भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2135

तमहं न हनिष्यामि प्राणत्यागेऽपि भारत । यासौ प्राङ्निर्मिता धात्रा सैषा वै स्त्री शिखण्डिनी ॥ २२ ॥ ‘भारत! मेरे प्राणोंपर संकट आ जाय तो भी मैं उसे नहीं मारूँगा। जिसे विधाताने पहले स्त्री बनाया था, वह शिखण्डिनी आज भी मेरी दृष्टिमें स्त्री ही है ॥ २२ ॥

सुखं स्वपिहि गान्धारे श्वोऽपि कर्ता महारणम् । यं जनाः कथयिष्यन्ति यावत् स्थास्यति मेदिनी ॥ २३ ॥ ‘गान्धारीनन्दन! अब तुम सुखसे जाकर सो रहो। कल मैं बड़ा भीषण युद्ध करूँगा, जिसकी चर्चा लोग तबतक करते रहेंगे, जबतक कि यह पृथ्वी बनी रहेगी’ ॥

एवमुक्तस्तव सुतो निर्जगाम जनेश्वर । अभिवाद्य गुरुं मूर्ध्ना प्रययौ स्वं निवेशनम् ॥ २४ ॥ जनेश्वर! भीष्मके ऐसा कहनेपर आपका पुत्र दुर्योधन अपने उन गुरुजनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करनेके पश्चात् अपने शिविरको चला गया ॥ २४ ॥

आगम्य तु ततो राजा विसृज्य च महाजनम् । प्रविवेश ततस्तूर्णं क्षयं शत्रुक्षयङ्करः ॥ २५ ॥ वहाँ आकर शत्रुओंका विनाश करनेवाले राजा दुर्योधनने लोगोंके उस महान् समुदायको तुरंत विदा कर दिया और स्वयं शिविरके भीतर प्रवेश किया ॥ २५ ॥

प्रविष्टः स निशां तां च गमयामास पार्थिवः । प्रभातायां च शर्वर्यां प्रातरुत्थाय तान् नृपः ॥ २६ ॥ राज्ञः समाज्ञापयत सेनां योजयतेति ह । अद्य भीष्मो रणे क्रुद्धो निहनिष्यति सोमकान् ॥ २७ ॥ भूपाल! वहाँ जाकर राजाने सुखसे रात बितायी और सबेरा होनेपर उसने प्रातःकाल उठकर राजाओंको यह आज्ञा दी—‘राजसिंहो! तुम सब लोग सेनाको युद्धके लिये तैयार करो, आज पितामह भीष्म रणभूमिमें कुपित होकर सोमकोंका संहार करेंगे’ ॥ २६-२७ ॥

दुर्योधनस्य तच्छ्रुत्वा रात्रौ विलपितं बहु । मन्यमानः स तं राजन् प्रत्यादेशमिवात्मनः ॥ २८ ॥ राजन्! रातमें दुर्योधनके अनेक प्रकारके विलापको सुनकर भीष्मने यह समझ लिया कि अब दुर्योधन मुझे युद्धसे हटाना चाहता है ॥ २८ ॥

निर्वेदं परमं गत्वा विनिन्द्य परवश्यताम् । दीर्घं दध्यौ शान्तनवो योद्धुकामोऽर्जुनं रणे ॥ २९ ॥ इससे उनके मनमें बड़ा खेद हुआ। भीष्मने पराधीनताकी भूरि-भूरि निन्दा करके रणभूमिमें अर्जुनके साथ युद्ध करनेका संकल्प लेकर दीर्घकालतक विचार किया ॥ २९ ॥

इङ्गितेन तु तज्ज्ञात्वा गाङ्गेयेन विचिन्तितम् । दुर्योधनो महाराज दुःशासनमचोदयत् ॥ ३० ॥