महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाण्डवोंकी प्यारी पत्नी यशस्विनी द्रौपदी जो शील और सदाचारसे सम्पन्न है, रजस्वला-अवस्थामें सभाके भीतर लायी जा रही थी, परंतु भीष्म आदि प्रधान कौरवोंने भी उसकी ओरसे उपेक्षा दिखायी ॥ ३७ ॥
तं चेत् तदा ते सकुमारवृद्धा अवारयिष्यन् कुरवः समेताः । मम प्रियं धृतराष्ट्रोऽकरिष्यत् पुत्राणां च कृतमस्याभविष्यत् ॥ ३८ ॥
यदि बालकसे लेकर बूढ़ेतक सभी कौरव उस समय दुःशासनको रोक देते तो राजा धृतराष्ट्र मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करते तथा उनके पुत्रोंका भी प्रिय मनोरथ सिद्ध हो जाता ॥ ३८ ॥
दुःशासनः प्रातिलोम्यान्निनाय सभामध्ये श्वशुराणां च कृष्णाम् । सा तत्र नीता करुणं व्यपेक्ष्य नान्यं क्षत्तुर्नाथमवाप किंचित् ॥ ३९ ॥
दुःशासन मर्यादाके विपरीत द्रौपदीको सभाके भीतर श्वशुरजनोंके समक्ष घसीट ले गया। द्रौपदीने वहाँ जाकर कातरभावसे चारों ओर करुणदृष्टि डाली, परंतु उसने वहाँ विदुरजीके सिवा और किसीको अपना रक्षक नहीं पाया ॥ ३९ ॥
कार्पण्यादेव सहितास्तत्र भूपा नाशक्नुवन् प्रतिवक्तुं सभायाम् । एकः क्षत्ता धर्ममर्थं ब्रुवाणो धर्मबुद्ध्या प्रत्युवाचाल्पबुद्धिम् ॥ ४० ॥
उस समय सभामें बहुत-से भूपाल एकत्रित थे, परंतु अपनी कायरताके कारण वे उस अन्यायका प्रतिवाद न कर सके। एकमात्र विदुरजीने अपना धर्म समझकर मन्दबुद्धि दुर्योधनसे धर्मानुकूल वचन कहकर उसके अन्यायका विरोध किया ॥ ४० ॥
अबुद्ध्वा त्वं धर्ममेतं सभाया- मथेच्छसे पाण्डवस्योपदेष्टुम् । कृष्णा त्वेतत् कर्म चकार शुद्धं सुदुष्करं तत्र सभां समेत्य ॥ ४१ ॥ येन कृच्छ्रात् पाण्डवानुज्जहार तथाऽऽत्मानं नौरिव सागरौघात् । यत्राब्रवीत् सूतपुत्रः सभायां कृष्णां स्थितां श्वशुराणां समीपे ॥ ४२ ॥ न ते गतिर्विद्यते याज्ञसेनि