महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्तथाऽऽचार्यान्ृत्विजो ये च तस्य । तैश्च त्वं तात सहितैर्यथार्हं संगच्छेथाः कुशलेनैव सूत ॥ ९ ॥ तात संजय! राजा धृतराष्ट्रके पुरोहित, आचार्य तथा उनके ऋत्विजोंसे भी (उनके साथ भेंट होनेपर) तुम (हमारी ओरसे) कुशल-मंगलका समाचार पूछते हुए ही मिलना ॥ ९ ॥ (ततोऽव्यग्रस्तमनाः प्राञ्जलिश्च कुर्या नमो मद्द्वचनेन तेभ्यः ।) तदनन्तर शान्तभावसे उन्हींकी ओर मनकी वृत्तियोंको एकाग्र करके हाथ जोड़कर मेरे कहनेसे उन सबको प्रणाम निवेदन करना। अश्रोत्रिया ये च वसन्ति वृद्धा मनस्विनः शीलबलोपपन्नाः । आशंसन्तोऽस्माकमनुस्मरन्तो यथाशक्ति धर्ममात्रां चरन्तः ॥ १० ॥ श्लाघस्व मां कुशलिनं स्म तेभ्यो ह्यनामयं तात पृच्छेर्जघन्यम् । तात! जो अश्रोत्रिय (शूद्र) वृद्ध पुरुष मनस्वी तथा शील और बलसे सम्पन्न हैं एवं हस्तिनापुरमें निवास करते हैं, जो यथाशक्ति कुछ धर्मका आचरण करते हुए हमलोगोंके प्रति शुभ कामना रखते हैं और बारंबार हमें याद करते हैं, उन सबसे हमलोगोंका कुशल-समाचार निवेदन करना। तत्पश्चात् उनके स्वास्थ्यका समाचार पूछना ॥ १० १/२ ॥ ये जीवन्ति व्यवहारेण राष्ट्रे पशूंश्च ये पालयन्तो वसन्ति ॥ ११ ॥ (कृषीवला बिभ्रति ये च लोकं तेषां सर्वेषां कुशलं स्म पृच्छेः ।) जो कौरव-राज्यमें व्यापारसे जीविका चलाते हैं, पशुओंका पालन करते हुए निवास करते हैं तथा जो खेती करके सब लोगोंका भरण-पोषण करते हैं, उन सब वैश्योंका भी कुशल-समाचार पूछना ॥ ११ ॥ आचार्य इष्टो नयगो विधेयो वेदानभीप्सन् ब्रह्मचर्यं चचार । योऽस्त्रं चतुष्पात् पुनरेव चक्रे द्रोणः प्रसन्नोऽभिवाद्यस्त्वयासौ ॥ १२ ॥ जिन्होंने वेदोंकी शिक्षा प्राप्त करनेके लिये पहले ब्रह्मचर्यका पालन किया। तत्पश्चात् मन्त्र, उपचार, प्रयोग तथा संहार—इन चार पादोंसे युक्त अस्त्रविद्याकी शिक्षा प्राप्त की, वे