भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2136, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2136

महाराज! गंगानन्दन भीष्मने क्या सोचा है? इस बातको संकेतसे समझकर दुर्योधनने दुःशासनसे कहा— ।। ३० ।। दुःशासन रथास्तूर्णं युज्यन्तां भीष्मरक्षिणः । द्वाविंशतिमनीकानि सर्वाण्येवाभिचोदय ।। ३१ ।। ‘दुःशासन! तुम शीघ्र ही भीष्मकी रक्षा करनेवाले रथोंको जोतकर तैयार कराओ। अपने पास कुल बाईस सेनाएँ हैं। उन सबको भीष्मकी रक्षामें ही नियुक्त कर दो ।। ३१ ।। इदं हि समनुप्राप्तं वर्षपूगाभिचिन्तितम् । पाण्डवानां ससैन्यानां वधो राज्यस्य चागमः ।। ३२ ।। ‘आज वह अवसर प्राप्त हुआ है, जिसके लिये हम बहुत वर्षोंसे विचार करते आ रहे हैं। आज सेनासहित समस्त पाण्डवोंका वध तथा राज्यका लाभ होगा ।। ३२ ।। तत्र कार्यतमं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् । स नो गुप्तः सहायः स्याद्धन्यात् पार्थांश्च संयुगे ।। ३३ ।। ‘इस विषयमें मैं भीष्मकी रक्षाको ही अपना प्रधान कर्तव्य समझता हूँ। वे सुरक्षित रहनेपर हमारे सहायक होंगे और संग्रामभूमिमें कुन्तीकुमारोंका वध कर सकेंगे ।। ३३ ।। अब्रवीद्धि विशुद्धात्मा नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । स्त्रीपूर्वको ह्यसौ राजंस्तस्माद् वर्ज्यो मया रणे ।। ३४ ।। ‘विशुद्ध अन्तःकरणवाले महात्मा भीष्मने मुझसे कहा है कि ‘राजन्! मैं शिखण्डीको नहीं मार सकता; क्योंकि वह पहले स्त्रीरूपमें उत्पन्न हुआ था और इसीलिये युद्धमें मुझे उसका परित्याग कर देना है ।। ३४ ।। लोकस्तद् वेद यदहं पितुः प्रियचिकीर्षया । राज्यं स्फीतं महाबाहो स्त्रियश्च त्यक्तवान् पुरा ।। ३५ ।। ‘महाबाहो! सारा संसार यह जानता है कि मैंने पूर्वकालमें पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे समृद्धिशाली राज्य तथा स्त्रियोंका परित्याग कर दिया था ।। ३५ ।। नैवं चाहं स्त्रियं जातु न स्त्रीपूर्वं कथंचन । हन्यां युधि नरश्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ३६ ।। ‘नरश्रेष्ठ! मैं कभी किसी स्त्रीको अथवा जो पहले स्त्री रहा हो, उस पुरुषको भी किसी प्रकार युद्धमें मार नहीं सकता; यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ।। ३६ ।। अयं स्त्रीपूर्वको राजञ्छिखण्डी यदि ते श्रुतः । उद्योगे कथितं यत्तत् तथा जाता शिखण्डिनी ।। ३७ ।। कन्या भूत्वा पुमाञ्जातः स च मां योधयिष्यति । तस्याहं प्रमुखे बाणान् न मुञ्चेयं कथंचन ।। ३८ ।। ‘राजन्! तुमने भी सुना होगा, यह शिखण्डी पहले स्त्रीरूपमें पैदा हुआ था। यह बात मैंने तुमसे युद्धकी तैयारीके समय बता दी थी। इस प्रकार कन्यारूपमें उत्पन्न हुई

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