्राममें दोनों सेनाओंका अत्यन्त भयंकर सम्मिश्रण हो गया ।। ७९ ।। गजा हयाः पदाताश्च विमिश्रा दन्तिभिर्हताः । रथाश्च दन्तिनश्चैव पत्तिभिस्तत्र सूदिताः ।। ८० ।। तथा पत्तिरथौघाश्च हयाश्च बहवो रणे । रथिभिर्निहता राजंस्तव तेषां च संकुले ।। ८१ ।। राजन्! आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंके उस संकुल युद्धमें दोनों पक्षोंके मिले हुए हाथी, घोड़े और पैदल दन्तार हाथियोंद्वारा मारे गये। रथ, घोड़े और हाथियोंको पैदल योद्धाओंने मार गिराया तथा बहुत-से पैदल, रथियोंके समूह और घुड़सवार रथी योद्धाओंके द्वारा मार डाले गये ।। ८०-८१ ।। अजानन्नर्जुनश्चापि निहतं पुत्रमौरसम् । जघान समरे शूरान् राजंस्तान् भीष्मरक्षिणः ।। ८२ ।। अर्जुनको अपने औरस पुत्र इरावान्के मारे जानेका पता नहीं लगा था। वे समरांगणमें भीष्मकी रक्षा करनेवाले शूरवीर नरेशोंका संहार कर रहे थे ।। ८२ ।। तथैव तावका राजन् सृंजयाश्च सहस्रशः । जुह्वतः समरे प्राणान् निजघ्नुरितरेतरम् ।। ८३ ।। राजन्! इसी प्रकार आपके पुत्र और सैनिक तथा सहस्रों सृंजय वीर समराग्निमें प्राणोंकी आहुति देते हुए एक-दूसरेको मार रहे थे ।। ८३ ।। मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः । बाहुभिः समयुध्यन्त समवेताः परस्परम् ।। ८४ ।। कवच, रथ और धनुषके नष्ट हो जानेपर बाल बिखेरे हुए बहुतेरे योद्धा परस्पर भिड़कर भुजाओंद्वारा मल्लयुद्ध करने लगे ।। ८४ ।। तथा मर्मातिगैर्भीष्मो निजघान महारथान् । कम्पयन् समरे सेनां पाण्डवानां परंतपः ।। ८५ ।। दूसरी ओर शत्रुओंको संताप देनेवाले भीष्म समरांगणमें अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा पाण्डव-सेनाको कम्पित करते हुए उसके बड़े-बड़े रथियोंको मार रहे थे ।। ८५ ।। तेन यौधिष्ठिरे सैन्ये बहवो मानवा हताः । दन्तिनः सादिनश्चैव रथिनोऽथ हयास्तथा ।। ८६ ।। उन्होंने युधिष्ठिरकी सेनाके बहुत-से पैदलों, सवारोंसहित हाथियों, रथारोहियों और घुड़सवारोंको मार डाला ।। ८६ ।। तत्र भारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् । अत्यद्भुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ।। ८७ ।।
भारत! हमने उस युद्धमें भीष्मका इन्द्रके समान अत्यन्त अद्भुत पराक्रम देखा था॥ ८७॥ तथैव भीमसेनस्य पार्षतस्य च भारत । रौद्रमासीद् रणे युद्धं सात्यकस्य च धन्विनः ॥ ८८ ॥ भरतनन्दन! इसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें भीमसेन, धृष्टद्युम्न तथा धनुर्धर सात्यकिका भयानक युद्ध चल रहा था॥ ८८॥ दृष्ट्वा द्रोणस्य विक्रान्तं पाण्डवान् भयमाविशत् । एक एव रणे शक्तो निहन्तुं सर्वसैनिकान् ॥ ८९ ॥ किं पुनः पृथिवीशूरैर्योधव्रातैः समावृतः । इत्यब्रुवन् महाराज रणे द्रोणेन पीडिताः ॥ ९० ॥ द्रोणाचार्यका पराक्रम देखकर तो पाण्डवोंके मनमें भय समा गया। महाराज! वे युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यसे पीड़ित होकर कहने लगे कि 'रणभूमिमें अकेले द्रोणाचार्य ही समस्त सैनिकोंको मार डालनेकी शक्ति रखते हैं। फिर जब ये भूमण्डलके सुविख्यात शूरवीर योद्धाओंके समुदायोंसे घिरे हुए हैं, तब तो इनकी विजयके लिये कहना ही क्या है?'॥ ८९-९०॥ वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामे भरतर्षभ । उभयोः सेनयोः शूरा नामृष्यन्त परस्परम् ॥ ९१ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस भयंकर संग्राममें दोनों सेनाओंके शूरवीर एक-दूसरेका उत्कर्ष नहीं सह सके॥ ९१॥ आविष्टा इव युध्यन्ते रक्षोभूता महाबलाः । तावकाः पाण्डवेयाश्च संरब्धास्तात धन्विनः ॥ ९२ ॥ तात! आपके और पाण्डवपक्षके महाबली धनुर्धर वीर भूतोंसे आविष्ट-से होकर राक्षसोंके समान बनकर क्रोधपूर्वक एक-दूसरेसे जूझ रहे थे॥ ९२॥ न स्म पश्यामहे कंचित् प्राणान् यः परिरक्षति । संग्रामे दैत्यसंकाशे तस्मिन् वीरवरक्षये ॥ ९३ ॥ बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस दैत्योंके तुल्य संग्राममें हमने किसीको ऐसा नहीं देखा जो अपने प्राणोंकी रक्षा कर रहा हो॥ ९३॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि इरावद्वधे नवतितमोऽध्यायः॥ ९०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें इरावान्का वधविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९०॥
* रथके नीचे रहनेवाली लकड़ीको अनुकर्ष कहते हैं, जिसके सहारे पहिये रहते हैं।
* यहाँ मूलमें 'पतौ' पाठ है। व्याकरणके अनुसार 'पति' शब्दका सप्तमीके एक वचनमें 'पत्यौ' रूप होता है। अतः जहाँ 'पतौ' पदका प्रयोग है, वहाँ मुख्य 'पति'का वाचक पति शब्द नहीं है। 'पतिरिवाचरतीति पतिः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार आचारक्विबन्त 'पति' शब्दका यहाँ प्रयोग है, जिसका अर्थ है—पतिसदृश। तात्पर्य यह कि जिसके लिये कन्याका वाग्दान किया गया है, वह मनोनीत पति ही विवाहके पहलेतक 'पतितुल्य' है। विवाहके बाद साक्षात् 'पति' होता है। इस नागकन्याके मनोनीत पतिको गरुड़ने मार डाला था, इसीलिये 'नष्टे मृते प्रव्रजिते' इस पाराशर-वचनके अनुसार उसका अर्जुनके साथ सम्बन्ध हुआ और धर्मात्मा अर्जुनने उसे पत्नीरूपसे ग्रहण किया।
अध्याय (पृष्ठ 2075)
एकनवतितमोऽध्यायः
घटोत्कच और दुर्योधनका भयानक युद्ध
धृतराष्ट्र उवाच
इरावन्तं तु निहतं दृष्ट्वा पार्था महारथाः ।
संग्रामे किमकुर्वन्त तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! इरावान्को संग्राममें मारा गया देख महारथी कुन्तीपुत्रोंने क्या किया? यह मुझसे कहो ॥ १ ॥
संजय उवाच
इरावन्तं तु निहतं संग्रामे वीक्ष्य राक्षसः ।
व्यनदत् सुमहानादं भैमसेनिर्घटोत्कचः ॥ २ ॥
संजय बोले—राजन्! इरावान्को युद्धभूमिमें मारा गया देख भीमसेनका पुत्र राक्षस घटोत्कच बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगा ॥ २ ॥
नदतस्तस्य शब्देन पृथिवी सागराम्बरा ।
सपर्वतवना राजंश्चचाल सुभृशं तदा ॥ ३ ॥
अन्तरिक्षं दिशश्चैव सर्वाश्च प्रदिशस्तथा ।
नरेश्वर! उस राक्षसकी गर्जनासे समुद्र, आकाश, पर्वत और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी जोर-जोरसे हिलने लगी। अन्तरिक्ष, दिशाएँ तथा समस्त कोणोंके प्रदेश भी काँपने लगे ॥ ३ १/२ ॥
तं श्रुत्वा सुमहानादं तव सैन्यस्य भारत ॥ ४ ॥
ऊरुस्तम्भः समभवद् वेपथुः स्वेद एव च ।
भारत! घटोत्कचका महान् सिंहनाद सुनकर आपके सैनिकोंकी जाँघें अकड़ गयीं, शरीर काँपने लगा और सम्पूर्ण अंगोंसे पसीना निकलने लगा ॥ ४ १/२ ॥
सर्व एव महाराज तावका दीनचेतसः ॥ ५ ॥
सर्वतः समचेष्टन्त सिंहभीता गजा इव ।
महाराज! आपके सभी सैनिक सब ओरसे दीन-चित्त हो सिंहसे डरे हुए हाथियोंकी भाँति भयपूर्ण चेष्टाएँ करने लगे ॥ ५ १/२ ॥
नर्दित्वा सुमहानादं निर्घातमिव राक्षसः ॥ ६ ॥
ज्वलितं शूलमुद्यम्य रूपं कृत्वा विभीषणम् ।
नानारूपप्रहरणैर्वृतो राक्षसपुङ्गवैः ॥ ७ ॥
आजघान सुसंक्रुद्धः कालान्तकयमोपमः ।
वज्रकी गड़गड़ाहटके समान भयंकर गर्जना करके काल, अन्तक और यमके समान क्रोधमें भरे हुए उस राक्षसने भीषणरूप बना प्रज्वलित त्रिशूल हाथमें ले भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न बड़े-बड़े राक्षसोंके साथ आकर आपकी सेनाका संहार आरम्भ किया॥ ६-७ १/२ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धं भीमदर्शनम् ॥ ८ ॥
