भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2193

दृष्ट्वा माधवमाक्रन्दे भीष्मायोद्यतमन्तिके ॥ ५९ ॥ हतो भीष्मो हतो भीष्मस्तत्र तत्र वचो महत् । अश्रूयत महाराज वासुदेवभयात् तदा ॥ ६० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण उस महायुद्धमें आपके पुत्रों और सैनिकोंकी चेतनाको मानो अपना ग्रास बनाये ले रहे थे। महाराज! उस मार-काटमें माधवको समीप आकर भीष्मके वधके लिये उद्यत हुआ देख उस समय उन वासुदेवके भयसे चारों ओर यह महान् कोलाहल सुनायी देने लगा कि ‘भीष्म मारे गये, भीष्म मारे गये’ ॥ ५९-६० ॥

पीतकौशेयसंवीतो मणिश्यामो जनार्दनः । शुशुभे विद्रवन् भीष्मं विद्युन्माली यथाम्बुदः ॥ ६१ ॥ रेशमी पीताम्बर धारण किये इन्द्रनीलमणिके समान श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण भीष्मकी ओर दौड़ते समय ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो विद्युन्मालासे अलंकृत श्याममेघ जा रहा हो ॥ ६१ ॥

स सिंह इव मातङ्गं यूथर्षभ इवर्षभम् । अभिदुद्राव वेगेन विनदन् यादवर्षभः ॥ ६२ ॥ यादवशिरोमणि बारंबार गर्जना करते हुए भीष्मके ऊपर उसी प्रकार वेगसे धावा कर रहे थे, जैसे सिंह गजराजपर और गोयूथका स्वामी साँड़ दूसरे साँड़पर आक्रमण करता है ॥ ६२ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य पुण्डरीकाक्षमाहवे । असम्भ्रमं रणे भीष्मो विचकर्ष महद् धनुः ॥ ६३ ॥ उस महासमरमें कमलनयन श्रीकृष्णको आते देख भीष्म उस रणक्षेत्रमें तनिक भी भयभीत न होकर अपने विशाल धनुषको खींचने लगे ॥ ६३ ॥

उवाच चैव गोविन्दमसम्भ्रान्तेन चेतसा । एह्येहि पुण्डरीकाक्ष देवदेव नमोऽस्तु ते ॥ ६४ ॥ साथ ही व्यग्रताशून्य मनसे भगवान् गोविन्दको सम्बोधित करके बोले—‘आइये, आइये, कमलनयन! देवदेव! आपको नमस्कार है ॥ ६४ ॥

मामद्य सात्वतश्रेष्ठ पातयस्व महाहवे । त्वया हि देव संग्रामे हतस्यापि ममानघ ॥ ६५ ॥ श्रेय एव परं कृष्ण लोके भवति सर्वतः । ‘सात्वतशिरोमणे! इस महासमरमें आज मुझे मार गिराइये। देव! निष्पाप श्रीकृष्ण! आपके द्वारा संग्राममें मारे जानेपर भी संसारमें सब ओर मेरा परम कल्याण ही होगा ॥ ६५ ½ ॥

सम्भावितोऽस्मि गोविन्द त्रैलोक्येनाद्य संयुगे ॥ ६६ ॥ प्रहरस्व यथेष्टं वै दासोऽस्मि तव चानघ ।