महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसबके प्रिय, नीतिज्ञ, विनयी तथा सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले आचार्य द्रोण भी हमारे अभिवादनके योग्य हैं, तुम उनसे भी मेरा प्रणाम कहना ।। १२ ।।
अधीतविद्यश्चरणोपपन्नो योऽस्त्रं चतुष्पात् पुनरेव चक्रे । गन्धर्वपुत्रप्रतिमं तरस्विनं तमश्वत्थामानं कुशलं स्म पृच्छेः ।। १३ ।।
जो वेदाध्ययनसम्पन्न तथा सदाचारयुक्त हैं, जिन्होंने चारों पादोंसे युक्त अस्त्रविद्याकी शिक्षा पायी है, जो गन्धर्वकुमारके समान वेगशाली वीर हैं, उन आचार्यपुत्र अश्वत्थामाका भी कुशल-समाचार पूछना ।। १३ ।।
शारद्वतस्यावसथं स्म गत्वा महारथस्यात्मविदां वरस्य । त्वं मामभीक्ष्णं परिकीर्तयन् वै कृपस्य पादौ संजय पाणिना स्पृशेः ।। १४ ।।
संजय! तदनन्तर आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महारथी कृपाचार्यके घर जाकर बारंबार मेरा नाम लेते हुए अपने हाथसे उनके दोनों चरणोंका स्पर्श करना ।। १४ ।।
यस्मिन् शौर्यमानृशंस्यं तपश्च प्रज्ञा शीलं श्रुतिसत्त्वे धृतिश्च । पादौ गृहीत्वा कुरुसत्तमस्य भीष्मस्य मां तत्र निवेदयेथाः ।। १५ ।।
जिनमें वीरत्व, दया, तपस्या, बुद्धि, शील, शास्त्रज्ञान, सत्त्व और धैर्य आदि सद्गुण विद्यमान हैं, उन कुरुश्रेष्ठ पितामह भीष्मके दोनों चरण पकड़कर मेरा प्रणाम निवेदन करना ।। १५ ।।
प्रज्ञाचक्षुर्यः प्रणेता कुरूणां बहुश्रुतो वृद्धसेवी मनीषी । तस्मै राज्ञे स्थविरायाभिवाद्य आचक्षीथाः संजय मामरोगम् ।। १६ ।।
संजय! जो कौरवगणोंके नेता, अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता, बड़े बूढ़ोंके सेवक और बुद्धिमान् हैं, उन वृद्ध नरेश प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्रको मेरा प्रणाम निवेदन करके यह बताना कि युधिष्ठिर नीरोग और सकुशल है ।। १६ ।।
ज्येष्ठः पुत्रो धृतराष्ट्रस्य मन्दो मूर्खः शठः संजय पापशीलः । यस्यापवादः पृथिवीं याति सर्वां सुयोधनं कुशलं तात पृच्छेः ।। १७ ।।