महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2098, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह महाधनुर्धर वीर प्रतिदिन द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके साथ स्पर्धा रखता था। महाराज! उसने अपने विशाल धनुषको खींचकर एक पंखयुक्त बाणसे अश्वत्थामाको उसी प्रकार घायल कर दिया, जैसे इन्द्रने पूर्वकालमें देवताओंके लिये भयंकर विप्रचित्ति नामक दुर्धर्ष दानवको घायल किया था, उस दानवने अपने क्रोध एवं तेजसे तीनों लोकोंको भयभीत कर रखा था ।। ३०-३१ ½ ।।
तथा नीलेन निर्भिन्नः सुमुक्तेन पतत्रिणा ।। ३२ ।। संजातरुधिरोत्पीडो द्रौणिः क्रोधसमन्वितः ।
नीलके छोड़े हुए उस पंखयुक्त बाणसे विदीर्ण होकर अश्वत्थामाके शरीरसे रक्तका प्रवाह बह चला। इससे अश्वत्थामाको बड़ा क्रोध हुआ ।। ३२ ½ ।।
स विस्फार्य धनुश्चित्रमिन्द्राशनिसमस्वनम् ।। ३३ ।। दध्रे नीलविनाशाय मतिं मतिमतां वरः ।
तदनन्तर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामाने इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर टंकार करनेवाले अपने विचित्र धनुषको खींचकर नीलको मार डालनेका विचार किया ।। ३३ ½ ।।
ततः संधाय विमलान् भल्लान् कर्मारमार्जितान् ।। ३४ ।। जघान चतुरो वाहान् सारथिं ध्वजमेव च । सप्तमेन च भल्लेन नीलं विव्याध वक्षसि ।। ३५ ।।
तत्पश्चात् उसने लोहारके माँजे हुए सात चमकीले भल्लोंको धनुषपर रखकर चलाया। उनमेंसे चारके द्वारा उसने नीलके चारों घोड़ोंको और पाँचवेंसे सारथिको मार डाला। छठेसे ध्वजको काट गिराया और सातवें भल्लसे नीलकी छातीमें प्रहार किया ।। ३४-३५ ।।
स गाढविद्धो व्यथितो रथोप्स्थ उपाविशत् । मोहितं वीक्ष्य राजानं नीलमभ्रचयोपमम् ।। ३६ ।। घटोत्कचोऽभिसंक्रुद्धो ज्ञातिभिः परिवारितः । अभिदुद्राव वेगेन द्रौणिमाहवशोभिनम् ।। ३७ ।। तथेतरे चाभ्यधावन् राक्षसा युद्धदुर्मदाः ।
उस बाणसे अधिक घायल हो जानेके कारण वे व्यथित हो रथके पिछले भागमें बैठ गये। नील मेघसमूहके समान श्याम वर्णवाले राजा नीलको अचेत हुआ देख अपने भाई-बन्धुओंसे घिरा हुआ घटोत्कच अत्यन्त कुपित हो युद्धमें शोभा पानेवाले अश्वत्थामाकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा। उसके साथ ही दूसरे-दूसरे रणदुर्मद राक्षसोंने भी उसपर धावा किया ।। ३६-३७ ½ ।।
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य राक्षसं घोरदर्शनम् ।। ३८ ।। अभ्यधावत तेजस्वी भारद्वाजात्मजस्त्वरन् ।
देखनेमें अत्यन्त भयंकर राक्षस घटोत्कचको धावा करते देख तेजस्वी अश्वत्थामाने बड़ी उतावलीके साथ उसपर आक्रमण किया ।। ३८ ½ ।।