भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2070

विमोहयित्वा मायाभिस्तस्य गात्राणि सायकैः ।। ६३ ।। चिच्छेद सर्वमर्मज्ञः कामरूपो दुरासदः । तथा स राक्षसश्रेष्ठः शरैः कृत्तः पुनः पुनः ।। ६४ ।। सम्बभूव महाराज समवाप च यौवनम् । माया हि सहजा तेषां वयो रूपं च कामजम् ।। ६५ ।। तब इरावान् भी आकाशमें उछलकर उस राक्षसको अपनी मायाओंसे मोहित करके उसके अंगोंको सायकोंद्वारा छिन्न-भिन्न करने लगा। वह कामरूपधारी श्रेष्ठ राक्षस सम्पूर्ण मर्मस्थानोंको जानने-वाला और दुर्जय था। वह बाणोंसे कटनेपर भी पुनः ठीक हो जाता था। महाराज! वह नयी जवानी प्राप्त कर लेता था; क्योंकि राक्षसोंमें मायाका बल स्वाभाविक होता है और वे इच्छानुसार रूप तथा अवस्था धारण कर लेते हैं ।। ६३—६५ ।।

एवं तद् राक्षसस्याङ्गं छिन्नं छिन्नं बभूव ह । इरावानपि संक्रुद्धो राक्षसं तं महाबलम् ।। ६६ ।। परश्वधेन तीक्ष्णेन चिच्छेद च पुनः पुनः । इस प्रकार उस राक्षसका जो-जो अंग कटता, वह पुनः नये सिरेसे उत्पन्न हो जाता था। इरावान् भी अत्यन्त कुपित होकर उस महाबली राक्षसको बारंबार तीखे फरसेसे काटने लगा ।। ६६ १/२ ।।

स तेन बलिना वीरश्छिद्यमान इरावता ।। ६७ ।। राक्षसोऽप्यनदद् घोरं स शब्दस्तुमुलोऽभवत् । बलवान् इरावान्‌के फरसेसे छिन्न-भिन्न हुआ वह वीर राक्षस घोर आर्तनाद करने लगा। उसका वह शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ।। ६७ १/२ ।।

परश्वधक्षतं रक्षः सुस्राव बहु शोणितम् ।। ६८ ।। ततश्चुक्रोध बलवांश्चक्रे वेगं च संयुगे । आर्ष्यशृङ्गिस्तथा दृष्ट्वा समरे शत्रुमूर्जितम् ।। ६९ ।। कृत्वा घोरं महद् रूपं ग्रहीतुमुपचक्रमे । अर्जुनस्य सुतं वीरमिरावन्तं यशस्विनम् ।। ७० ।। फरसेसे बारंबार छिदनेके कारण राक्षसके शरीरसे बहुत-सा रक्त बह गया। इससे राक्षस ऋष्यशृंगके बलवान् पुत्र अलम्बुषने समरभूमिमें अत्यन्त क्रोध और वेग प्रकट किया। उसने युद्धस्थलमें अपने शत्रुको प्रबल हुआ देख अत्यन्त भयंकर एवं विशाल रूप धारण करके अर्जुनके वीर एवं यशस्वी पुत्र इरावान्‌को कैद करनेका प्रयत्न आरम्भ किया ।। ६८—७० ।।

संग्रामशिरसो मध्ये सर्वेषां तत्र पश्यताम् । तां दृष्ट्वा तादृशीं मायां राक्षसस्य दुरात्मनः ।। ७१ ।।