स्वबलं च भयात् तस्य प्रायशो विमुखीकृतम् ।
अत्यन्त क्रोधमें भरे भयंकर दिखायी देनेवाले उस राक्षसको आक्रमण करते देख उसके भयसे अपनी सेना प्रायः युद्धसे विमुख होकर भाग चली॥ ८ १/२ ॥
ततो दुर्योधनो राजा घटोत्कचमुपाद्रवत् ॥ ९ ॥
प्रगृह्य विपुलं चापं सिंहवद् विनदन् मुहुः ।
तब राजा दुर्योधनने विशाल धनुष लेकर बारंबार सिंहके समान गर्जना करते हुए वहाँ घटोत्कचपर धावा किया॥ ९ १/२ ॥
पृष्ठतोऽनुययौ चैनं स्रवद्भिः पर्वतोपमैः ॥ १० ॥
कुञ्जरैर्दशसाहस्रैर्वङ्गानामधिपः स्वयम् ।
उसके पीछे मदकी धारा बहानेवाले पर्वताकार दस हजार गजराजोंकी सेना लिये स्वयं वंगदेशका राजा भी गया॥ १० १/२ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य गजानीकेन संवृतम् ॥ ११ ॥
पुत्रं तव महाराज चुकोप स निशाचरः ।
महाराज! हाथियोंकी सेनासे घिरे हुए आपके पुत्र दुर्योधनको आते हुए देख वह निशाचर कुपित हो उठा॥ ११ १/२ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ १२ ॥
राक्षसानां च राजेन्द्र दुर्योधनबलस्य च ।
राजेन्द्र! फिर तो दुर्योधनकी सेना तथा राक्षसोंमें भयंकर एवं रोमांचकारी युद्ध होने लगा॥ १२ १/२ ॥
गजानीकं च सम्प्रेक्ष्य मेघवृन्दमिवोदितम् ॥ १३ ॥
अभ्यधावन्त संक्रुद्धा राक्षसाः शस्त्रपाणयः ।
घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान हाथियोंकी सेनाको देखकर क्रोधमें भरे हुए राक्षस हाथमें अस्त्र-शस्त्र लिये उसकी ओर दौड़े॥ १३ १/२ ॥
नदन्तो विविधान् नादान् मेघा इव सविद्युतः ॥ १४ ॥
शरशक्त्यृष्टिनाराचैर्निघ्नन्तो गजयोधिनः ।
भिन्दिपालैस्तथा शूलैर्मुद्गरैः सपरश्वधैः ॥ १५ ॥
पर्वताग्रैश्च वृक्षैश्च निजघ्नुस्ते महागजान् ।
वे भाँति-भाँतिकी गर्जना करते हुए बिजलीसहित मेघोंके समान शोभा पाते थे। बाण, शक्ति, ऋष्टि, नाराच, भिन्दिपाल, शूल, मुद्गर, फरसों, पर्वतशिखर तथा वृक्षोंका प्रहार करके वे गजारोहियों तथा विशाल गजोंका वध करने लगे ।। १४-१५ १/२ ।। भिन्नकुम्भान् विरुधिरान् भिन्नगात्रांश्च वारणान् ।। १६ ।। अपश्याम महाराज वध्यमानान् निशाचरैः । महाराज! निशाचरोंद्वारा मारे जानेवाले गजराजोंको हमने देखा था। उनके कुम्भस्थल फट गये थे, शरीर रक्तहीन हो गये और उनके भिन्न-भिन्न अंग छिन्न-भिन्न हो गये थे ।। १६ १/२ ।। तेषु प्रक्षीयमाणेषु भग्नेषु गजयोधिषु ।। १७ ।। दुर्योधनो महाराज राक्षसान् समुपाद्रवत् । अमर्षवशमापन्नस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ।। १८ ।। महाराज! इस प्रकार गजारोहियोंके भग्न एवं नष्ट हो जानेपर दुर्योधनने अमर्षके वशीभूत हो अपने जीवनका मोह छोड़कर उन राक्षसोंपर धावा किया ।। १७-१८ ।। मुमोच निशितान् बाणान् राक्षसेषु परंतप । जघान च महेष्वासः प्रधानांस्तत्र राक्षसान् ।। १९ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! महाधनुर्धर दुर्योधनने राक्षसोंपर तीखे बाणोंका प्रहार किया और उनमेंसे प्रधान-प्रधान राक्षसोंको मार डाला ।। १९ ।। संक्रुद्धो भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव । वेगवन्तं महारौद्रं विद्युज्जिह्वं प्रमाथिनम् ।। २० ।। शरैश्चतुर्भिंश्चतुरो निजघान महाबलः । भरतश्रेष्ठ! क्रोधमें भरे हुए आपके महाबली पुत्र दुर्योधनने वेगवान्, महारौद्र, विद्युज्जिह्व और प्रमाथी—इन चार राक्षसोंको चार बाणोंसे मार डाला ।। २० १/२ ।। ततः पुनरमेयात्मा शरवर्षं दुरासदम् ।। २१ ।। मुमोच भरतश्रेष्ठो निशाचरबलं प्रति । तत्पश्चात् अमेय आत्मबलसे सम्पन्न भरतश्रेष्ठ दुर्योधनने उस निशाचरसेनाके ऊपर दुर्धर्ष बाणोंकी वर्षा आरम्भ की ।। २१ १/२ ।। तत् तु दृष्ट्वा महत् कर्म पुत्रस्य तव मारिष ।। २२ ।। क्रोधेनाभिप्रजज्वाल भैमसेनिर्महाबलः । आर्य! आपके पुत्रका वह महान् कर्म देखकर भीमसेनका महाबली पुत्र घटोत्कच क्रोधसे जल उठा ।। स विस्फार्य महच्चापमिन्द्राशनिसमप्रभम् ।। २३ ।। अभिदुद्राव वेगेन दुर्योधनमरिंदमम् ।
