महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2097, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुर्योधन और अश्वत्थामाने एक साथ उनपर धावा किया ।। २२-२३ ।। तावापतन्तौ सहितौ त्वरितौ बलिनां वरौ । अभ्यधावत वेगेन त्वरमाणो वृकोदरः ।। २४ ।। बलवानोंमें श्रेष्ठ उन दोनों वीरोंको एक साथ शीघ्रतापूर्वक आते देख भीमसेन भी उतावले होकर बड़े वेगसे उनकी ओर बढ़े ।। २४ ।। तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धं भीमदर्शनम् । समभ्यधावंस्त्वरिताः कौरवाणां महारथाः ।। २५ ।। क्रोधमें भरकर भयंकर दिखायी देनेवाले भीमसेनको देखकर कौरव महारथी बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर दौड़े ।। २५ ।। भारद्वाजमुखाः सर्वे भीमसेनजिघांसया । नानाविधानि शस्त्राणि भीमस्योरस्यपातयन् ।। २६ ।। द्रोणाचार्य आदि सभी योद्धा भीमसेनके वधकी इच्छासे उनकी छातीपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करने लगे ।। २६ ।। सहिताः पाण्डवं सर्वे पीडयन्तः समन्ततः । तं दृष्ट्वा संशयं प्राप्तं पीड्यमानं महारथम् ।। २७ ।। अभिमन्युप्रभृतयः पाण्डवानां महारथाः । अभ्यधावन् परीप्सन्तः प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ।। २८ ।। वे सब एक साथ होकर चारों ओरसे पाण्डुकुमार भीमसेनको पीड़ा देने लगे। महारथी भीमसेनको पीड़ित और उनके प्राणोंको संकटमें पड़ा देख अभिमन्यु आदि पाण्डव महारथी अपने दुस्त्यज प्राणोंका मोह छोड़कर उनकी रक्षाके लिये दौड़े आये ।। २७-२८ ।। अनूपाधिपतिः शूरो भीमस्य दयितः सखा । नीलो नीलाम्बुदप्रख्यः संक्रुद्धो द्रौणिमभ्ययात् ।। २९ ।। अनूप देशका शूरवीर राजा नील भीमसेनका प्रिय सखा था। उसकी अंगकान्ति श्याम मेघके समान सुन्दर थी। उसने अत्यन्त कुपित होकर अश्वत्थामापर आक्रमण किया ।। २९ ।। स्पर्धते हि महेष्वासो नित्यं द्रोणसुतेन सः । स विस्फार्य महच्चापं द्रौणिं विव्याध पत्रिणा ।। ३० ।। यथा शक्रो महाराज पुरा विव्याध दानवम् । विप्रचित्तिं दुराधर्षं देवतानां भयंकरम् ।। ३१ ।। येन लोकत्रयं क्रोधात् त्रासितं स्वेन तेजसा ।