महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2164, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस गजसेनाके बीचमें पड़े हुए पाण्डुनन्दन भीमसेन महान् मेघसमूहके मध्यमें स्थित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ।। ३१ १/२ ।। व्यधमत् स गजानीकं गदया पाण्डवर्षभः ।। ३२ ।। महाभ्रजालमतुलं मातरिश्वैव संततम् । पाण्डवश्रेष्ठ भीमसेनने अपनी गदाकी चोटसे सारी गजसेनाको उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे वायु महान् मेघोंकी सब ओर फैली हुई अनुपम घटाको छिन्न-भिन्न कर देती है ।। ३२ १/२ ।। ते वध्यमाना बलिना भीमसेनेन दन्तिनः ।। ३३ ।। आर्तनादं रणे चक्रुर्गर्जन्तो जलदा इव । महाबली भीमसेनकी गदासे आहत हुए दन्तार हाथी युद्धस्थलमें गरजते हुए मेघोंके समान आर्तनाद करने लगे ।। बहुधा दारितश्चैव विषाणैस्तत्र दन्तिभिः ।। ३४ ।। फुल्लाशोकनिभः पार्थः शुशुभे रणमूर्धनि । हाथियोंके दाँतोंसे अनेक बार विदीर्ण हुए भीमसेन युद्धके मुहानेपर खिले हुए अशोकके समान शोभा पा रहे थे ।। ३४ १/२ ।। विषाणे दन्तिनं गृह्य निर्विषाणमथाकरोत् ।। ३५ ।। विषाणेन च तेनैव कुम्भेऽभ्याहत्य दन्तिनम् । पातयामास समरे दण्डहस्त इवान्तकः ।। ३६ ।। उन्होंने किसी दन्तार हाथीका दाँत पकड़कर उखाड़ लिया और उस हाथीको दन्तहीन बना दिया। फिर उसी दाँतके द्वारा उसके कुम्भस्थलमें प्रहार करके दण्डधारी यमराजकी भाँति समरांगणमें उसे मार गिराया ।। ३५-३६ ।। शोणिताक्तां गदां बिभ्रन्मेदोमज्जाकृतच्छविः । कृताभ्यङ्गः शोणितेन रुद्रवत् प्रत्यदृश्यत ।। ३७ ।। खूनसे रँगी हुई गदा लेकर मेदा और मज्जाके लेपसे अपनी शोभा बिगाड़कर रक्तका उबटन लगाये हुए भीमसेन भगवान् रुद्रके समान दिखायी दे रहे थे ।। ३७ ।। एवं ते वध्यमानाश्च हतशेषा महागजाः । प्राद्रवन्त दिशो राजन् विमृद्नन्तः स्वकं बलम् ।। ३८ ।। राजन्! इस प्रकार भीमसेनकी मार खाकर मरनेसे बचे हुए महान् गज अपनी ही सेनाको रौंदते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे ।। ३८ ।। द्रवद्भिस्तैर्महानागैः समन्ताद् भरतर्षभ । दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत् पराङ्मुखम् ।। ३९ ।। भरतश्रेष्ठ! सब ओर भागते हुए उन महान् गजराजोंके साथ ही दुर्योधनकी सारी सेना युद्धभूमिसे विमुख हो चली ।। ३९ ।।