उसने इन्द्रके वज्रके समान कान्तिमान् विशाल धनुषको खींचकर शत्रुदमन दुर्योधनपर
बड़े वेगसे धावा किया ।।
तमापतन्तमुद्वीक्ष्य कालसृष्टमिवान्तकम् ॥ २४ ॥
न विव्यथे महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
महाराज! कालप्रेरित मृत्युके समान उस घटोत्कचको आते देख आपका पुत्र दुर्योधन
तनिक भी व्यथित नहीं हुआ ।। २४ १/२ ।।
अथैनमब्रवीत् क्रुद्धः क्रूरः संरक्तलोचनः ॥ २५ ॥
अद्यानृण्यं गमिष्यामि पितॄणां मातुरेव च ।
ये त्वया सुनृशंसेन दीर्घकालं प्रवासिताः ॥ २६ ॥
यच्च ते पाण्डवा राजंश्छलद्यूते पराजिताः ।
यच्चैव द्रौपदी कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला ।। २७ ।।
सभाामानीय दुर्बुद्धे बहुधा क्लेशिता त्वया ।
तव च प्रियकामेन आश्रमस्था दुरात्मना ।। २८ ।।
सैन्धवेन परामृष्टा परिभूय पितॄन् मम ।
एतेषामपमानानामन्येषां च कुलाधम ।। २९ ।।
अन्तमद्य गमिष्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् ।
तदनन्तर क्रूर घटोत्कच क्रोधसे लाल आँखें करके दुर्योधनसे बोला—'ओ दुष्ट! आज मैं
अपने उन पितरों और माताके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा, जिन्हें तूने दीर्घकालतक वनमें
रहनेके लिये विवश कर दिया था। तू बड़ा क्रूर है। दुर्बुद्धि नरेश! तूने जो पाण्डवोंको द्यूतमें
छलपूर्वक हराया था और जो एक ही वस्त्र धारण करनेवाली द्रुपदकुमारी कृष्णाको
रजस्वला-अवस्थामें सभाके भीतर ले जाकर नाना प्रकारके क्लेश दिये थे तथा तेरा ही प्रिय
करनेकी इच्छावाले दुरात्मा सिन्धुराजने मेरे पितरोंकी अवहेलना करके आश्रममें रहनेवाली
द्रौपदीका अपहरण किया था, कुलाधम! यदि तू युद्ध छोड़कर भाग नहीं जायगा तो इन
अपमानोंका और अन्य सब अत्याचारोंका भी आज मैं बदला चुका लूँगा' ।। २५—२९ १/२ ।।
एवमुक्त्वा तु हैडिम्बो महद् विस्फार्य कार्मुकम् ।। ३० ।।
संदश्य दशनैरोष्ठं सृक्किणी परिसंलिहन् ।
शरवर्षेण महता दुर्योधनमवाकिरत् ।
पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकः ।। ३१ ।।
ऐसा कहकर हिडिम्बाकुमारने दाँतोंसे ओठ चबाते और जीभसे मुँहके कोनोंको चाटते
हुए अपने विशाल धनुषको खींचकर दुर्योधनपर बाणोंकी बड़ी भारी वृष्टि की। ठीक उसी
तरह, जैसे वर्षा-ऋतुमें मेघ पर्वतके शिखरपर जलकी धाराएँ गिराता है ।। ३०-३१ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि हैडिम्बयुद्धे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें घटोत्कच-युद्धविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2080)
द्विनवतितमोऽध्यायः
घटोत्कचका दुर्योधन एवं द्रोण आदि प्रमुख वीरोंके साथ भयंकर युद्ध
संजय उवाच
ततस्तद् बाणवर्षं तु दुःसहं दानवैरपि ।
दधार युधि राजेन्द्रो यथा वर्षं महाद्विपः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दानवोंके लिये भी दुःसह उस बाण-वर्षाको राजाधिराज दुर्योधनने युद्धमें उसी प्रकार धारण किया, जैसे महान् गजराज जलकी वर्षाको अपने ऊपर धारण करता है ॥ १ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो निःश्वसन्निव पन्नगः ।
