भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2076

वज्रकी गड़गड़ाहटके समान भयंकर गर्जना करके काल, अन्तक और यमके समान क्रोधमें भरे हुए उस राक्षसने भीषणरूप बना प्रज्वलित त्रिशूल हाथमें ले भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न बड़े-बड़े राक्षसोंके साथ आकर आपकी सेनाका संहार आरम्भ किया॥ ६-७ १/२ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धं भीमदर्शनम् ॥ ८ ॥
स्वबलं च भयात् तस्य प्रायशो विमुखीकृतम् ।
अत्यन्त क्रोधमें भरे भयंकर दिखायी देनेवाले उस राक्षसको आक्रमण करते देख उसके भयसे अपनी सेना प्रायः युद्धसे विमुख होकर भाग चली॥ ८ १/२ ॥

ततो दुर्योधनो राजा घटोत्कचमुपाद्रवत् ॥ ९ ॥
प्रगृह्य विपुलं चापं सिंहवद् विनदन् मुहुः ।
तब राजा दुर्योधनने विशाल धनुष लेकर बारंबार सिंहके समान गर्जना करते हुए वहाँ घटोत्कचपर धावा किया॥ ९ १/२ ॥

पृष्ठतोऽनुययौ चैनं स्रवद्भिः पर्वतोपमैः ॥ १० ॥
कुञ्जरैर्दशसाहस्रैर्वङ्गानामधिपः स्वयम् ।
उसके पीछे मदकी धारा बहानेवाले पर्वताकार दस हजार गजराजोंकी सेना लिये स्वयं वंगदेशका राजा भी गया॥ १० १/२ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य गजानीकेन संवृतम् ॥ ११ ॥
पुत्रं तव महाराज चुकोप स निशाचरः ।
महाराज! हाथियोंकी सेनासे घिरे हुए आपके पुत्र दुर्योधनको आते हुए देख वह निशाचर कुपित हो उठा॥ ११ १/२ ॥

ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ १२ ॥
राक्षसानां च राजेन्द्र दुर्योधनबलस्य च ।
राजेन्द्र! फिर तो दुर्योधनकी सेना तथा राक्षसोंमें भयंकर एवं रोमांचकारी युद्ध होने लगा॥ १२ १/२ ॥

गजानीकं च सम्प्रेक्ष्य मेघवृन्दमिवोदितम् ॥ १३ ॥
अभ्यधावन्त संक्रुद्धा राक्षसाः शस्त्रपाणयः ।
घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान हाथियोंकी सेनाको देखकर क्रोधमें भरे हुए राक्षस हाथमें अस्त्र-शस्त्र लिये उसकी ओर दौड़े॥ १३ १/२ ॥

नदन्तो विविधान् नादान् मेघा इव सविद्युतः ॥ १४ ॥
शरशक्त्यृष्टिनाराचैर्निघ्नन्तो गजयोधिनः ।
भिन्दिपालैस्तथा शूलैर्मुद्गरैः सपरश्वधैः ॥ १५ ॥
पर्वताग्रैश्च वृक्षैश्च निजघ्नुस्ते महागजान् ।