भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2130

अभिवाद्य ततो भीष्मं निषण्णः परमासने ।

काञ्चने सर्वतोभद्रे स्पर्द्ध्यास्तरणसंवृते ॥ ३५ ॥

तत्पश्चात् राजा दुर्योधन भीष्मके सुन्दर निवास-स्थानके निकट पहुँचकर घोड़ेसे उतर

पड़ा और भीष्मजीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके बहुमूल्य बिछौनोंसे युक्त सर्वतोभद्र

नामक सर्वोत्तम स्वर्णमय सिंहासनपर बैठ गया ॥ ३४-३५ ॥

उवाच प्राञ्जलिर्भीष्मं बाष्पकण्ठोऽश्रुलोचनः ।

त्वां वयं हि समाश्रित्य संयुगे शत्रुसूदन ॥ ३६ ॥

उत्सहेम रणे जेतुं सेन्द्रानपि सुरासुरान् ।

किमु पाण्डुसुतान् वीरान् ससुहृद्गणबान्धवान् ॥ ३७ ॥

तस्मादर्हसि गाङ्गेय कृपां कर्तुं मयि प्रभो ।

जहि पाण्डुसुतान् वीरान् महेन्द्र इव दानवान् ॥ ३८ ॥

इसके बाद नेत्रोंमें आँसू भरकर हाथ जोड़े हुए गद्गद कण्ठसे वह भीष्मसे इस प्रकार

बोला—'शत्रुसूदन! हमलोग आपका आश्रय लेकर युद्धके मैदानमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण

देवताओं तथा असुरोंको भी जीतनेका उत्साह रखते हैं; फिर मित्रों और बान्धवोंसहित वीर

पाण्डवोंको जीतना कौन बड़ी बात है। अतः प्रभो! गंगानन्दन! आपको मुझपर कृपा करनी

चाहिये। जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार आप वीर पाण्डवोंको मार

डालिये ॥ ३६–३८ ॥

अहं सर्वान् महाराज निहनिष्यामि सोमकान् ।

पञ्चालान् केकयैः सार्धं करूषांश्चेति भारत ॥ ३९ ॥

त्वद्वचः सत्यमेवास्तु जहि पार्थान् समागतान् ।

सोमकांश्च महेष्वासान् सत्यवाग् भव भारत ॥ ४० ॥

'महाराज! भरतनन्दन! मैं केकयोंसहित सम्पूर्ण सोमकों, पांचालों और करूषोंको मार

डालूँगा—आपकी यह बात सत्य हो। भारत! आप युद्धमें सामने आये हुए कुन्तीपुत्रों और

महाधनुर्धर सोमकोंका वध कीजिये और ऐसा करके अपने वचनको सत्य

कीजिये ॥ ३९-४० ॥

दयया यदि वा राजन् द्वेष्यभावान्मम प्रभो ।

मन्दभाग्यतया वापि मम रक्षसि पाण्डवान् ॥ ४१ ॥

अनुजानीहि समरे कर्णमाहवशौभिनम् ।

स जेष्यति रणे पार्थान् ससुहृद्गणबान्धवान् ॥ ४२ ॥

'शक्तिशाली राजन्! यदि पाण्डवोंके प्रति दयाभाव अथवा मेरे दुर्भाग्यवश मेरे प्रति

द्वेषभाव रखनेके कारण आप पाण्डवोंकी रक्षा करते हैं तो समरभूमिमें शोभा पानेवाले

कर्णको युद्धके लिये आज्ञा दे दीजिये। वह सुहृदों और बान्धवोंसहित कुन्तीपुत्रोंको अवश्य

जीत लेगा' ॥ ४१-४२ ॥