संशयं परमं प्राप्तः पुत्रस्ते भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचता हुआ आपका पुत्र दुर्योधन जीवन-रक्षाको लेकर भारी संशयमें पड़ गया ॥ २ ॥
मुमोच निशितांस्तीक्ष्णान् नाराचान् पञ्चविंशतिम् ।
तेऽपतन् सहसा राजंस्तस्मिन् राक्षसपुङ्गवे ॥ ३ ॥
आशीविषा इव क्रुद्धाः पर्वते गन्धमादने ।
उसने अत्यन्त तीखे पचीस नाराच छोड़े। महाराज! वे सब सहसा उस राक्षसराज घटोत्कचपर जाकर गिरे, मानो गन्धमादन पर्वतपर क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प कहींसे आ पड़े हों ॥ ३ १/२ ॥
स तैर्विद्धः स्रवन् रक्तं प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥ ४ ॥
दध्रे मतिं विनाशाय राज्ञः स पिशिताशनः ।
उन बाणोंसे घायल होकर वह राक्षस कुम्भ-स्थलसे मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति अपने शरीरसे रक्तकी धारा प्रवाहित करने लगा। उसने राजा दुर्योधनका विनाश करनेके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया ॥ ४ १/२ ॥
जग्राह च महाशक्तिं गिरीणामपि दारिणीम् ॥ ५ ॥
सम्प्रदीप्तां महोल्काभामशनिं ज्वलितामिव ।
तत्पश्चात् उसने पर्वतोंको भी विदीर्ण कर डालनेवाली प्रज्वलित उल्का एवं वज्रके समान प्रकाशित होनेवाली एक महाशक्ति हाथमें ली ॥ ५ १/२ ॥
समुद्यच्छन् महाबाहुर्जिघांसुस्तनयं तव ॥ ६ ॥
तामुद्यतामभिप्रेक्ष्य वङ्गानामधिपस्त्वरन् ।
कुञ्जरं गिरिसंकाशं राक्षसं प्रत्यचोदयत् ॥ ७ ॥ महाबाहु घटोत्कच आपके पुत्रको मार डालनेकी इच्छासे वह शक्ति ऊपरको उठा रहा था। उसे उठी हुई देख वंगदेशके राजाने बड़ी उतावलीके साथ अपने पर्वताकार गजराजको उस राक्षसकी ओर बढ़ाया ॥ ७ ॥ स नागप्रवरेणाजौ बलिना शीघ्रगामिना । यतो दुर्योधनरथस्तं मार्गं प्रत्यवर्तत ॥ ८ ॥ वे वंगनरेश उस शीघ्रगामी महाबली गजराजपर आरूढ़ हो युद्धके मैदानमें उसी मार्गपर चले जहाँ दुर्योधनका रथ खड़ा था ॥ ८ ॥ रथं च वारयामास कुञ्जरेण सुतस्य ते । मार्गमावारितं दृष्ट्वा राज्ञा वङ्गेन धीमता ॥ ९ ॥ घटोत्कचो महाराज क्रोधसंरक्तलोचनः । उन्होंने अपने हाथीके द्वारा आपके पुत्रका मार्ग रोक दिया। महाराज! बुद्धिमान् वंगनरेशके द्वारा दुर्योधनके रथका मार्ग रुका हुआ देख घटोत्कचके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये ॥ ९ १/२ ॥ उद्यतां तां महाशक्तिं तस्मिंश्चिक्षेप वारणे ॥ १० ॥ स तयाभिहतो राजंस्तेन बाहुप्रमुक्तया । संजातरुधिरोत्पीडः पपात च ममार च ॥ ११ ॥ उसने उस उठायी हुई महाशक्तिको उस हाथीपर ही चला दिया। राजन्! घटोत्कचकी भुजाओंसे छूटी हुई उस शक्तिके आघातसे हाथीका कुम्भस्थल फट गया और उससे रक्तका स्रोत बहने लगा। फिर वह तत्काल ही भूमिपर गिरा और मर गया ॥ १०-११ ॥ पतत्यथ गजे चापि वङ्गानामिश्वरो बली । जवेन समभिद्रुत्य जगाम धरणीतलम् ॥ १२ ॥ हाथीके गिरते समय बलवान् वंगनरेश उसकी पीठसे वेगपूर्वक कूदकर धरतीपर आ गये ॥ १२ ॥ दुर्योधनोऽपि सम्प्रेक्ष्य पतितं वरवारणम् । प्रभग्नं च बलं दृष्ट्वा जगाम परमां व्यथाम् ॥ १३ ॥ उस श्रेष्ठ गजराजको गिरा हुआ देख सारी कौरवसेना भाग खड़ी हुई। यह सब देखकर दुर्योधनके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ १३ ॥ (अशक्तः प्रतियोद्धुं वै दृष्ट्वा तस्य पराक्रमम् ।) क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य आत्मनश्चाभिमानिताम् । प्राप्तेऽपक्रमणे राजा तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १४ ॥ वह घटोत्कचके पराक्रमपर दृष्टिपात करके उसका सामना करनेमें असमर्थ हो गया। क्षत्रियधर्म तथा अपने अभिमानको सामने रखकर पलायनका अवसर प्राप्त होनेपर भी
