भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 207

प्रसह्य वा यत्र हरेत दृष्टः ।

उभौ गर्ह्यो भवतः संजयैतौ

किं वै पृथक्त्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रे ॥ ३३ ॥

चोर छिपा रहकर धन चुरा ले जाय अथवा सामने आकर डाका डाले, दोनों ही

दशाओंमें वे चोर-डाकू निन्दाके ही पात्र होते हैं। संजय! तुम्हीं कहो, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन

और उन चोर-डाकुओंमें क्या अन्तर है? ॥ ३३ ॥

सोऽयं लोभान्मन्न्यते धर्ममेतं

यमिच्छति क्रोधवशानुगामी ।

भागः पुनः पाण्डवानां निविष्ट-

स्तं नः कस्मादाददीरन् परे वै ॥ ३४ ॥

दुर्योधन क्रोधके वशीभूत हो उसके अनुसार चलनेवाला है और वह लोभसे राज्यको ले

लेना चाहता है। इसे वह धर्म मान रहा है; परंतु वह तो पाण्डवोंका भाग है, जो कौरवोंके

यहाँ धरोहरके रूपमें रखा गया है। संजय! हमारे उस भागको हमसे शत्रुता रखनेवाले

कौरव कैसे ले सकते हैं? ॥ ३४ ॥

अस्मिन् पदे युध्यतां नो वधोऽपि

श्लाघ्यः पित्र्यं परराज्याद् विशिष्टम् ।

एतान् धर्मान् कौरवाणां पुराणा-

नाचक्षीथाः संजय राजमध्ये ॥ ३५ ॥

सूत! इस राज्यभागकी प्राप्तिके लिये युद्ध करते हुए हमलोगोंका वध हो जाय तो वह

भी हमारे लिये स्पृहणीय ही है। बाप-दादोंका राज्य पराये राज्यकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। संजय!

तुम राजाओंकी मण्डलीमें राजाओंके इन प्राचीन धर्मोंका कौरवोंके समक्ष वर्णन

करना ॥ ३५ ॥

एते मदान्मृत्युवशाभिपन्नाः

समानीता धार्तराष्ट्रेण मूढाः ।

इदं पुनः कर्म पापीय एव

सभामध्ये पश्य वृत्तं कुरूणाम् ॥ ३६ ॥

दुर्योधनने जिन्हें युद्धके लिये बुलवाया है, वे मूर्ख राजा बलके मदसे मोहित होकर

मौतके फंदेमें फँस गये हैं। संजय! भरी सभामें कौरवोंने जो यह अत्यन्त पापपूर्ण कर्म

किया था, उनके इस दुराचारपर दृष्टि डालो ॥ ३६ ॥

प्रियां भार्यां द्रौपदीं पाण्डवानां

यशस्विनीं शीलवृत्तोपपन्नाम् ।

यदुपैक्षन्त कुरवो भीष्ममुख्याः

कामानुगेनोपरुद्धां व्रजन्तीम् ॥ ३७ ॥