महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2129, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंस पूज्यमानः कुरुभिः कौरवाणां महाबलः ॥ २६ ॥ प्रययौ सदनं राजा गाङ्गेयस्य यशस्विनः । अन्वीयमानः सततं सोदरैः परिवारितः ॥ २७ ॥ इस प्रकार कौरवोंसे पूजित हो महाबली कौरवराज दुर्योधन यशस्वी भीष्मके शिविरमें गया। उसके भाई उसे घेरकर निरन्तर उसीके साथ-साथ रहे ॥ २६-२७ ॥ दक्षिणं दक्षिणः काले सम्भृत्य स्वभुजं तदा । हस्तिहस्तोपमं शैक्षं सर्वशत्रुनिबर्हणम् ॥ २८ ॥ प्रगृह्णन्नञ्जलीन् नृणामुद्यतान् सर्वतो दिशः । शुश्राव मधुरा वाचो नानादेशनिवासिनाम् ॥ २९ ॥ उदार स्वभाववाले राजा दुर्योधनने उस समय सम्पूर्ण शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ, हाथीकी सूँड़के समान विशाल तथा अस्त्र-प्रहारकी शिक्षामें निपुणताको प्राप्त हुई अपनी दाहिनी भुजाको ऊपर उठाकर सम्पूर्ण दिशाओंमें उठी हुई विभिन्न देशके निवासी मनुष्योंकी प्रणामांजलियोंको स्वीकार करते हुए उनकी मधुर बातें सुनीं ॥ २८-२९ ॥ संस्तूयमानः सूतैश्च मागधैश्च महायशाः । पूजयानश्च तान् सर्वान् सर्वलोकेश्वरेश्वरः ॥ ३० ॥ (एवं स प्रययौ राजा सर्वसैन्यसमावृतः ।) सम्पूर्ण जगत्का अधीश्वर महायशस्वी राजा दुर्योधन सम्पूर्ण सेनाओंसे घिरकर सूतों और मागधोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता और सब लोगोंका समादर करता हुआ (भीष्मके शिविरकी ओर) आगे बढ़ता गया ॥ ३० ॥ प्रदीपैः काञ्चनैस्तत्र गन्धतैलावसेचितैः । परिवव्रुर्महाराजं प्रज्वलद्भिः समन्ततः ॥ ३१ ॥ सुगन्धित तेलसे भरे हुए सोनेके जलते दीपक लिये बहुत-से सेवक महाराज दुर्योधनको सब ओरसे घेरकर चल रहे थे ॥ ३१ ॥ स तैः परिवृतो राजा प्रदीपैः काञ्चनैर्ज्वलन् । शुशुभे चन्द्रमा युक्तो दीप्तैरिव महाग्रहैः ॥ ३२ ॥ उन सुवर्णमय प्रदीपोंसे घिरकर प्रकाशित होनेवाला राजा दुर्योधन दीप्तिमान् महाग्रहोंसे संयुक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ ३२ ॥ काञ्चनोष्णीषिणस्तत्र वेत्रझर्झरपाणयः । प्रोत्सारयन्तः शनकैस्तं जनं सर्वतो दिशम् ॥ ३३ ॥ सुनहरी पगड़ी धारण करके हाथोंमें बेंत और झर्झर लिये बहुतेरे सिपाही धीरे-धीरे सब ओरसे लोगोंकी भीड़को हटाते हुए चल रहे थे ॥ ३३ ॥ सम्प्राप्य तु ततो राजा भीष्मस्य सदनं शुभम् । अवतीर्य हयाच्चापि भीष्मं प्राप्य जनेश्वरः ॥ ३४ ॥