राजा दुर्योधन पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा रहा ॥ १४ ॥
संधाय च शितं बाणं कालाग्निसमतेजसम् ।
मुमोच परमक्रुद्धस्तस्मिन् घोरे निशाचरे ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् उसने प्रलयकालकी अग्निके समान तेजस्वी एवं तीखे बाणको धनुषपर रखकर उसे अत्यन्त क्रोधपूर्वक उस घोर निशाचरपर छोड़ दिया ॥ १५ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बाणमिन्द्राशनिप्रभम् ।
लाघवान्मोचयामास महात्मा वै घटोत्कचः ॥ १६ ॥
इन्द्रके वज्रके समान प्रकाशित होनेवाले उस बाणको अपनी ओर आता देख महामना राक्षस घटोत्कचने अपनी फुर्तीके कारण अपने-आपको उससे बचा लिया ॥ १६ ॥
भूयश्च विननादोग्रं क्रोधसंरक्तलोचनः ।
त्रासयामास सैन्यानि युगान्ते जलदो यथा ॥ १७ ॥
इसके बाद क्रोधसे आँखें लाल करके वह पुनः भयंकर गर्जना करने लगा। जैसे प्रलयकालमें संवर्तक मेघकी गर्जना होती है, वैसी ही गर्जना करके उसने सारी कौरवसेनाको दहला दिया ॥ १७ ॥
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तस्य भीमस्य रक्षसः ।
आचार्यमुपसङ्गम्य भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ १८ ॥
यथैष निनदो घोरः श्रूयते राक्षसेरितः ।
हैडिम्बो युध्यते नूनं राज्ञा दुर्योधनेन ह ॥ १९ ॥
उस भयानक राक्षसकी वह घोर गर्जना सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्मने द्रोणाचार्यके पास जाकर इस प्रकार कहा—'आचार्य! यह राक्षसके मुखसे निकली हुई जैसी घोर गर्जना सुनायी दे रही है, उससे अनुमान होता है कि अवश्य ही हिडिम्बाका पुत्र घटोत्कच राजा दुर्योधनके साथ जूझ रहा है ॥ १८-१९ ॥
नैष शक्यो हि संग्रामे जेतुं भूतेन केनचित् ।
तत्र गच्छत भद्रं वो राजानं परिरक्षत ॥ २० ॥
'इसे कोई भी प्राणी संग्राममें जीत नहीं सकता, अतः आपका कल्याण हो, वहाँ जाइये और राजा दुर्योधनकी रक्षा कीजिये ॥ २० ॥
अभिद्रुतो महाभागो राक्षसेन महात्मना ।
एतद्धि वः परं कृत्यं सर्वेषां नः परंतपाः ॥ २१ ॥
'जान पड़ता है महाभाग दुर्योधन उस महाकाय राक्षसके आक्रमणका शिकार हो रहा है। शत्रुओंको संताप देनेवाले वीरो! आपके तथा हम सब लोगोंके लिये यही सर्वोत्तम कृत्य है' ॥ २१ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा त्वरमाणा महारथाः ।
उत्तमं जवमास्थाय प्रययुर्यत्र कौरवः ॥ २२ ॥
भीष्मकी यह बात सुनकर सब महारथी उत्तम वेगका आश्रय ले बड़ी उतावलीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ कुरुराज दुर्योधन मौजूद था ।। २२ ।। द्रोणश्च सोमदत्तश्च बाह्लीकोऽथ जयद्रथः । कृपो भूरिश्रवाः शल्य आवन्त्यः सबृहद्बलः ।। २३ ।। अश्वत्थामा विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः । रथाश्चानेकसाहस्रा ये तेषामनुयायिनः ।। २४ ।। अभिद्रुतं परीप्सन्तः पुत्रं दुर्योधनं तव । तदनीकमनाधृष्यं पालितं तु महारथैः ।। २५ ।। द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बाह्लीक, जयद्रथ, कृपाचार्य, भूरिश्रवा, शल्य, अवन्तीका राजकुमार, बृहद्बल, अश्वत्थामा, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति तथा उनके अनुयायी अनेक सहस्र रथी—ये सब लोग राक्षसके द्वारा आक्रान्त हुए आपके पुत्र दुर्योधनकी रक्षा करनेके लिये गये। उन महारथियोंसे पालित होकर वह सेना अजेय हो गयी ।। २३—२५ ।। आततायिनमायान्तं प्रेक्ष्य राक्षससत्तमः । नाकम्पत महाबाहुर्मैनाक इव पर्वतः ।। २६ ।। युद्धमें आततायी दुर्योधनको आते देख राक्षसशिरोमणि महाबाहु घटोत्कच मैनाक पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा रहा ।। २६ ।। प्रगृह्य विपुलं चापं ज्ञातिभिः परिवारितः । शूलमुद्गरहस्तैश्च नानाप्रहरणैरपि ।। २७ ।। उसके जाति-बन्धु हाथोंमें शूल, मुद्गर आदि नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उसे सब ओरसे घेरे हुए थे और उसने एक विशाल धनुष ले रखा था ।। २७ ।। ततः समभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । राक्षसानां च मुख्यस्य दुर्योधनबलस्य च ।। २८ ।। तदनन्तर राक्षसशिरोमणि घटोत्कच तथा दुर्योधनकी सेनामें रोमांचकारी एवं भयंकर युद्ध होने लगा ।। २८ ।। धनुषां कूजतां शब्दः सर्वतस्तुमुलो रणे । अश्रूयत महाराज वंशानां दह्यतामिव ।। २९ ।। महाराज! रणभूमिमें सब ओर बाँसोंके दग्ध होनेके समान धनुषोंकी टंकारका भयंकर शब्द सुनायी देने लगा ।। २९ ।। अस्त्राणां पात्यमानानां कवचेषु शरीरिणाम् । शब्दः समभवद् राजन् गिरीणामिव भिद्यताम् ।। ३० ।। राजन्! देहधारियोंके कवचोंपर पड़नेवाले अस्त्रोंका ऐसा शब्द होता था, मानो पर्वत विदीर्ण हो रहे हों ।। ३० ।। वीरबाहुविसृष्टानां तोमराणां विशाम्पते ।
रूपमासीद् वियत्स्थानां सर्पाणामिव सर्पताम् ॥ ३१ ॥ प्रजानाथ! वीरोंकी भुजाओंसे छोड़े गये तोमर जब आकाशमें आते, उस समय उनका स्वरूप तीव्र गतिसे उड़नेवाले सर्पोंके समान जान पड़ता था ॥ ३१ ॥ ततः परमसंक्रुद्धो विस्फार्य सुमहद् धनुः । राक्षसेन्द्रो महाबाहुर्विनदन् भैरवं रवम् ॥ ३२ ॥ आचार्यस्यार्धचन्द्रेण क्रुद्धश्छिच्छेद कार्मुकम् । सोमदत्तस्य भल्लेन ध्वजं चोन्मथ्य चानदत् ॥ ३३ ॥ तदनन्तर महाबाहु राक्षसराज घटोत्कचने अत्यन्त क्रुद्ध हो भैरव गर्जना करते हुए अपने विशाल धनुषको खींचकर अर्धचन्द्राकार बाणसे द्रोणाचार्यके धनुषको काट डाला। फिर एक भल्लके द्वारा सोमदत्तके ध्वजको खण्डित करके सिंहनाद किया ॥ ३२-३३ ॥ बाह्लीकं च त्रिभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । कृपमेकेन विव्याध चित्रसेनं त्रिभिः शरैः ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् तीन बाणोंसे बाह्लीककी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। एक बाणसे कृपाचार्यको और तीनसे चित्रसेनको भी बींध डाला ॥ ३४ ॥ पूर्णायतविसृष्टेन सम्यक् प्रणिहितेन च । जत्रुदेशे समासाद्य विकर्णं समताडयत् ॥ ३५ ॥ इसके बाद उसने धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर उसपर उत्तम रीतिसे बाणोंका संधान करके विकर्णके गलेकी हँसलीमें गहरी चोट पहुँचाई ॥ ३५ ॥ न्यषीदत् स्वरथोपस्थे शोणितेन परिप्लुतः । ततः पुनरमेयात्मा नाराचान् दश पञ्च च ॥ ३६ ॥ भूरिश्रवसि संक्रुद्धः प्राहिणोद् भरतर्षभ । इससे विकर्ण अपने रथके पिछले भागमें व्याकुल होकर बैठ गया, उसका सारा शरीर रक्तसे नहा उठा था। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् अमेय आत्मबलसे सम्पन्न घटोत्कचने क्रुद्ध होकर भूरिश्रवापर पंद्रह नाराच चलाये ॥ ३६ ½ ॥ ते वर्म भित्त्वा तस्याशु विविशुर्धरणीतलम् ॥ ३७ ॥ विविंशतेश्च द्रौणेश्च यन्तारौ समताडयत् । तौ पेततू रथोपस्थे रश्मीनुत्सृज्य वाजिनाम् ॥ ३८ ॥ वे नाराच उसके कवचको छिन्न-भिन्न करके शीघ्र ही धरतीमें समा गये। साथ ही घटोत्कचने विविंशति और अश्वत्थामाके सारथियोंपर गहरा आघात किया। वे दोनों घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर रथकी बैठकमें गिर पड़े ॥ ३७-३८ ॥ सिंधुराज्ञोऽर्धचन्द्रेण वाराहं स्वर्णभूषितम् । उन्ममाथ महाराज द्वितीयेनाच्छिनद् धनुः ॥ ३९ ॥
महाराज! उसने एक अर्धचन्द्राकार बाणसे सिन्धुराज जयद्रथकी वाराहचिह्नसे युक्त सुवर्णभूषित ध्वजा काट डाली और दूसरे बाणसे उसके धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३९ ॥
चतुर्भीरथ नाराचैरावन्त्यस्य महात्मनः ।
जघान चतुरो वाहान् क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ४० ॥
इसके बाद क्रोधसे लाल आँखें करके घटोत्कचने चार नाराचोंद्वारा महामना अवन्तीनरेशके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ४० ॥
पूर्णायतविसृष्टेन पीतेन निशितेन च ।
निर्बिभेद महाराज राजपुत्रं बृहद्बलम् ॥ ४१ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े गये पानीदार तीखे बाणसे उसने राजकुमार बृहद्बलको विदीर्ण कर दिया ॥ ४१ ॥
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् ।
भृशं क्रोधेन चाविष्टो रथस्थो राक्षसाधिपः ॥ ४२ ॥
उस बाणसे वह गहराईतक बिंध गया और व्यथित होकर रथके पिछले भागमें जा बैठा। इधर राक्षसराज घटोत्कच अत्यन्त क्रोधसे आविष्ट हो रथपर बैठा रहा ॥
चिक्षेप निशितांस्तीक्ष्णाञ्छरानाशीविषोपमान् ।
बिभिदुस्ते महाराज शल्यं युद्धविशारदम् ॥ ४३ ॥
महाराज! रथपर बैठे-ही-बैठे उसने विषधर सर्पोंके समान अत्यन्त तीखे बाण चलाये। उन बाणोंने युद्धविशारद राजा शल्यको पूर्णरूपसे घायल कर दिया ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि हैडिम्बयुद्धे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें घटोत्कचका युद्धविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/३ श्लोक हैं]
अध्याय (पृष्ठ 2086)
त्रिनवतितमोऽध्यायः
घटोत्कचकी रक्षाके लिये आये हुए भीम आदि शूरवीरोंके साथ कौरवोंका युद्ध और उनका पलायन
संजय उवाच
विमुखीकृत्य सर्वांस्तु तावकान् युधि राक्षसः ।
जिघांसुर्भरतश्रेष्ठ दुर्योधनमपाद्रवत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! वह राक्षस युद्धस्थलमें आपके समस्त सैनिकोंको संग्रामसे विमुख करके दुर्योधनको मार डालनेकी इच्छा रखकर उसकी ओर दौड़ा ॥ १ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य राजानं प्रति वेगितम् ।
अभ्यधावञ्जिघांसन्तस्तावका युद्धदुर्मदाः ॥ २ ॥
उसे राजा दुर्योधनकी ओर बड़े वेगसे आते देख आपके रणदुर्मद पुत्र और सैनिक मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर दौड़े ॥ २ ॥
तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथाः ।
तमेकमभ्यधावन्त नदन्तः सिंहसंघवत् ॥ ३ ॥
उन सभी महारथियोंने चार-चार हाथके धनुष खींचते और सिंहोंके समुदायकी भाँति गर्जना करते हुए उस एकमात्र योद्धा घटोत्कचपर धावा किया ॥ ३ ॥
अथैनं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवाकिरन् ।
पर्वतं वारिधाराभिः शरदीव बलाहकाः ॥ ४ ॥
जैसे शरद्ऋतुमें बादल पर्वतके शिखरपर जलकी धाराएँ गिराते हैं, उसी प्रकार उन सब कौरव वीरोंने चारों ओरसे घटोत्कचपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ४ ॥
स गाढविद्धो व्यथितस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।
उत्पपात तदाऽऽकाशं समन्ताद् वैनतेयवत् ॥ ५ ॥
उस समय उन बाणोंके गहरे आघातसे वह अंकुशकी मार खाये हुए हाथीकी भाँति व्यथित हो उठा और तुरंत ही गरुड़के समान आकाशमें सब ओर उड़ने लगा ॥ ५ ॥
व्यनदत् सुमहानादं जीमूत इव शारदः ।
दिशः खं विदिशश्चैव नादयन् भैरवस्वनः ॥ ६ ॥
आकाशमें स्थित होकर शरद्ऋतुके बादलकी भाँति वह अपने भयंकर स्वरसे अन्तरिक्ष, दिशाओं तथा विदिशाओंको गुँजाता हुआ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ६ ॥
राक्षसस्य तु तं शब्दं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ।
उवाच भरतश्रेष्ठ भीमसेनमरिंदमम् ॥ ७ ॥